प्रिय विद्यार्थियों, कल छुट्टी थी। यह छुट्टी भी पता नहीं क्यों इधर कुछ ज्यादा हो रही है। जब छुट्टी हो जाती है, तो कोई काम नहीं रहता। जब कोई काम नहीं रहता है, तो आप क्या करते हैं ? किसने जबाब दिया घूमते हैं ? बहुत सही बात कही आपने। अब कौन कहाँ घूमता है ? यह तो उसी पर निर्भर करता है। कोई खड़े होकर गोल-गोल घूमता है, कोई बाजार घूमता है। इस घूमने का मतलब है समय व्यतीत करना। अब सभ्य लोगों के समय व्यतीत करने की कौन सी जगह होती है ? अरे, कहीं बाहर जाएंगे तो दिक्कत ही है। अब घर में कब तक बन्द रहेंगे ? जब घर से मन ऊबता है, तो छत पर चले जाते हैं, सही बात है न, बिल्कुल सही।
अच्छा, तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। कल मैं भी खाली था। समय नहीं बीत रहा था तो छत पर चला गया। मैंने छत से देखा कि जो बगल में गड्ढा है वह पानी से भरा है और उसमें मछलियाँ तैर रही हैं। मैं जलचर की बात कर रहा हूँ। मैं छत से देख रहा हूँ कि बगलवाले गड्ढे में जिसमें पानी भरा हुआ है, उसमें मछलियाँ हैं और कुछ लोग मछली पकड़ रहे हैं। अब मछली पकड़ने के क्रम में एक मछली उछलकर बाहर आ जाती है। कुछ ऐसा होता है कि एक बड़ी मछली बहुत तेज उछलती है और गड्ढे से बाहर आ जाती है। तब वे सब दौड़कर उसे दबोच लेते हैं, पकड़ लेते हैं।
चूँकि उधर वे सब मछली पकड़ रहे हैं और इधर मैं कष्ट में पड़ रहा हूँ। जाने क्यों मुझे उस मछली पर बहुत तरस आ रहा है। फिर मैंने सोचा, चलो यह तो उसकी नियति है, आज नहीं तो कल उसके साथ ऐसा ही होना है। इसलिए मेरा हस्तक्षेप करना बहुत मायने नहीं रखता है। यदि मैं अभी हस्तक्षेप करके उसे छुड़वा भी दूँ, उसे पानी में डलवा भी दूँ, तो कल वे सब फिर उसे उस समय पकड़ ले जाएंगे जब मैं नहीं देख रहा होऊँगा। चलो छोड़ो, जाने दो, कुछ और सोचो।
अब उन सबका काम हो चुका है, थोड़ी देर में वे सब चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही वे सब जाते हैं, न जाने क्यों मेरी बेचैनी बढ़ने लगती है, मेरा मन विचलित हो जाता है, मैं बहुत बेचैनी महसूस करने लगता हूँ। मेरे मन में आज पहली बार जाने क्यों ऐसा हो रहा है, उस मछली पर इतना तरस आ रहा है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। बार-बार मेरे मन में यही बात उठ रही है कि काश, मैं उस मछली को बचा पाता, मैं उन्हें रोक पाता, बहुत बड़ा पुण्य का कार्य होता और आज का मेरा दिन सफल हो जाता। क्यों ? क्योंकि मैं किसी निर्दोष जीव की रक्षा कर लेता। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया, क्योंकि वे अब मछली को ले जा चुके हैं। मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा और मेरा पूरा दिन यह सोचते बीत गया कि काश, मैं उस मछली को छुड़ा पाता, उसे जीवनदान दिला पाता। अब तो वह बात हाथ से निकल गई तो निकल गई।
दिन तो बीत गया अब रात की बारी आती है। रात में क्या होता है ? रात में मुझे स्वप्न आता है। जैसे ही मैं सोया, स्वाभाविक है स्वप्न देखना ही देखना है। कहते भी हैं कि आदमी जो दिन में सोचता है, वही रात स्वप्न में भी देखता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही मैं स्वप्नलोक पहुँचा तो देखता हूँ कि सब कुछ बदल गया है। अब पहलेवाली स्थिति नहीं है क्योंकि अब वह मछली जो कूदकर बाहर आ गई थी, वह मेरे कब्जे में है। अब पूछिए कैसे ? जैसे ही मछली कूदती है, मैं अपने कर्मचारी को भेजता हूँ कि दौड़ो, देखो, उस मछली को ले आओ। मैं उस मछली को मँगवा लेता हूँ और एक शुद्ध जल कुण्ड में रखवाता हूँ।
जल कुण्ड समझ रहे हैं और वह जल कुण्ड कहाँ है ? जहाँ आप खड़े हैं वहीं जल कुण्ड है। ऐसा सपने में हो सकता है। यहाँ आप डूबनेवाले नहीं हैं, चिन्ता मत कीजिए। आप जहाँ हैं, वहीं रहिये। इस जल कुण्ड में स्वच्छ एवं निर्मल जल है। मैं उस जल कुण्ड में मछली को डलवा देता हूँ। मछली उसमें तैरने लगती है, यह देखकर मुझे बड़ा आनन्द आता है। लेकिन मेरे मन में फिर एक बात आती है कि जब से इस मछली का जन्म हुआ होगा तभी से यह पानी में रह रही है। मुझे इसके लिए कुछ अतिरिक्त करना चाहिए।
मैंने सोचा, कुछ और नहीं तो इतना जरूर कर सकता हूँ कि इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ जाय। मुझे मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाना है। अब मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए क्या करना होगा ? अरे, उसे कपड़ा तो पहनाने से रहा, कोट तो पहना नहीं सकता। मछली का स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए जो पानीवाला कुण्ड है, उसके बगल में मैं एक और कुण्ड बनवाता हूँ। बनवाता क्या अब स्वप्न की बात है तो जैसा चाहिए वैसा हो जाएगा।
जल कुण्ड के बगल में एक दूसरा कुण्ड जिसमें दूध भरा हुआ है। दूध से भरे हुए तालाब के बारे में क्या आपने कभी सुना है ? मैंने अपने कर्मचारी से कहा कि इस मछली को जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डाल दो। आप पानी पीते हैं और दूध भी पीते हैं। आप दूध क्यों पीते हैं? क्योंकि दूध में पौष्टिकता होती है। मेरे मन में यह बात है कि मछली को जल से निकालकर यदि दूध के कुण्ड में डाल देंगे तो उसे लाभ होगा और वह तन्दुरूस्त हो जायेगी क्योंकि दूध पौष्टिक होता है। मैं इस तरह से मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए उसे जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ।
