प्रिय विद्यार्थियों, आप जैसा ही एक विद्यार्थी विद्याध्ययन करने के बाद, शिक्षा पूरी होने के बाद अपने गुरु से कहता है- आपकी बड़ी कृपा हुई जो आपने मुझे ऐसी शिक्षा दी और अब मैं विद्वान हो गया हूँ, ज्ञानी हो गया हूँ। जो शिक्षा आपने मुझे दी है, जो ज्ञान आपने मुझे दिया है, उसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ और अब मैं आपको गुरु दक्षिणा देना चाहता हूँ।
गुरु ने कहा- इसकी कोई जरूरत नहीं है।
शिष्य मानता नहीं है। तब गुरु कहते हैं- ठीक है, जब तुम नहीं मान रहे हो और कुछ देना ही चाहते हो, दक्षिणा देना चाहते हो, तो निश्चित रूप से दे सकते हो। गुरु भी बहुत पहुँचे हुए थे। उन्होंने कहा- ठीक है, अगर देना ही चाहते हो तो मुझे दक्षिणा में कोई ऐसी चीज दो, जो व्यर्थ हो। जिसकी कोई उपयोगिता न हो, जिसका इस संसार में कोई महत्त्व न हो।
विद्यार्थी के पास तो ऐसी कोई चीज होती नहीं उस समय। वह व्यर्थ चीज की खोज में निकल पड़ता है। अभी कुछ सोच ही रहा है तभी उसके मन में आता है- इस दुनिया में जहाँ देखिए वहीं मिट्टी-ही-मिट्टी पड़ी हुई है, इतनी अधिक मिट्टी का क्या मतलब ? यह व्यर्थ ही तो है, क्यों न इस मिट्टी को ही मैं अपने गुरु को दे दूँ, गुरु दक्षिणा पूरी हो जाय।
लेकिन जैसे ही वह मिट्टी को हाथ लगाता है गुरु को देने के लिए तभी उसके मन से आवाज आती है- यह मिट्टी ही तो है जो इस दुनिया में वैभव का कारक है। इस दुनिया में जो कुछ भी है वह इस मिट्टी से ही है। अगर मिट्टी न होती तो शायद यह दुनिया ही न होती। मेरा इस मिट्टी को व्यर्थ मानना गलत है। यह मिट्टी व्यर्थ कैसे हो सकती है ? यह मिट्टी व्यर्थ हो ही नहीं सकती और वह अपना हाथ खींच लेता है, आगे बढ़ जाता है।
व्यर्थ की चीज खोजने के क्रम में वह और कहीं से गुजर रहा है, तभी देखता है कि सड़क के किनारे गन्दगी का ढेर लगा है। उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं, उससे बदबू भी आ रही है। उसके मन में घृणा उत्पन्न होती है उस कूड़े-कचरे को देखकर, वह सोचता है- यह तो वाकई व्यर्थ की चीज है, क्यों न मैं इसे ही अपने गुरु को ले जाकर दे दूँ और मेरी दक्षिणा पूरी हो जाय।
वह जैसे ही हाथ बढ़ाता है उस कूड़े की ओर, बड़ी घृणा है उसके मन में, बदबू भी आ रही है, लेकिन करता भी क्या ? गुरु को दक्षिणा जो देनी है। अब जैसे ही झुकता है कूड़ा उठाने के लिए तभी उसके मन में एक नई बात उठती है- यह कूड़ा मेरी दृष्टि में जरूर व्यर्थ है, लेकिन इस दुनिया में जो भी पेड़-पौधे हैं, वे सब इसी से प्राण पाते हैं, इसी से पोषित होते हैं, इसी से उनका जीवन है। ये फल, सब्जियाँ, अन्न, ये भोज्य पदार्थ जो भी चीजें हमारे उपभोग, हमारे जीवन के लिए आवश्यक हैं, वे सब इसी से तो प्राण पाते हैं। यही उर्वर खाद बनता है जिससे कि इनका पोषण होता है और हम सभी का जीवन चलता है। वह विद्यार्थी उस कूड़े को भी अपने गुरु को देने के लिए नहीं उठा पाता है।
वह फिर आगे बढ़ता है, अब वह जिस रास्ते से होकर गुजर रहा है उसके बगल से गन्दे पानी का नाला बह रहा है। उसमें से भी बहुत तेज बदबू उठ रही है। उसके मन में आता है- क्यों न इस गन्दे नाले से ही थोड़ा पानी ले लूँ और इसे ही अपने गुरु को दक्षिणा स्वरूप दे दूँ। क्योंकि यह भी तो व्यर्थ ही है तभी तो इसे नाले के माध्यम से बाहर निकाला जा रहा है।
