प्रिय विद्यार्थियों, आज की कथा वार्ता यहाँ से अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर स्थित उस स्थान की है, जिसे आज से लगभग दो हजार पाँच सौ सतहत्तर वर्ष पूर्व इस दुनिया को मध्यम मार्ग, पंचषील, सम्यक जीवन का संदेष देने वाला व्यक्तित्व अपनी जीवन यात्रा के अन्तिम पड़ाव के रूप में चुनता है।
आप समझ रहे होंगे, मैं किस व्यक्ति की और किस स्थान की बात आपसे करना चाहता हूँ। तो बताइए, किसकी बात कर रहा हूँ ? भगवान बुद्ध की और उस समय का कुशीनारा, जो आज का कुशीनगर हो गया है।
एक दिन की बात है। बुद्ध का प्रातःकालीन प्रवचन चल रहा था। जैसे ही प्रवचन समाप्त हुआ, एक शिष्य बुद्ध की ओर देखता है, मानो कुछ कहना चाहता हो।
बुद्ध ने कहा- कहो।
शिष्य ने कहा- मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं। आप देख भी सकते हैं। बुद्ध के शिष्य क्या पहनते थे ? पता है आपको ? आज भी पहनते हैं। वस्त्र के रूप में क्या पहनते हैं ? क्या नाम है उसका ? उसे चीवर कहते हैं। एक ही वस्त्र होता है, ऊपर से नीचे तक। अभी शिष्य कुछ और भी कहता, तब तक बुद्ध ने दूसरे शिष्य को भेजकर वस्त्र मँगवाए और शिष्य को दिलवा दिए।
एक संध्या वह शिष्य प्रवचन में नहीं आया। बुद्ध को चिन्ता हुई, बात स्वाभाविक है, गुरु को शिष्य की चिन्ता रहती ही है। प्रवचन के समाप्त होते ही बुद्ध उस शिष्य के साधना कक्ष में पहुँचते हैं। शिष्य लेटा हुआ है। बुद्ध ने उसका कुशल क्षेम पूछा। शिष्य का स्वास्थ्य कुछ हल्का था ही, बुद्ध ने तुरन्त आवश्यक व्यवस्था कराई। फिर, और कुछ तो नहीं चाहिए, की जिज्ञासा जाहिर की।
शिष्य ने कहा- जो वस्त्र मुझे मिले हैं उसमें मैं बिल्कुल आराम से हूँ, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
शिष्य ने क्या कहा ? शिष्य ने यही कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप होते तो क्या कहते ? क्या-क्या नहीं कहते। छोड़िए, आइए आगे बात करते हैं।
बुद्ध ने शिष्य से पूछा- अब जब तुम्हारे पास नए वस्त्र आ गए हैं, तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया ?
यह शायद सहज जिज्ञासा ही रही हो बुद्ध के मन में कि शिष्य ने पुराने वस्त्रों का क्या किया होगा ?
शिष्य ने कहा- अब उन्हें ओढ़ने के लिए प्रयुक्त कर रहा हूँ।
बुद्ध ने शिष्य से पूछा- फिर ओढ़ने के वस्त्रों का क्या किया तुमने ?
शिष्य ने कहा- अब उनसे बिछाने का काम लेता हूँ।
बुद्ध ने फिर पूछा- और उन बिछाने के वस्त्रों का क्या करते हो ?
शिष्य ने कहा- देखिए, बिछाने का जो वस्त्र है, उसे मैंने खिड़की पर लगा रखा है, अब मैं उसका पर्दे के रूप में इस्तेमाल कर रहा हूँ।
बुद्ध ने फिर पूछा- तो पुराने पर्दे के कपड़ों का क्या किया ?