अब क्या होगा ? जैसे ही वह मछली दूधवाले कुण्ड में जाती है, छटपटाने लगती है। अब मैं तो उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ, लेकिन वह जैसे ही दूधवाले कुण्ड में डाली जाती है, छटपटाने लगती है। मेरी परेशानी बढ़ती है, मुझे लगता है कि शायद दूध उसे सूट नहीं कर रहा है। कभी-कभी आपके साथ भी ऐसा होता है। कई लोगों को दूध सूट नहीं करता है और पीते ही उल्टी कर देते हैं। यह बात मेरे दिमाग में आती है, तो मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि इसे दूध सूट नहीं कर रहा है, तुम इसे बगलवाले कुण्ड में डाल दो।
बगलवाला कुण्ड किससे भरा है ? पानी तो पहले कुण्ड में है। पहले में पानी है, दूसरे में दूध है और तीसरे में घी है। लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने की बात हो रही है, न तो अब दूध से बढ़िया चीज चाहिए। दूध से बढ़िया चीज शुद्ध घी है और वह भी गाय का। अब मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ। क्योंकि घी और ज्यादा पौष्टिक होता है। अब मुझे लगता है कि हो सकता है कि वह घी वाले कुण्ड में जाय तो प्रसन्न हो जाय।
जैसे ही मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो क्या स्थिति होती है ? क्या वह प्रसन्न हो जाती है ? उसे जब मैं घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो वहाँ भी वह छटपटाती ही है। अब मेरी परेशानी और बढ़ती है। मैं उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ और उसे पता नहीं क्या हो गया है कि छटपटा रही है। बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। पानी में थी तो ठीक थी। मैंने उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाकर दूध में डाला तो वह वहाँ भी छटपटायी। अब घी में डलवाया तो यहाँ भी वही स्थिति है। अब मुझे लगा कि दूध और दूध से बनी चीज घी इसे सूट नहीं कर रहा है और इसके छटपटाने का यही कारण है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह छटपटाती क्यों ? मस्त रहती घी में भी, दूध में भी।
फिर मुझे क्या करना है ? अब उसे घी से निकालना है। क्योंकि मैंने यह मान लिया कि उसे दूध से बनी हुई चीजों से एलर्जी है। वह दूध में भी छटपटा रही थी और घी में भी छटपटा रही है। अब मुझे किसी ऐसे कुण्ड में डालना है जहाँ वह प्रसन्न रहे। तीन कुण्ड हो गये, अब चौथे में ले चलना है। वह चौथा कुण्ड बगल में उस हैण्डपम्प के पास है। अब आप बताइये इसमें क्या होगा ? पानी, दूध और घी के बाद अब किसी अच्छी चीज का नाम लीजिए। हाँ, अच्छी चीज सोच ली गई है। वह कुण्ड शहद से भरा हुआ है।
अब मैं उसे घी वाले कुण्ड से निकलवाकर शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ। मुझे लगता है कि अब वह यहाँ ठाठ से रहेगी। क्यों ? शहद का कुण्ड है, मीठा भी है। जैसे ही मैं उसे उस शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ तो थोड़ी देर तक तो सहज रहती है। मुझे प्रसन्नता होती है कि चलो, बड़ा अच्छा हुआ, मैंने इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा दिया। अब वह शहद में खूब आराम से रहेगी। लेकिन थोड़ी देर बाद वह फिर छटपटाने लगती है। जरूर मीठा-मीठा लगा होगा तो थोड़ी देर सहज रही होगी।
लेकिन जब वह शहद में भी छटपटाने लगती है, तो मेरी परेशानी बढ़ती है। आखिर मैं इसके लिए क्या कर पाया ? वहाँ से पकड़वाकर मँगवाया भी, जीवन रक्षा भी करवाया और उसके लिए मैं कुछ एक्स्ट्रा नहीं कर पाया। इससे अच्छा होता कि वह वहीं पानी में पड़ी रहती। उसे पानी में डलवाया, दूध में डलवाया, घी में और अब शहद में और अब शहद में भी वह परेशान है । अब उसकी परेशानी मेरी समझ से परे है।
इस बार मैंने भी निर्णय ले ही लिया कि अब मुझे इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा ? अभी बगल में एक कुण्ड और है, मुझे एक बार और प्रयास करना चाहिए। अब आप बताइये उस कुण्ड में क्या है ? कोई एक बोले, आप बतायें, कोई एक बता सके तो बतायें फिर आगे बढ़ें। इमेजिन करना नहीं जानेंगे तो सारी पढ़ाई बेकार है। वह कुण्ड किसका है यह मैं ही बता देता हूँ। अच्छा, क्या कह रहे हैं आप? दही । अरे, जब घी में डाल दिया तो दही, दूध और घी के बीच आता है। हाँ चलिए, मैंने तय कर लिया। मैने बताया न कि इस बार इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है और इसके लिए मेरे पास बस एक उपाय है।
अब यह जो पाँचवाँ कुण्ड है, वह अमृत कुण्ड है। इस बार मुझे उसे अमर ही कर डालना है और जैसे ही मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि अब इसे इसमें से निकालकर पाँचवें कुण्ड में डालो तभी मैं क्या देखता हूँ कि कोई व्यक्ति मुझसे मिलने आया है और मेरे बगल में खड़े होकर मुझसे कह रहा है, सर, यह क्या कर रहे हैं ? आप इसे जल्दी पानी में डलवाइये नहीं तो यह मछली मर जाएगी।
अब मैं क्या करता ? डर गया, कहीं हवन करने में हाथ न जल जाय। तुरन्त उसे पानीवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ। जैसे ही उसे पहले कुण्ड में डलवाता हूँ, वह पानी में उछलती है और जोर से छपाक् की आवाज होती है। उस आवाज को सुनकर मेरी नींद खुल जाती है। मैं जाग गया, जागने के बाद आप जानते ही हैं फिर सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, मछली को तो मैंने पानी में डलवा दिया। बात सही है, मैं उसे अमृत कुण्ड में प्रवेश नहीं करा पाया। लेकिन आपके साथ यह यात्रा जारी रहेगी, रुकनेवाली नहीं है, आगे बढ़ती रहेगी। अब अमृत कुण्ड में प्रवेश करने की बारी आपकी है। क्योंकि अन्य कुण्ड में आप पहले ही प्रवेश पा चुके हैं। आपको याद है न, नहीं याद है। आपकी शुरूवात कहाँ से हुई थी? पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था। ठीक से याद कीजिए, पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था, फिर दूध, उसके बाद घी और तब शहद।
