प्रिय विद्यार्थियों, आज की कथा वार्ता उन दिनों की है जब असुर वृत्तासुर का आतंक अपने चरम पर था। यहाँ तक कि उसने स्वर्ग पर भी कब्जा कर लिया था। सारे देवता स्वर्ग छोड़कर भागे हुए हैं और इसके पीछे जो शक्ति थी वह भगवान शिव का वरदान था। उसने उनकी तपस्या करके वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उसका अन्त कोई नहीं कर सकता।
असुर होने के पीछे की कथा यह है कि यह इसके पूर्व चित्रकेतु नाम का गंधर्व था, उस समय भी यह भगवान शिव का भक्त था। किन्हीं कारणों से माता पार्वती नाराज हो गईं और उन्होंने इसे असुर होने का श्राप दे दिया, इस समय वह असुर योनि में है। लेकिन है बहुत प्रतापी उसके प्रताप को देख ही रहे हैं। उसके प्रताप का परिणाम है कि देवताओं को स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा और उसने स्वर्ग पर साम्राज्य स्थापित कर लिया। देवता चतुर हैं, देवता होशियार हैं, यह भी कहा जा सकता है देवता स्वार्थी हैं। वैसे तो कहा गया है कि-
स्वारथ् लागि करहिं सब प्रीति।
सुर नर मुनि सबकी यह नीति।।
लेकिन देवताओं के साथ यह बात कुछ ज्यादा ही सटीक है। देवताओं को जब पता चला कि वृत्तासुर का अन्त ऋषि दधीचि की अस्थियों से ही सम्भव है। सभी देवता उनके पास पहुँचते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि आप वृत्तासुर का आतंक देख ही रहे हैं। अगर ऐसा ही रहा तो यह सृष्टि नष्ट हो जाएगी और यही एक रास्ता है आपकी अस्थियों से जो अस्त्र बनेगा उसी से वृत्तासुर का अन्त सम्भव है।
जैसे ही ऋषि दधीचि को इस बात का पता चला, उन्हें ज्ञान हुआ, उन्होंने देवताओं की प्रार्थना सुनते ही सहर्ष अपनी अस्थियों का दान कर दिया। उन अस्थियों से विश्वकर्मा ने वज्र का निर्माण किया, और उसी वज्र से वृत्तासुर का संहार हुआ। स्वर्ग पर पुनः देवता स्थापित हुए और पृथ्वी से आतंक, डर, भय समाप्त हो गया।
समय के साथ जब यह कथा माता सुवर्चा ने अपने पुत्र पिप्पलाद को सुनाया तो पिप्पलाद बड़ा क्रोधित हुआ, हो भी क्यों न ? उसके पिता के साथ इतना अन्याय ! वह बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने उसी क्षण प्रण किया, उसी क्षण तय किया कि इन देवताओं से अपने पिता के साथ किए गए अनाचार का बदला अवश्य लेगा और उसी क्षण आश्रम छोड़कर वह गोमती नदी के किनारे पहुँच गया। तपस्या में लीन हो गया। क्योंकि यही एक मार्ग था जिसके द्वारा वह देवताओं को सबक सिखा सकता था। उसने घोर तपस्या की,वर्षों लगा रहा।
एक समय आया जब भगवान शिव प्रसन्न हुए और पिप्पलाद के समक्ष प्रकट हुए और कहा- पिप्पलाद आँखें खोलो, देखो मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुआ। कहो, क्या माँगते हो ? जो भी माँगना है माँग लो, मैं तुम्हें इसी क्षण देता हूँ। तुम्हारी तपस्या सफल हुई।
पिप्पलाद ने कहा- आप मेरी कठिनाई, कष्ट, दुःख समझ ही रहे हैं, आप जानते ही हैं कि देवताओं ने मेरे पिता के साथ अन्याय किया है और मैं उसी अन्याय का प्रतिशोध लेना चाहता हूँ, इसीलिए मैंने आपकी इतनी विकट तपस्या की है। अब आप प्रसन्न ही हैं तो कृपा कर मुझे जो वर आप देने जा रहे हैं उस वर में अपना तीसरा नेत्र खोल दें और इन देवताओं को भस्म कर दें।
पिप्पलाद यही चाहता था कि देवताओं का नाश हो जाए और इसीलिए उसने भगवान शिव की तपस्या की थी। भगवान प्रसन्न हुए और उसने वर माँगा कि आप अपना तीसरा नेत्र खोल दें जिससे देवताओं का नाश हो जाए।
भगवान शिव ने पिप्पलाद को समझाया, कहा- पिप्पलाद तुम समझने की कोशिश करो, मेरे तीसरे नेत्र के खुलते ही सारी सृष्टि जलकर भस्म हो जाएगी।
पिप्पलाद ने कहा- प्रभु इससे मुझे कोई मतलब नहीं, अभी बालक है वह। अभी उसे उतनी समझ नहीं है, वह ज़िद पर है, कहता है- चाहे सृष्टि जलकर भस्म हो जाए, चाहे कुछ भी हो जाए। बस आप इन देवताओं को भस्म कर दीजिए। इससे कम पर मैं मानने वाला नहीं हूँ मैंने आपकी तपस्या की है। आप प्रकट हुए हैं। आपको मुझे मेरे द्वारा माँगे हुए वरदान को देना
होगा।
भगवान शिव ने फिर उसे समझाया, कहा- पिप्पलाद, क्या तुम्हें इस सृष्टि से कोई मोह नहीं है ?