शिष्य ने कहा- उनको मैंने चार टुकड़ों में बाँट दिया और रसोई में उससे गरम बर्तन उठाने और रखने का काम करता हूँ।
ऐसे कपड़े को क्या कहते हैं ? सपटा। सुना है आपने ? रसोई में जो कपड़ा यूज होता है, बरतन इधर-उधर करने में, उसे सपटा कहते हैं। शिष्य ने कहा कि पर्दे के कपड़े को मैंने चार भागों में बाँट दिया और उससे रसोई में गरम बरतनों को उठाने और रखने का काम करता हूँ।
बुद्ध ने फिर पूछा- तो फिर रसोई में प्रयुक्त होने वाले उन कपड़ों का क्या हुआ ?
शिष्य ने कहा- उनसे मैं कमरे में झाड़-पोछ का काम करता हूँ।
बुद्ध ने फिर पूछा- तब तो तुमने उन पुराने झाड़-पोछ वाले कपड़े को फेंक दिया होगा।
शिष्य ने कहा- जरूर फेंक दिया होता, क्योंकि वे इतने जीर्ण-शीर्ण हो गए थे, इतने तार-तार हो गए थे कि उनका कोई मतलब नहीं था, लेकिन मैंने उन्हें फेंका नहीं। बड़ी कोशिश करके उनके धागे निकाल लिए, उनसे बाती बनाई और देखिए, उन्हीं बातियों में से एक बाती इस दीए में प्रकाश कर रही है।
बुद्ध और उनके शिष्य के बीच का संवाद यहीं पूरा हुआ। बुद्ध शिष्य से सन्तुष्ट हुए और प्रसन्न मन से चले आए।
प्रिय विद्यार्थियों, अब जब आज के परिप्रेक्ष्य में हम इस घटना की विवेचना करते हैं तो हमें अपने क्रियाकलाप कितने हास्यास्पद लगने लगते हैं। ऐसा लगता है, जैसे हम हृदयहीन हो गए हैं, हमारा मन सुषुप्त हो गया है, हमारी बुद्धि को काठ मार गया है।
यह घटना अर्थात् बुद्ध और उनके शिष्य के बीच का संवाद हमारी संस्कृति का एक पक्ष है जबकि दूसरा पक्ष जिसे आज हम जी रहे हैं। कैसे जी रहे हैं ? यूज एण्ड थ्रो में जी रहे हैं। कहाँ जी रहे हैं ? यूज एण्ड थ्रो के युग में जी रहे हैं।
समझ रहे हो तुम मेरी बात ? रिफिल फेंक देते हो, पेन में स्याही भरने की जरूरत नहीं होती। पेन लाए पाँच रुपये का, लिखे, फेंक दिए। क्या है यह ? कल हमें भी फेंक दोगे जब काम निकल जाएगा, कहोगे कि बूढ़े हो गए हैं, झूठे बकबक किए रहते हैं रोज सुबह-सुबह।
बुद्ध के शिष्य के लिए अपने उस जीर्ण-शीर्ण वस्त्र का भी कितना अर्थ था और उसकी उपयोगिता, निर्वाद। कितना अद्भुत, आष्चर्य और विस्मययुक्त ! और हमारी आज की दिनचर्या, आज का जीवन ? मतलब निकल गया, काम निकल गया तो हम पहचानते नहीं। याद है आपको न, मतलब निकल गया, काम निकल गया तो हम पहचानते नहीं। नदी पार कर गए अब नाव से क्या मतलब ?