अब आपको अमृत कुण्ड में प्रवेश करना है। बताइये यह अमृत कुण्ड कहाँ है ? मैं स्वप्न की बात बता रहा था तो उसमें अमृत कुण्ड कहाँ था ? अरे, शहदवाला कुण्ड हैण्डपम्प के पास था, तो वह अमृत कुण्ड उसके बाद उस पेड़ के पास था। लेकिन आपका अमृत कुण्ड कहाँ है ? यह आपका पाँचवाँ स्टेप है, सोच लीजिए। क्या है पाँचवाँ स्टेप ? पहला पानी में प्रवेश किया, दूसरा दूध में प्रवेश किया, तीसरा घी में, चौथा शहद में और पाँचवाँ अमृत कुण्ड, तो अब अमृत कुण्ड भी देखना चाहेंगे। चलिए , अब आप अमृत कुण्ड भी देख लीजिए।
यह है आपका अमृत कुण्ड। शान्त हो जाइये और देखिये मेरे हाथ की तरफ, इस अमृत कुण्ड में प्रवेश करने के बाद मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपका प्रवेश करना शेष है या आपने प्रवेश पा लिया है ? आप कहेंगे पा भी लिया है और बाहर भी आ गये हैं। क्योंकि यह अमृत कलश आप ही से तो बना है, आप ही इसके केन्द्र में हैं और शेष सब परिधि पर है। जो केन्द्र में है वही मूल है, तो आप ही इसके मूल हैं, आप ही इसके जड़ में हैं। क्योंकि यह आप ही के दिनचर्या का वृत्तान्त है। इसमें आप ही के जीवन यात्रा की चर्चा है, आप इसमें पूर्णतः विद्यमान हैं। अतः आपने अमृत कुण्ड में प्रवेश करके अमरत्व प्राप्त कर लिया है।
चूँकि यह अजर और अमर है, इसीलिए आपने भी अमरत्व प्राप्त कर लिया है। कौन अजर-अमर है ? यह कुण्ड और आप इसमें विद्यमान हैं इसलिए आप भी अजर और अमर हो गये। इस अमर गाथा को आगे बढ़ाने के लिए समय कम है, मैं सीधे इसके पृष्ठांकित बातों को आपके सम्मुख रखता हूँ।
प्रिय विद्यार्थियों, समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह बात मुझे आपसे इस समय करनी चाहिए या नहीं, फिर भी अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। जब तक शरीर में हलचल है तभी तक उस पर आत्मा की सत्ता है। जब आत्मा शरीर छोड़ती है, परा पर स्थापित होती है, तो परमात्मा हो जाती है। उसका आचरण, व्यवहार, क्रियाकलाप सब कुछ परमात्मस्वरूप हो जाता है।
अलग से कोई परमात्मा नहीं है। न ही कहीं स्वर्ग है और न ही कहीं नरक, सब कुछ इस पृथ्वी पर ही है। आत्मा स्वयं ही अपने पूर्व के किए गये कर्यों के अनुक्रम में शेष कार्यों को पूर्ण करने के लिए नया शरीर धारण करती है और उसे यह नया जन्म स्वयं ही तय करना होता है, क्योंकि वही परम सत्यस्वरूपब्रह्म हो जाती है।
चूँकि इस शरीर के माध्यम से ही कार्य सम्पादित होते हैं। यही कार्य ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है, ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वह प्रत्येक स्तर पर शरीर के साथ बनी रहती है, या यूँ कहूँ उसी ऊर्जा का घनीभूत रूप आत्मा है जो कभी नष्ट नहीं होती और उसे जन्म दर जन्म आगे बढ़ाती रहती है।
जब हमने ही तय किया है कि इस पृथ्वी पर हमें किस रूप में आना है, क्या करना है, कैसे करना है और ऐसा ही है, तो फिर इस संसार में हम जो कर रहे हैं, वह हमारी उसी सोच के अनुरूप क्यों नहीं है ? जो जान-समझ कर हमने इसका वरण किया है।
फिर यह गड़बड़ी क्यों, कोताही क्यों, लापरवाही क्यों ? क्या इसीलिए हमने यह सब तय किया और यह स्वरूप स्वीकार किया ? इसे समझे, जाने और ऐसे लगें जैसे मानो इसे करके ही मानेंगे, ताकि कल के लिए करने को कुछ शेष न रहे।
प्रिय विद्यार्थियों, यह बात सही है, यह जो भी पुस्तक के रूप में कहिये, जिस रूप में कहिये, आपके बीच से ही आनेवाली चीज है, इसमें आपके क्रियाकलाप, आपकी दिनचर्या, आप कैसे करते हैं वह सब कुछ है। अब इसका भविष्य और आपका भविष्य मुझे लगता है दोनों एक ही रथ के दो पहिये हैं। कल को इसे कहाँ पहुँचना है यह तय है। इसी तय के साथ-साथ अपने जीवन यात्रा की सफलता के लिए चल पड़िये।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।अमृत कुण्ड
प्रिय विद्यार्थियों, कल छुट्टी थी। यह छुट्टी भी पता नहीं क्यों इधर कुछ ज्यादा हो रही है। जब छुट्टी हो जाती है, तो कोई काम नहीं रहता। जब कोई काम नहीं रहता है, तो आप क्या करते हैं ? किसने जबाब दिया घूमते हैं ? बहुत सही बात कही आपने। अब कौन कहाँ घूमता है ? यह तो उसी पर निर्भर करता है। कोई खड़े होकर गोल-गोल घूमता है, कोई बाजार घूमता है। इस घूमने का मतलब है समय व्यतीत करना। अब सभ्य लोगों के समय व्यतीत करने की कौन सी जगह होती है ? अरे, कहीं बाहर जाएंगे तो दिक्कत ही है। अब घर में कब तक बन्द रहेंगे ? जब घर से मन ऊबता है, तो छत पर चले जाते हैं, सही बात है न, बिल्कुल सही।
अच्छा, तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। कल मैं भी खाली था। समय नहीं बीत रहा था तो छत पर चला गया। मैंने छत से देखा कि जो बगल में गड्ढा है वह पानी से भरा है और उसमें मछलियाँ तैर रही हैं। मैं जलचर की बात कर रहा हूँ। मैं छत से देख रहा हूँ कि बगलवाले गड्ढे में जिसमें पानी भरा हुआ है, उसमें मछलियाँ हैं और कुछ लोग मछली पकड़ रहे हैं। अब मछली पकड़ने के क्रम में एक मछली उछलकर बाहर आ जाती है। कुछ ऐसा होता है कि एक बड़ी मछली बहुत तेज उछलती है और गड्ढे से बाहर आ जाती है। तब वे सब दौड़कर उसे दबोच लेते हैं, पकड़ लेते हैं।
चूँकि उधर वे सब मछली पकड़ रहे हैं और इधर मैं कष्ट में पड़ रहा हूँ। जाने क्यों मुझे उस मछली पर बहुत तरस आ रहा है। फिर मैंने सोचा, चलो यह तो उसकी नियति है, आज नहीं तो कल उसके साथ ऐसा ही होना है। इसलिए मेरा हस्तक्षेप करना बहुत मायने नहीं रखता है। यदि मैं अभी हस्तक्षेप करके उसे छुड़वा भी दूँ, उसे पानी में डलवा भी दूँ, तो कल वे सब फिर उसे उस समय पकड़ ले जाएंगे जब मैं नहीं देख रहा होऊँगा। चलो छोड़ो, जाने दो, कुछ और सोचो।