अभी वह ऐसा सोच ही रहा है तब तक उसका मन कह उठता है कि यह नाले का गन्दा पानी व्यर्थ कहाँ है ? यह भी जब खेतों में फैल जाएगा तो सूर्य के धूप एवं गर्मी से इसकी गन्दगी सूखकर सड़कर पौधों को प्राण देगी और जल वाष्पित होकर बादल बन जाएगा और ये बादल हमें प्राण देते हैं, जीवन देतें हैं तो इसे भी कैसे व्यर्थ कहा जा सकता है, यह भी व्यर्थ नहीं है।
वह व्यर्थ की चीज खोजता रहता है, खोजते-खोजते उसका काफी समय बीत जाता है, लेकिन ऐसी कोई भी व्यर्थ की चीज उसके हाथ लग नहीं पाती है जिसे ले जाकर वह अपने गुरु को दे सके।
थक-हारकर वह गुरु के आश्रम में लौटता है और गुरु से कहता है- मैं बहुत दूर-दूर तक गया, मैंने बहुत ढूँढा लेकिन मुझे ऐसी कोई व्यर्थ की चीज नहीं मिली। मैंने मिट्टी को हाथ लगाया तो मेरे मन में विचार आया कि इससे ही पृथ्वी बनी है। मैंने कूड़े-कचरे को उठाने की कोशिश की जिसे देखकर मुझे घृणा हो रही थी, लेकिन तुरन्त मेरे मन में विचार आया कि इससे तो पौधे प्राण पाते हैं, जिनसे हमारा जीवन संचालित होता है। इसके बाद मैंने गन्दे नाले के पानी को हाथ लगाने की कोशिश की, क्योंकि उससे बहुत तेज बदबू उठ रही थी। मैंने सोचा यह भी तो व्यर्थ ही है। तभी मुझे ध्यान आया कि इससे ही तो बादल बनते हैं जो हमें जीवन देते है। अब यह बात मेरे समझ में नहीं आ रही है कि आखिर ऐसी कौन सी व्यर्थ की चीज है जिसे लाकर मैं आपको दूँ ?
आप समझ सकते हैं, गुरु ने शिष्य से क्या कहा होगा ? गुरु ने अपने शिष्य से कहा- इस दुनिया में वही व्यर्थ है जो दूसरों को व्यर्थ समझता है। इस दुनिया में कोई भी चीज व्यर्थ नहीं है। प्रत्येक चीज का अपना महत्त्व है, जरूरत है उसका उचित मूल्यांकन करने की।
प्रिय विद्यार्थियों, इस घटनाक्रम में आपने देखा कि वह विद्यार्थी व्यर्थ की चीज खोजने में क्या कुछ नहीं बरबाद करता है। वह व्यर्थ की चीज खोजने में अपना बहुमूल्य समय बरबाद करता है और इस तरह अपने आपको ही व्यर्थ साबित करता है। क्या आप भी अपने आपको व्यर्थ साबित करना चाहेंगे ? अगर आप भी स्वयं को व्यर्थ साबित करना चाहते हैं, तो कोई बात नहीं। अगर नहीं तो आप क्या करेंगे ? आप समय के महत्त्व को समझेंगे। समय क्या है ? मैं मानता हूँ समय को परिभाषित करना कठिन है। किन्तु जरा इस तरह से सोचें, जब बन्द घड़ी भी प्रतिदिन दो बार सही समय बताती है, तो आप अपने बारे में क्या सोचते हैं ? आपकी अपनी रूटीन, आपकी अपनी दिनचर्या, आपकी अपनी समय सारणी क्या है ? कैसे चलती है आपकी घड़ी, कैसे पूरी होती है आपकी दिनचर्या ? क्या इसके अवलोकन से यह नहीं समझा जा सकता है कि समय क्या है ? आज इस सत्र का पहला दिन है। आज से एक नई शुरूआत कर रहे हैं आप। आज आपको निश्चय करना चाहिए, आज आपको प्रतिज्ञा करनी चाहिए, आज आपको यह तय करना चाहिए कि आप समय के साथ हो लेंगे।
अगर आपने समय की उपयोगिता को समझ लिया, समय की सार्थकता को समझ लिया और समय को व्यर्थ करने से स्वयं को रोक लिया तो मैं समझूँगा कि आज की शुरूआत आपको आपके लक्ष्य तक जरूर पहुँचाएगी। अगर आपने समय को साध लिया, अगर अपने समय को व्यर्थ कार्यों में नष्ट नहीं किया, अगर आपने समय का सदुपयोग किया तो निश्चित ही आपका जीवन लक्ष्य आपके ठीक सामने होगा।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
धन्यवाद।