आज आदमी अपनी गरज का बावला हो गया है। कब, किससे, कैसे अपना उल्लू सीधा करें और आगे बढ़ जाएं ? भले ही जिसने आपका भला किया है, उसे गड्ढे में ढकेलना पड़े, बाज नहीं आने वाले।
आखिर यह है क्या ? मुझे तो लगता है हम अन्धी दौड़ के अलावा कुछ भी तो नहीं कर रहे हैं। जैसे हम सभी अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर जीवनयापन कर रहे हैं।
जब मैं छोटा था, आपके जैसे ही स्कूल में पढ़ता था, तो उन दिनों लंगड़ी दौड़ हुआ करती थी। आप नहीं दौड़े हैं लंगड़ी दौड़। दौड़े हैं ? कैसे होती है लंगड़ी दौड़ ? दो बच्चे आपस में अपना एक-एक पैर बाँध लेते हैं और वह दौड़ होती है तीन टाँग पर।बुद्धिमानी होती है कि वह स्टेप ऐसे पड़े कि पीछे का स्टेप उठे।
आप समझ रहे हैं लंगड़ी दौड़ ? दो बच्चे एक साथ, एक दूसरे के कन्धों पर हाथ रखते, दोनों का एक पैर बँधा होता और उन्हें दौड़ना होता। पहले यह लंगड़ी दौड़ हुआ करती। उसमें क्या था ? उसमें सहयोग और सहकारिता की भावना की शिक्षा थी कि मिलकर कैसे दौड़ सकते हैं।
आज हम कौन-सी दौड़, दौड़ रहे हैं ? कुर्सी दौड़। जानते हैं कुर्सी दौड़ में क्या होता है ? एक कुर्सी कम रखी जाती है और उसके चारों ओर दौड़ना होता है। कुल मिलाकर क्या करना होता है ? कुर्सी छीनना होता है, जो पहले बैठ गया, कुर्सी उसकी हो गई और दूसरा बाहर।
तो आज हम क्या करने में लगे हैं ? कुर्सी छीनने में लगे है। कैसे कुर्सी छीन लें ? एक समय आज है, जब हर कोई अपने करीबी से करीबी को पछाड़ने में, मात देने में अपना गौरव समझता है। पहले, पिता से पुत्र आगे जाए, यह पिता के लिए गर्व की बात हुआ करती थी किन्तु आज हम कहाँ खड़े हैं ? इस पर कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है। कभी कहा जाता था-
नेकी कर दरिया में डाल।
दरिया समझते हैं ? खूब समझते हैं। पहले बात आती थी कि नेकी कर दरिया में डाल। आज नेकी से पहले हम दरिया खंगालते हैं। हम उस जलकुण्ड को, उस तालाब को, उस नदी को खंगालते हैं।
मैं ऐसा क्यों करूँ ? इससे मुझे क्या फायदा होगा ? हमें केवल फायदा ही फायदा दिखाई देता है और परिणाम- केवल नुकसान और नुकसान ही भोगना पड़ता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आह भरने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता है।
मैं तुम्हें कैसे आगाह करूँ ? क्या अब भी हम बुद्ध के उस शिष्य की तरह सोच सकने की स्थिति में हैं ? जिसे केवल उतना ही चाहिए, जितनी उसकी न्यूनतम आवश्यकता है। यदि नहीं, तो हमारा भी वही हाल होगा जो आज के समाज में तथाकथित उपलब्धि प्राप्त लोगों का है। वही इस सृष्टि के विनाश के नायक भी हैं। जब भी इस सृष्टि का दोहन हुआ है, देर-सवेर उसने अपना प्रभाव दिखाया है। आप भी जानते हैं, मैं भी जानता हूँ, सभी जानते हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, तय हमें करना है, हम विनाश के साथ हैं या उन स्थितियों-परिस्थितियों के साथ, जिनके बल पर हम इस समाज को उस ऊँचाई पर पहुँचा सकते हैं जो कभी हमारे लिए शान की बात हुआ करती थी। हम सक्षम हैं, हम ऐसा कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए पहले हमें अपने हृदय, मन और बुद्धि को साधना होगा।
यह साधना जटिल तो है लेकिन सम्भव है। कठिन तो है लेकिन तुम कर सकते हो। इसके लिए और किसी की जरुरत भी नहीं है तुम स्वयं पर्याप्त हो। बस, तय कर लो, लग जाओ।
अब बताइए, क्या आपके पास हृदय है ? क्यों, बोलती बन्द हो गई ? मैं पूछ रहा हूँ- क्या आपके पास हृदय है या आप हृदयहीन हैं ? अरे वाह, मजा आ गया ! सभी हृदय वाले हैं। घोर आश्चर्य ! आइए, हृदय की बात कर लेते हैं। आप हृदयहीन नहीं है, मैं जानता था इस बात को। यहाँ कोई स्वीकार करने वाला नहीं है कि उसके पास हृदय नहीं हैं, वह हृदयहीन नहीं है। आप सभी को रामनरेश त्रिपाठी जी की एक पंक्ति याद होगी ही। कौन-सी पंक्ति ?