अब उन सबका काम हो चुका है, थोड़ी देर में वे सब चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही वे सब जाते हैं, न जाने क्यों मेरी बेचैनी बढ़ने लगती है, मेरा मन विचलित हो जाता है, मैं बहुत बेचैनी महसूस करने लगता हूँ। मेरे मन में आज पहली बार जाने क्यों ऐसा हो रहा है, उस मछली पर इतना तरस आ रहा है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। बार-बार मेरे मन में यही बात उठ रही है कि काश, मैं उस मछली को बचा पाता, मैं उन्हें रोक पाता, बहुत बड़ा पुण्य का कार्य होता और आज का मेरा दिन सफल हो जाता। क्यों ? क्योंकि मैं किसी निर्दोष जीव की रक्षा कर लेता। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया, क्योंकि वे अब मछली को ले जा चुके हैं। मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा और मेरा पूरा दिन यह सोचते बीत गया कि काश, मैं उस मछली को छुड़ा पाता, उसे जीवनदान दिला पाता। अब तो वह बात हाथ से निकल गई तो निकल गई।
दिन तो बीत गया अब रात की बारी आती है। रात में क्या होता है ? रात में मुझे स्वप्न आता है। जैसे ही मैं सोया, स्वाभाविक है स्वप्न देखना ही देखना है। कहते भी हैं कि आदमी जो दिन में सोचता है, वही रात स्वप्न में भी देखता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही मैं स्वप्नलोक पहुँचा तो देखता हूँ कि सब कुछ बदल गया है। अब पहलेवाली स्थिति नहीं है क्योंकि अब वह मछली जो कूदकर बाहर आ गई थी, वह मेरे कब्जे में है। अब पूछिए कैसे ? जैसे ही मछली कूदती है, मैं अपने कर्मचारी को भेजता हूँ कि दौड़ो, देखो, उस मछली को ले आओ। मैं उस मछली को मँगवा लेता हूँ और एक शुद्ध जल कुण्ड में रखवाता हूँ।
जल कुण्ड समझ रहे हैं और वह जल कुण्ड कहाँ है ? जहाँ आप खड़े हैं वहीं जल कुण्ड है। ऐसा सपने में हो सकता है। यहाँ आप डूबनेवाले नहीं हैं, चिन्ता मत कीजिए। आप जहाँ हैं, वहीं रहिये। इस जल कुण्ड में स्वच्छ एवं निर्मल जल है। मैं उस जल कुण्ड में मछली को डलवा देता हूँ। मछली उसमें तैरने लगती है, यह देखकर मुझे बड़ा आनन्द आता है। लेकिन मेरे मन में फिर एक बात आती है कि जब से इस मछली का जन्म हुआ होगा तभी से यह पानी में रह रही है। मुझे इसके लिए कुछ अतिरिक्त करना चाहिए।
मैंने सोचा, कुछ और नहीं तो इतना जरूर कर सकता हूँ कि इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ जाय। मुझे मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाना है। अब मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए क्या करना होगा ? अरे, उसे कपड़ा तो पहनाने से रहा, कोट तो पहना नहीं सकता। मछली का स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए जो पानीवाला कुण्ड है, उसके बगल में मैं एक और कुण्ड बनवाता हूँ। बनवाता क्या अब स्वप्न की बात है तो जैसा चाहिए वैसा हो जाएगा।
जल कुण्ड के बगल में एक दूसरा कुण्ड जिसमें दूध भरा हुआ है। दूध से भरे हुए तालाब के बारे में क्या आपने कभी सुना है ? मैंने अपने कर्मचारी से कहा कि इस मछली को जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डाल दो। आप पानी पीते हैं और दूध भी पीते हैं। आप दूध क्यों पीते हैं? क्योंकि दूध में पौष्टिकता होती है। मेरे मन में यह बात है कि मछली को जल से निकालकर यदि दूध के कुण्ड में डाल देंगे तो उसे लाभ होगा और वह तन्दुरूस्त हो जायेगी क्योंकि दूध पौष्टिक होता है। मैं इस तरह से मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए उसे जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ।
अब क्या होगा ? जैसे ही वह मछली दूधवाले कुण्ड में जाती है, छटपटाने लगती है। अब मैं तो उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ, लेकिन वह जैसे ही दूधवाले कुण्ड में डाली जाती है, छटपटाने लगती है। मेरी परेशानी बढ़ती है, मुझे लगता है कि शायद दूध उसे सूट नहीं कर रहा है। कभी-कभी आपके साथ भी ऐसा होता है। कई लोगों को दूध सूट नहीं करता है और पीते ही उल्टी कर देते हैं। यह बात मेरे दिमाग में आती है, तो मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि इसे दूध सूट नहीं कर रहा है, तुम इसे बगलवाले कुण्ड में डाल दो।
बगलवाला कुण्ड किससे भरा है ? पानी तो पहले कुण्ड में है। पहले में पानी है, दूसरे में दूध है और तीसरे में घी है। लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने की बात हो रही है, न तो अब दूध से बढ़िया चीज चाहिए। दूध से बढ़िया चीज शुद्ध घी है और वह भी गाय का। अब मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ। क्योंकि घी और ज्यादा पौष्टिक होता है। अब मुझे लगता है कि हो सकता है कि वह घी वाले कुण्ड में जाय तो प्रसन्न हो जाय।
जैसे ही मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो क्या स्थिति होती है ? क्या वह प्रसन्न हो जाती है ? उसे जब मैं घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो वहाँ भी वह छटपटाती ही है। अब मेरी परेशानी और बढ़ती है। मैं उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ और उसे पता नहीं क्या हो गया है कि छटपटा रही है। बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। पानी में थी तो ठीक थी। मैंने उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाकर दूध में डाला तो वह वहाँ भी छटपटायी। अब घी में डलवाया तो यहाँ भी वही स्थिति है। अब मुझे लगा कि दूध और दूध से बनी चीज घी इसे सूट नहीं कर रहा है और इसके छटपटाने का यही कारण है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह छटपटाती क्यों ? मस्त रहती घी में भी, दूध में भी।
फिर मुझे क्या करना है ? अब उसे घी से निकालना है। क्योंकि मैंने यह मान लिया कि उसे दूध से बनी हुई चीजों से एलर्जी है। वह दूध में भी छटपटा रही थी और घी में भी छटपटा रही है। अब मुझे किसी ऐसे कुण्ड में डालना है जहाँ वह प्रसन्न रहे। तीन कुण्ड हो गये, अब चौथे में ले चलना है। वह चौथा कुण्ड बगल में उस हैण्डपम्प के पास है। अब आप बताइये इसमें क्या होगा ? पानी, दूध और घी के बाद अब किसी अच्छी चीज का नाम लीजिए। हाँ, अच्छी चीज सोच ली गई है। वह कुण्ड शहद से भरा हुआ है।
अब मैं उसे घी वाले कुण्ड से निकलवाकर शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ। मुझे लगता है कि अब वह यहाँ ठाठ से रहेगी। क्यों ? शहद का कुण्ड है, मीठा भी है। जैसे ही मैं उसे उस शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ तो थोड़ी देर तक तो सहज रहती है। मुझे प्रसन्नता होती है कि चलो, बड़ा अच्छा हुआ, मैंने इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा दिया। अब वह शहद में खूब आराम से रहेगी। लेकिन थोड़ी देर बाद वह फिर छटपटाने लगती है। जरूर मीठा-मीठा लगा होगा तो थोड़ी देर सहज रही होगी।
लेकिन जब वह शहद में भी छटपटाने लगती है, तो मेरी परेशानी बढ़ती है। आखिर मैं इसके लिए क्या कर पाया ? वहाँ से पकड़वाकर मँगवाया भी, जीवन रक्षा भी करवाया और उसके लिए मैं कुछ एक्स्ट्रा नहीं कर पाया। इससे अच्छा होता कि वह वहीं पानी में पड़ी रहती। उसे पानी में डलवाया, दूध में डलवाया, घी में और अब शहद में और अब शहद में भी वह परेशान है । अब उसकी परेशानी मेरी समझ से परे है।
इस बार मैंने भी निर्णय ले ही लिया कि अब मुझे इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा ? अभी बगल में एक कुण्ड और है, मुझे एक बार और प्रयास करना चाहिए। अब आप बताइये उस कुण्ड में क्या है ? कोई एक बोले, आप बतायें, कोई एक बता सके तो बतायें फिर आगे बढ़ें। इमेजिन करना नहीं जानेंगे तो सारी पढ़ाई बेकार है। वह कुण्ड किसका है यह मैं ही बता देता हूँ। अच्छा, क्या कह रहे हैं आप? दही । अरे, जब घी में डाल दिया तो दही, दूध और घी के बीच आता है। हाँ चलिए, मैंने तय कर लिया। मैने बताया न कि इस बार इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है और इसके लिए मेरे पास बस एक उपाय है।
अब यह जो पाँचवाँ कुण्ड है, वह अमृत कुण्ड है। इस बार मुझे उसे अमर ही कर डालना है और जैसे ही मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि अब इसे इसमें से निकालकर पाँचवें कुण्ड में डालो तभी मैं क्या देखता हूँ कि कोई व्यक्ति मुझसे मिलने आया है और मेरे बगल में खड़े होकर मुझसे कह रहा है, सर, यह क्या कर रहे हैं ? आप इसे जल्दी पानी में डलवाइये नहीं तो यह मछली मर जाएगी।
अब मैं क्या करता ? डर गया, कहीं हवन करने में हाथ न जल जाय। तुरन्त उसे पानीवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ। जैसे ही उसे पहले कुण्ड में डलवाता हूँ, वह पानी में उछलती है और जोर से छपाक् की आवाज होती है। उस आवाज को सुनकर मेरी नींद खुल जाती है। मैं जाग गया, जागने के बाद आप जानते ही हैं फिर सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, मछली को तो मैंने पानी में डलवा दिया। बात सही है, मैं उसे अमृत कुण्ड में प्रवेश नहीं करा पाया। लेकिन आपके साथ यह यात्रा जारी रहेगी, रुकनेवाली नहीं है, आगे बढ़ती रहेगी। अब अमृत कुण्ड में प्रवेश करने की बारी आपकी है। क्योंकि अन्य कुण्ड में आप पहले ही प्रवेश पा चुके हैं। आपको याद है न, नहीं याद है। आपकी शुरूवात कहाँ से हुई थी? पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था। ठीक से याद कीजिए, पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था, फिर दूध, उसके बाद घी और तब शहद।
अब आपको अमृत कुण्ड में प्रवेश करना है। बताइये यह अमृत कुण्ड कहाँ है ? मैं स्वप्न की बात बता रहा था तो उसमें अमृत कुण्ड कहाँ था ? अरे, शहदवाला कुण्ड हैण्डपम्प के पास था, तो वह अमृत कुण्ड उसके बाद उस पेड़ के पास था। लेकिन आपका अमृत कुण्ड कहाँ है ? यह आपका पाँचवाँ स्टेप है, सोच लीजिए। क्या है पाँचवाँ स्टेप ? पहला पानी में प्रवेश किया, दूसरा दूध में प्रवेश किया, तीसरा घी में, चौथा शहद में और पाँचवाँ अमृत कुण्ड, तो अब अमृत कुण्ड भी देखना चाहेंगे। चलिए , अब आप अमृत कुण्ड भी देख लीजिए।
यह है आपका अमृत कुण्ड। शान्त हो जाइये और देखिये मेरे हाथ की तरफ, इस अमृत कुण्ड में प्रवेश करने के बाद मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपका प्रवेश करना शेष है या आपने प्रवेश पा लिया है ? आप कहेंगे पा भी लिया है और बाहर भी आ गये हैं। क्योंकि यह अमृत कलश आप ही से तो बना है, आप ही इसके केन्द्र में हैं और शेष सब परिधि पर है। जो केन्द्र में है वही मूल है, तो आप ही इसके मूल हैं, आप ही इसके जड़ में हैं। क्योंकि यह आप ही के दिनचर्या का वृत्तान्त है। इसमें आप ही के जीवन यात्रा की चर्चा है, आप इसमें पूर्णतः विद्यमान हैं। अतः आपने अमृत कुण्ड में प्रवेश करके अमरत्व प्राप्त कर लिया है।
चूँकि यह अजर और अमर है, इसीलिए आपने भी अमरत्व प्राप्त कर लिया है। कौन अजर-अमर है ? यह कुण्ड और आप इसमें विद्यमान हैं इसलिए आप भी अजर और अमर हो गये। इस अमर गाथा को आगे बढ़ाने के लिए समय कम है, मैं सीधे इसके पृष्ठांकित बातों को आपके सम्मुख रखता हूँ।
प्रिय विद्यार्थियों, समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह बात मुझे आपसे इस समय करनी चाहिए या नहीं, फिर भी अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। जब तक शरीर में हलचल है तभी तक उस पर आत्मा की सत्ता है। जब आत्मा शरीर छोड़ती है, परा पर स्थापित होती है, तो परमात्मा हो जाती है। उसका आचरण, व्यवहार, क्रियाकलाप सब कुछ परमात्मस्वरूप हो जाता है।