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रसधार नही।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
यह हृदय है, चाहे रामनरेश त्रिपाठी जी कहें, चाहे मैं कहूँ, चाहे आप कहें, यह हृदय है। जिसे सहृदय कहना ज्यादा सही होगा, ज्यादा सटीक होगा। आपके पास ऐसा ही हृदय है, यह बड़ी अच्छी बात है। हृदय अर्थात् संवेदना, संवेदनशील अर्थात् सकारात्मक दृष्टि सम्पन्न व्यक्तित्व जो आप हैं ही। अरे वाह ! और क्या चाहिए, इससे बड़ी उपलब्धि आपको और क्या चाहिए ? अब तो मिल ही रही है।
चलिए आगे चलते हैं, हृदय के बाद किसकी बात आती है ? हृदय से मन और बुद्धि तक चलना है न ? चलिए आगे बात करते हैं मन की। अरे राम ! यह तो सदैव बेमन ही रहता है, मन सदैव बेमन ही रहता है। बताइए मन कहीं टिकता है ? वह तो एक पल में, जैसे पहाड़ टूट रहा हो, अभी यहाँ और अभी सैकड़ो मील दूर।
जैसे-जैसे आप इसके पीछे भागते हैं, वैसे-वैसे आपसे वह लाखों-करोड़ों गुना तेज भागता है। महसूस कीजिए, अभी आप मेरे पास तक आइए और वह दिल्ली चला गया।
कैसे पकड़ोगे अपने मन को ? बहुत टेढ़ा काम है न ? अच्छा पकड़वाते हैं लेकिन पकड़कर हमें दिखाना जरूर। दिखा पाओगे ? नहीं दिखा पाओगे क्योंकि पकड़ोगे तब न ? यही दिक्कत है।
अगर धोखे से कुछ समय के लिए, एक मिनट के लिए भी मन पकड़ में आ गया तो समझो तुम समाधिस्थ। समाधिस्थ समझते हो ? इस सृष्टि की सबसे बड़ी उपलब्धि है समाधिस्थ होना। इससे बड़ी पूँजी इस सृष्टि में कोई दूसरी नहीं है।
लाख दौड़ लगाओ, किसी काम की नहीं है। बस, एक सेकेण्ड का तो खेल है, जैसे ही मन रुका वैसे ही तुम समाधिस्थ। सब कुछ मिल गया तुम्हें, लेकिन मन है कि मानता ही नहीं। कोशिश करके देखो, कहोगे- मानता ही नहीं। सदैव तुम्हें पछाड़े रहता है। हमें-तुम्हें क्या सभी को द्वन्द्व में डाले रहता है।
द्वन्द्व समझते हैं ? कुछ अनिर्णय की स्थिति। हमेशा हमें, तुम्हें अनिर्णय की स्थिति में रखता है। वह हमेशा तुम्हें चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है। क्या करता है मन ? हमेशा तुम्हें चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है। कहता है- देखें, कैसे आगे बढ़ते हो ? तुम चलो इधर और मैं चलूँगा उधर। क्या कहता है ? तुम चलोगे इधर तो मैं चलूँगा उधर, तुम चलोगे उधर तो मैं चलूँगा इधर।
चलो देखते हैं, क्या कर लेंगे तुम्हारे सर ? क्या कर लेंगी तुम्हारी मैडम ? क्या वश का है तुम्हारे मम्मी-पापा के ? और मुझे कहता है आप भी क्या कर लेंगे ? आप भी कुछ नहीं कर सकते।
वह सब निर्भर है तुम्हारे इस मन पर, जो कि तुम्हारी ही बात नहीं मानता। मानता है ? नहीं मानता। फिर कैसे साधोगे इसे, है न कठिन ? मन हमेशा ज़िग-जै़ग डायरेक्शन में चलता है, कभी सीधा नहीं चलता। दौड़कर पकड़ लो जैसे तुम्हारा कोई दोस्त भागता है। फील्ड में देखता हूँ, ऊपरी फ्लोर पर देखा हूँ कई बार। कैसे पकड़ते हो तुम उसे और कैसे भागता है वह ? सीधा भागता है ?