अलग से कोई परमात्मा नहीं है। न ही कहीं स्वर्ग है और न ही कहीं नरक, सब कुछ इस पृथ्वी पर ही है। आत्मा स्वयं ही अपने पूर्व के किए गये कर्यों के अनुक्रम में शेष कार्यों को पूर्ण करने के लिए नया शरीर धारण करती है और उसे यह नया जन्म स्वयं ही तय करना होता है, क्योंकि वही परम सत्यस्वरूपब्रह्म हो जाती है।
चूँकि इस शरीर के माध्यम से ही कार्य सम्पादित होते हैं। यही कार्य ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है, ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वह प्रत्येक स्तर पर शरीर के साथ बनी रहती है, या यूँ कहूँ उसी ऊर्जा का घनीभूत रूप आत्मा है जो कभी नष्ट नहीं होती और उसे जन्म दर जन्म आगे बढ़ाती रहती है।
जब हमने ही तय किया है कि इस पृथ्वी पर हमें किस रूप में आना है, क्या करना है, कैसे करना है और ऐसा ही है, तो फिर इस संसार में हम जो कर रहे हैं, वह हमारी उसी सोच के अनुरूप क्यों नहीं है ? जो जान-समझ कर हमने इसका वरण किया है।
फिर यह गड़बड़ी क्यों, कोताही क्यों, लापरवाही क्यों ? क्या इसीलिए हमने यह सब तय किया और यह स्वरूप स्वीकार किया ? इसे समझे, जाने और ऐसे लगें जैसे मानो इसे करके ही मानेंगे, ताकि कल के लिए करने को कुछ शेष न रहे।
प्रिय विद्यार्थियों, यह बात सही है, यह जो भी पुस्तक के रूप में कहिये, जिस रूप में कहिये, आपके बीच से ही आनेवाली चीज है, इसमें आपके क्रियाकलाप, आपकी दिनचर्या, आप कैसे करते हैं वह सब कुछ है। अब इसका भविष्य और आपका भविष्य मुझे लगता है दोनों एक ही रथ के दो पहिये हैं। कल को इसे कहाँ पहुँचना है यह तय है। इसी तय के साथ-साथ अपने जीवन यात्रा की सफलता के लिए चल पड़िये।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
धन्यवाद।अमृत कुण्ड
प्रिय विद्यार्थियों, कल छुट्टी थी। यह छुट्टी भी पता नहीं क्यों इधर कुछ ज्यादा हो रही है। जब छुट्टी हो जाती है, तो कोई काम नहीं रहता। जब कोई काम नहीं रहता है, तो आप क्या करते हैं ? किसने जबाब दिया घूमते हैं ? बहुत सही बात कही आपने। अब कौन कहाँ घूमता है ? यह तो उसी पर निर्भर करता है। कोई खड़े होकर गोल-गोल घूमता है, कोई बाजार घूमता है। इस घूमने का मतलब है समय व्यतीत करना। अब सभ्य लोगों के समय व्यतीत करने की कौन सी जगह होती है ? अरे, कहीं बाहर जाएंगे तो दिक्कत ही है। अब घर में कब तक बन्द रहेंगे ? जब घर से मन ऊबता है, तो छत पर चले जाते हैं, सही बात है न, बिल्कुल सही।
अच्छा, तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। कल मैं भी खाली था। समय नहीं बीत रहा था तो छत पर चला गया। मैंने छत से देखा कि जो बगल में गड्ढा है वह पानी से भरा है और उसमें मछलियाँ तैर रही हैं। मैं जलचर की बात कर रहा हूँ। मैं छत से देख रहा हूँ कि बगलवाले गड्ढे में जिसमें पानी भरा हुआ है, उसमें मछलियाँ हैं और कुछ लोग मछली पकड़ रहे हैं। अब मछली पकड़ने के क्रम में एक मछली उछलकर बाहर आ जाती है। कुछ ऐसा होता है कि एक बड़ी मछली बहुत तेज उछलती है और गड्ढे से बाहर आ जाती है। तब वे सब दौड़कर उसे दबोच लेते हैं, पकड़ लेते हैं।
चूँकि उधर वे सब मछली पकड़ रहे हैं और इधर मैं कष्ट में पड़ रहा हूँ। जाने क्यों मुझे उस मछली पर बहुत तरस आ रहा है। फिर मैंने सोचा, चलो यह तो उसकी नियति है, आज नहीं तो कल उसके साथ ऐसा ही होना है। इसलिए मेरा हस्तक्षेप करना बहुत मायने नहीं रखता है। यदि मैं अभी हस्तक्षेप करके उसे छुड़वा भी दूँ, उसे पानी में डलवा भी दूँ, तो कल वे सब फिर उसे उस समय पकड़ ले जाएंगे जब मैं नहीं देख रहा होऊँगा। चलो छोड़ो, जाने दो, कुछ और सोचो।
अब उन सबका काम हो चुका है, थोड़ी देर में वे सब चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही वे सब जाते हैं, न जाने क्यों मेरी बेचैनी बढ़ने लगती है, मेरा मन विचलित हो जाता है, मैं बहुत बेचैनी महसूस करने लगता हूँ। मेरे मन में आज पहली बार जाने क्यों ऐसा हो रहा है, उस मछली पर इतना तरस आ रहा है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। बार-बार मेरे मन में यही बात उठ रही है कि काश, मैं उस मछली को बचा पाता, मैं उन्हें रोक पाता, बहुत बड़ा पुण्य का कार्य होता और आज का मेरा दिन सफल हो जाता। क्यों ? क्योंकि मैं किसी निर्दोष जीव की रक्षा कर लेता। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया, क्योंकि वे अब मछली को ले जा चुके हैं। मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा और मेरा पूरा दिन यह सोचते बीत गया कि काश, मैं उस मछली को छुड़ा पाता, उसे जीवनदान दिला पाता। अब तो वह बात हाथ से निकल गई तो निकल गई।
दिन तो बीत गया अब रात की बारी आती है। रात में क्या होता है ? रात में मुझे स्वप्न आता है। जैसे ही मैं सोया, स्वाभाविक है स्वप्न देखना ही देखना है। कहते भी हैं कि आदमी जो दिन में सोचता है, वही रात स्वप्न में भी देखता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही मैं स्वप्नलोक पहुँचा तो देखता हूँ कि सब कुछ बदल गया है। अब पहलेवाली स्थिति नहीं है क्योंकि अब वह मछली जो कूदकर बाहर आ गई थी, वह मेरे कब्जे में है। अब पूछिए कैसे ? जैसे ही मछली कूदती है, मैं अपने कर्मचारी को भेजता हूँ कि दौड़ो, देखो, उस मछली को ले आओ। मैं उस मछली को मँगवा लेता हूँ और एक शुद्ध जल कुण्ड में रखवाता हूँ।