कोई सीधा नहीं भागता, आड़ा-तिरछा भागता है। तभी तो नहीं पकड़ पाते हो। कब पकड़ते हो, बोलो ? जब तुम भागते-दौड़ते थक जाते हो, रुक जाते हो, और तुम्हें रुका देखकर वह भी रुक जाता है, अर्थात् तुमने क्या किया, कैसे पकड़ा उसे ?
कौन काम आता है उस समय ? जो बचा हुआ है तीसरा यानी बुद्धि। पहला हृदय, दूसरा मन, तीसरा बुद्धि। जब तुम रुक जाते हो तो वह भी रुक जाता है, तब किसकी बात आती है ? बुद्धि की बात आती है। बुद्धि लगाते हो न ? बुद्धि लगाते हो, कोई बहाना बनाते हो, कोई रास्ता खोजते हो। यह बुद्धि भी बड़ी विचित्र चीज है-
उमा दारु जोसित की नाई,
सबहिं नचावत राम गोसाई।
दारु मतलब लकड़ी, जोसित मतलब पुतली। लकड़ी की पुतली को क्या कहते हैं ? कठपुतली कहते हैं। लकड़ी की पुतली यानी कि कठपुतली। ‘उमा दारु जोसित की नाई, सबहिं नचावत राम गोसाई’अर्थात् मनुष्य कठपुतली है और यह जो बुद्धि है हमारी यह अकेले सारी सृष्टि को नचा रही है, वह भी कानी अंगुली पर।
ऐसा नहीं है कि उसके लिए बहुत उपक्रम करना होता है, केवल अपनी तर्कशीलता के कारण, विचारशीलता के कारण, ठोस आधार पर होने के कारण बुद्धि, सदैव तथ्यों का निरीक्षण-परीक्षण, खोज-बीन, समझ-बूझ, अनुभव, कारण-निवारण, आदि-अन्त सभी का विश्लेषण करते हुए निर्णय की स्थिति में पहुँचती है और यही कारण है कि उसके द्वारा लिया हुआ निर्णय सही होता है।
लेकिन बुद्धि तो बुद्धि है न ? कभी-कभी उसे भी लगता है, जैसे आपको लगता है, क्या लगता है कभी-कभी ? कभी-कभी उसे भी लगता है- अहम्ब्रह्मास्मि !
वाह ! मेरे जैसा भूतो न भविष्यति। बुद्धि को भी ऐसे ही लगता है और जब बुद्धि को ऐसा लगता है, तो वह भी अपना अतिक्रमण कर जाती है। बुद्धि भी क्या करती है ? अतिक्रमण कर जाती है।
आप कहते है न कि ज्यादा दिमाग लगा दिया है। जब बात बिगड़ती है तब कहते है कि ज्यादा दिमाग लगा दिया, दिमाग भी सीमा में लगाना चाहिए, यानी वह भी अपना अतिक्रमण कर जाती है, अति पर पहुँच जाती है।
अति सर्वत्र वर्जयेत
अर्थात् सबके बाद भी कुछ शेष है, जो हमें सत्य तक पहुँचा सकता है, लेकिन वह क्या है ? बताइए, ऐसा क्या है और क्यों है कि इन सबके बाद भी हम वहाँ नहीं पहुँच पाए हैं, नहीं पहुँच पाते हैं ? जो सत्य है। उसके लिए क्या रास्ता है ? उसका रास्ता भी तुलसीदास जी ने ही बताया है। क्या बताया है ?