जल कुण्ड समझ रहे हैं और वह जल कुण्ड कहाँ है ? जहाँ आप खड़े हैं वहीं जल कुण्ड है। ऐसा सपने में हो सकता है। यहाँ आप डूबनेवाले नहीं हैं, चिन्ता मत कीजिए। आप जहाँ हैं, वहीं रहिये। इस जल कुण्ड में स्वच्छ एवं निर्मल जल है। मैं उस जल कुण्ड में मछली को डलवा देता हूँ। मछली उसमें तैरने लगती है, यह देखकर मुझे बड़ा आनन्द आता है। लेकिन मेरे मन में फिर एक बात आती है कि जब से इस मछली का जन्म हुआ होगा तभी से यह पानी में रह रही है। मुझे इसके लिए कुछ अतिरिक्त करना चाहिए।
मैंने सोचा, कुछ और नहीं तो इतना जरूर कर सकता हूँ कि इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ जाय। मुझे मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाना है। अब मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए क्या करना होगा ? अरे, उसे कपड़ा तो पहनाने से रहा, कोट तो पहना नहीं सकता। मछली का स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए जो पानीवाला कुण्ड है, उसके बगल में मैं एक और कुण्ड बनवाता हूँ। बनवाता क्या अब स्वप्न की बात है तो जैसा चाहिए वैसा हो जाएगा।
जल कुण्ड के बगल में एक दूसरा कुण्ड जिसमें दूध भरा हुआ है। दूध से भरे हुए तालाब के बारे में क्या आपने कभी सुना है ? मैंने अपने कर्मचारी से कहा कि इस मछली को जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डाल दो। आप पानी पीते हैं और दूध भी पीते हैं। आप दूध क्यों पीते हैं? क्योंकि दूध में पौष्टिकता होती है। मेरे मन में यह बात है कि मछली को जल से निकालकर यदि दूध के कुण्ड में डाल देंगे तो उसे लाभ होगा और वह तन्दुरूस्त हो जायेगी क्योंकि दूध पौष्टिक होता है। मैं इस तरह से मछली का लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने के लिए उसे जलवाले कुण्ड से निकालकर दूधवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ।
अब क्या होगा ? जैसे ही वह मछली दूधवाले कुण्ड में जाती है, छटपटाने लगती है। अब मैं तो उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ, लेकिन वह जैसे ही दूधवाले कुण्ड में डाली जाती है, छटपटाने लगती है। मेरी परेशानी बढ़ती है, मुझे लगता है कि शायद दूध उसे सूट नहीं कर रहा है। कभी-कभी आपके साथ भी ऐसा होता है। कई लोगों को दूध सूट नहीं करता है और पीते ही उल्टी कर देते हैं। यह बात मेरे दिमाग में आती है, तो मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि इसे दूध सूट नहीं कर रहा है, तुम इसे बगलवाले कुण्ड में डाल दो।
बगलवाला कुण्ड किससे भरा है ? पानी तो पहले कुण्ड में है। पहले में पानी है, दूसरे में दूध है और तीसरे में घी है। लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाने की बात हो रही है, न तो अब दूध से बढ़िया चीज चाहिए। दूध से बढ़िया चीज शुद्ध घी है और वह भी गाय का। अब मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ। क्योंकि घी और ज्यादा पौष्टिक होता है। अब मुझे लगता है कि हो सकता है कि वह घी वाले कुण्ड में जाय तो प्रसन्न हो जाय।
जैसे ही मैं उसे घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो क्या स्थिति होती है ? क्या वह प्रसन्न हो जाती है ? उसे जब मैं घी वाले कुण्ड में डलवाता हूँ, तो वहाँ भी वह छटपटाती ही है। अब मेरी परेशानी और बढ़ती है। मैं उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा रहा हूँ और उसे पता नहीं क्या हो गया है कि छटपटा रही है। बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। पानी में थी तो ठीक थी। मैंने उसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ाकर दूध में डाला तो वह वहाँ भी छटपटायी। अब घी में डलवाया तो यहाँ भी वही स्थिति है। अब मुझे लगा कि दूध और दूध से बनी चीज घी इसे सूट नहीं कर रहा है और इसके छटपटाने का यही कारण है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह छटपटाती क्यों ? मस्त रहती घी में भी, दूध में भी।
फिर मुझे क्या करना है ? अब उसे घी से निकालना है। क्योंकि मैंने यह मान लिया कि उसे दूध से बनी हुई चीजों से एलर्जी है। वह दूध में भी छटपटा रही थी और घी में भी छटपटा रही है। अब मुझे किसी ऐसे कुण्ड में डालना है जहाँ वह प्रसन्न रहे। तीन कुण्ड हो गये, अब चौथे में ले चलना है। वह चौथा कुण्ड बगल में उस हैण्डपम्प के पास है। अब आप बताइये इसमें क्या होगा ? पानी, दूध और घी के बाद अब किसी अच्छी चीज का नाम लीजिए। हाँ, अच्छी चीज सोच ली गई है। वह कुण्ड शहद से भरा हुआ है।
अब मैं उसे घी वाले कुण्ड से निकलवाकर शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ। मुझे लगता है कि अब वह यहाँ ठाठ से रहेगी। क्यों ? शहद का कुण्ड है, मीठा भी है। जैसे ही मैं उसे उस शहदवाले कुण्ड में डलवाता हूँ तो थोड़ी देर तक तो सहज रहती है। मुझे प्रसन्नता होती है कि चलो, बड़ा अच्छा हुआ, मैंने इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा दिया। अब वह शहद में खूब आराम से रहेगी। लेकिन थोड़ी देर बाद वह फिर छटपटाने लगती है। जरूर मीठा-मीठा लगा होगा तो थोड़ी देर सहज रही होगी।
लेकिन जब वह शहद में भी छटपटाने लगती है, तो मेरी परेशानी बढ़ती है। आखिर मैं इसके लिए क्या कर पाया ? वहाँ से पकड़वाकर मँगवाया भी, जीवन रक्षा भी करवाया और उसके लिए मैं कुछ एक्स्ट्रा नहीं कर पाया। इससे अच्छा होता कि वह वहीं पानी में पड़ी रहती। उसे पानी में डलवाया, दूध में डलवाया, घी में और अब शहद में और अब शहद में भी वह परेशान है । अब उसकी परेशानी मेरी समझ से परे है।