बिनु सत्संग विवेक न होई,
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
जब तुलसीदास जी ने यह पंक्ति लिखी होगी तो उन्हें नहीं मालूम रहा होगा कि आज उनकी इस लाइन की व्याख्या यहाँ होनी है। मालूम होगा ? आप कह रहे हैं नहीं मालूम होगा, तो फिर वे लिखेंगे क्यों ? इसलिए लिखे होंगे कि आज उसकी व्याख्या यहाँ होगी।
‘बिनु सत्संग विवेक न होई’, सत्संग का मतलब क्या है ? जो आप सामान्य भाषा में समझते हैं वह आध्यात्मिक सत्संग है, लेकिन जो आपको यहाँ समझना हैं वह अलग है और राम-कृपा ? राम भगवान हैं जिनकी हम पूजा करते हैं, अर्चना करते हैं। तो तुलसीदास जी ने इसी पक्ष में लिखा है सन्तों का सत्संग और भगवान राम की कृपा।
लेकिन हम यहाँ इसे इस रूप में देखते हैं- जब तक आपके हृदय, आपके मन और आपकी बुद्धि के बीच सत्संग अर्थात् सामंजस्य नहीं होगा, तब तक विवेक जागृत होने वाला नहीं है, सम्भव ही नहीं और राम कृपा अर्थात् आदर्श स्थिति ? विचारिए, राम कृपा मतलब आदर्श स्थिति। अब यह कैसे ? समझिए, भगवान श्रीराम क्या थे ?
बोलिए, उनका जीवन क्या था ? वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे। उनका जीवन आदर्श का प्रतीक था। उन्होंने मर्यादा कभी नहीं तोड़ी और आदर्श जीवन जीया। तो श्रीराम आदर्श के प्रतीक हैं, और राम कृपा अर्थात् आदर्श स्थिति। यही आदर्श स्थिति विवेक को जन्म देती है अर्थात् उचित स्थिति को जन्म देती है। तुलसीदास जी कहते हैं-
होई विवेकु मोह भ्रम भागा
मैं रामायण नहीं सुना रहा आपको, मैं तो केवल आपकी स्थिति को आपको समझा रहा हूँ अर्थात् जब तक हमारे अन्दर मोह, भ्रम, यह सब क्या है ? यह सब षट्विकार है, तो यह जब तक हैं, तब तक हम सत्य तक नहीं पहुँच सकते और जैसे ही विवेक उत्पन्न होता है, परिस्थितियाँ हमें वहाँ ले आती हैं, कहाँ ? जहाँ सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् की स्थापना सम्भव है।
प्रिय विद्यार्थियों, यही स्थिति बुद्ध के उस शिष्य के साथ थी, जिसे उसने अपनी साधना से प्राप्त किया था, साधना के बल पर प्राप्त किया था। आप भी एक साधक हैं, आप भी तो एक साधना ही कर रहे हैं, निश्चित ही वह स्थिति प्राप्त करेंगे, जहाँ पहुँचकर आपकी दृष्टि, आपके क्रियाकलाप, आपकी सोच, आपके विचार आदर्श स्थिति में होंगे, आदर्श की स्थापना करेंगे। तब हमें कहना ही होगा कि आप जिस डगर पर चले थे, निश्चित ही, उस मंजिल को पा लिए हैं।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
शिवोऽहम्
मैं कल्याणकारी हूँ।
धन्यवाद।