इस बार मैंने भी निर्णय ले ही लिया कि अब मुझे इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा ? अभी बगल में एक कुण्ड और है, मुझे एक बार और प्रयास करना चाहिए। अब आप बताइये उस कुण्ड में क्या है ? कोई एक बोले, आप बतायें, कोई एक बता सके तो बतायें फिर आगे बढ़ें। इमेजिन करना नहीं जानेंगे तो सारी पढ़ाई बेकार है। वह कुण्ड किसका है यह मैं ही बता देता हूँ। अच्छा, क्या कह रहे हैं आप? दही । अरे, जब घी में डाल दिया तो दही, दूध और घी के बीच आता है। हाँ चलिए, मैंने तय कर लिया। मैने बताया न कि इस बार इसका लीविंग स्टैण्डर्ड बढ़ा ही देना है और इसके लिए मेरे पास बस एक उपाय है।
अब यह जो पाँचवाँ कुण्ड है, वह अमृत कुण्ड है। इस बार मुझे उसे अमर ही कर डालना है और जैसे ही मैं अपने कर्मचारी से कहता हूँ कि अब इसे इसमें से निकालकर पाँचवें कुण्ड में डालो तभी मैं क्या देखता हूँ कि कोई व्यक्ति मुझसे मिलने आया है और मेरे बगल में खड़े होकर मुझसे कह रहा है, सर, यह क्या कर रहे हैं ? आप इसे जल्दी पानी में डलवाइये नहीं तो यह मछली मर जाएगी।
अब मैं क्या करता ? डर गया, कहीं हवन करने में हाथ न जल जाय। तुरन्त उसे पानीवाले कुण्ड में डलवा देता हूँ। जैसे ही उसे पहले कुण्ड में डलवाता हूँ, वह पानी में उछलती है और जोर से छपाक् की आवाज होती है। उस आवाज को सुनकर मेरी नींद खुल जाती है। मैं जाग गया, जागने के बाद आप जानते ही हैं फिर सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, मछली को तो मैंने पानी में डलवा दिया। बात सही है, मैं उसे अमृत कुण्ड में प्रवेश नहीं करा पाया। लेकिन आपके साथ यह यात्रा जारी रहेगी, रुकनेवाली नहीं है, आगे बढ़ती रहेगी। अब अमृत कुण्ड में प्रवेश करने की बारी आपकी है। क्योंकि अन्य कुण्ड में आप पहले ही प्रवेश पा चुके हैं। आपको याद है न, नहीं याद है। आपकी शुरूवात कहाँ से हुई थी? पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था। ठीक से याद कीजिए, पहले आपने पानीवाले कुण्ड में प्रवेश किया था, फिर दूध, उसके बाद घी और तब शहद।
अब आपको अमृत कुण्ड में प्रवेश करना है। बताइये यह अमृत कुण्ड कहाँ है ? मैं स्वप्न की बात बता रहा था तो उसमें अमृत कुण्ड कहाँ था ? अरे, शहदवाला कुण्ड हैण्डपम्प के पास था, तो वह अमृत कुण्ड उसके बाद उस पेड़ के पास था। लेकिन आपका अमृत कुण्ड कहाँ है ? यह आपका पाँचवाँ स्टेप है, सोच लीजिए। क्या है पाँचवाँ स्टेप ? पहला पानी में प्रवेश किया, दूसरा दूध में प्रवेश किया, तीसरा घी में, चौथा शहद में और पाँचवाँ अमृत कुण्ड, तो अब अमृत कुण्ड भी देखना चाहेंगे। चलिए , अब आप अमृत कुण्ड भी देख लीजिए।
यह है आपका अमृत कुण्ड। शान्त हो जाइये और देखिये मेरे हाथ की तरफ, इस अमृत कुण्ड में प्रवेश करने के बाद मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपका प्रवेश करना शेष है या आपने प्रवेश पा लिया है ? आप कहेंगे पा भी लिया है और बाहर भी आ गये हैं। क्योंकि यह अमृत कलश आप ही से तो बना है, आप ही इसके केन्द्र में हैं और शेष सब परिधि पर है। जो केन्द्र में है वही मूल है, तो आप ही इसके मूल हैं, आप ही इसके जड़ में हैं। क्योंकि यह आप ही के दिनचर्या का वृत्तान्त है। इसमें आप ही के जीवन यात्रा की चर्चा है, आप इसमें पूर्णतः विद्यमान हैं। अतः आपने अमृत कुण्ड में प्रवेश करके अमरत्व प्राप्त कर लिया है।
चूँकि यह अजर और अमर है, इसीलिए आपने भी अमरत्व प्राप्त कर लिया है। कौन अजर-अमर है ? यह कुण्ड और आप इसमें विद्यमान हैं इसलिए आप भी अजर और अमर हो गये। इस अमर गाथा को आगे बढ़ाने के लिए समय कम है, मैं सीधे इसके पृष्ठांकित बातों को आपके सम्मुख रखता हूँ।
प्रिय विद्यार्थियों, समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह बात मुझे आपसे इस समय करनी चाहिए या नहीं, फिर भी अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। जब तक शरीर में हलचल है तभी तक उस पर आत्मा की सत्ता है। जब आत्मा शरीर छोड़ती है, परा पर स्थापित होती है, तो परमात्मा हो जाती है। उसका आचरण, व्यवहार, क्रियाकलाप सब कुछ परमात्मस्वरूप हो जाता है।
अलग से कोई परमात्मा नहीं है। न ही कहीं स्वर्ग है और न ही कहीं नरक, सब कुछ इस पृथ्वी पर ही है। आत्मा स्वयं ही अपने पूर्व के किए गये कर्यों के अनुक्रम में शेष कार्यों को पूर्ण करने के लिए नया शरीर धारण करती है और उसे यह नया जन्म स्वयं ही तय करना होता है, क्योंकि वही परम सत्यस्वरूपब्रह्म हो जाती है।
चूँकि इस शरीर के माध्यम से ही कार्य सम्पादित होते हैं। यही कार्य ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है, ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वह प्रत्येक स्तर पर शरीर के साथ बनी रहती है, या यूँ कहूँ उसी ऊर्जा का घनीभूत रूप आत्मा है जो कभी नष्ट नहीं होती और उसे जन्म दर जन्म आगे बढ़ाती रहती है।
जब हमने ही तय किया है कि इस पृथ्वी पर हमें किस रूप में आना है, क्या करना है, कैसे करना है और ऐसा ही है, तो फिर इस संसार में हम जो कर रहे हैं, वह हमारी उसी सोच के अनुरूप क्यों नहीं है ? जो जान-समझ कर हमने इसका वरण किया है।
फिर यह गड़बड़ी क्यों, कोताही क्यों, लापरवाही क्यों ? क्या इसीलिए हमने यह सब तय किया और यह स्वरूप स्वीकार किया ? इसे समझे, जाने और ऐसे लगें जैसे मानो इसे करके ही मानेंगे, ताकि कल के लिए करने को कुछ शेष न रहे।
प्रिय विद्यार्थियों, यह बात सही है, यह जो भी पुस्तक के रूप में कहिये, जिस रूप में कहिये, आपके बीच से ही आनेवाली चीज है, इसमें आपके क्रियाकलाप, आपकी दिनचर्या, आप कैसे करते हैं वह सब कुछ है। अब इसका भविष्य और आपका भविष्य मुझे लगता है दोनों एक ही रथ के दो पहिये हैं। कल को इसे कहाँ पहुँचना है यह तय है। इसी तय के साथ-साथ अपने जीवन यात्रा की सफलता के लिए चल पड़िये।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
शिवोऽहम्
मैं कल्याणकारी हूँ।
धन्यवाद।