पिप्पलाद ने कहा- भगवन् ! जरूर है। किन्तु मैं इन देवताओं को किसी भी कीमत पर देखना नहीं चाहता। अब चाहे जो हो, आप मेरा निवेदन स्वीकार करें और इन देवताओं को भस्म कर दें।
बालक की ज़िद है, भगवान करें तो क्या ? तीसरा नेत्र खोलते हैं परिणाम से आप स्वयं वाकिफ हैं। लेकिन कुछ तो रास्ता निकालना ही है, अब भगवान शिव मुस्कुराते हैं, कहते हैं- पिप्पलाद, जब तुम नहीं मान रहे हो तो मुझे कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा।
ऐसा करो कि तुम पहले मेरे रौद्र रूप का दर्शन करो, उसके बाद फिर आगे हम लोग विचार करेंगे। भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया। पहले कपाल माली फिर विरुपाक्ष, पत्रलोचन और फिर अहिरभूषण फिर अन्य रूप। इन रूपों का दर्शन जैसे ही पिप्पलाद को होता है, दर्शन करते ही उस प्रचण्ड ज्वालामय स्वरूप से पिप्पलाद को लगा कि मेरा रोम-रोम भस्म हुआ जा रहा है जब पिप्पलाद को लगा कि अब तो मैं भस्म ही हो जाऊँगा, जलकर नष्ट ही हो जाऊँगा तो उसने भगवान शिव को पुकारा और कहा- आशुतोष आप यह क्या कर रहे हैं ? मैंने तो आपसे देवताओं को भस्म करने की प्रार्थना की थी और आप हैं कि मुझे ही भस्म किए जा रहे हैं।
भगवान शिव ने कहा- पिप्पलाद मैं तुम्हें यही तो दिखाना चाहता हूँ विनाश भले ही किसी एक छोटे से बिन्दु से प्रारम्भ हो, किन्तु वह वहीं तक सीमित नहीं रहता है, उसका स्वरूप धीरे-धीरे विराट हो जाता है। उसमें सब कुछ समाहित हो जाता है।
अब तुम्हें यह समझना होगा कि जो तुम्हारे साथ घट रहा है, वह कुछ अलग से नहीं घट रहा है, वही तुमने चाहा है। अब तुम्हीं बताओ, क्या तुम्हारे हाथ के देवता इन्द्र नहीं हैं? क्या तुम्हारे नेत्र के देवता सूर्य नहीं हैं, क्या तुम्हारे नाक के देवता अश्विनी कुमार नहीं हैं ? क्या तुम्हारे मन के देवता चन्द्रमा नहीं हैं ?
अब तुम देवताओं को ही भस्म करना चाहते हो तो शुरुआत तुमने देख ही ली। अगर ये देवता भस्म होते हैं तो तुम बच नहीं सकोगे। तुम बचोगे भी कैसे ? जब तुम्हारा यह शरीर नहीं बचेगा तो तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होने का अर्थ ही क्या है ? और तुम यही चाहते हो। अब बताओ मात्र मेरे रौद्र रूप के दर्शन से तुम्हारी यह स्थिति हो गई, तुम्हें लगने लगा तुम स्वयं भस्म हो रहे हो तो तीसरा नेत्र खोलने की स्थिति से तुम वाकिफ हो ही रहे होगे।
प्रिय विद्यार्थियों, कहना नहीं होगा कि पिप्पलाद दौड़कर भगवान शिव के चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा माँग लिया।
भगवान शिव ने कहा- पिप्पलाद यह समझना ही होगा कि इस सृष्टि में जो कुछ भी है वह तुम्हारे रोम-रोम में व्याप्त है। क्योंकि जिन तत्वों से यह सृष्टि बनी है उन्हीं से यह शरीर भी बना है और रही बात इन देवताओं की तो इन्होंने जरूर तुम्हारे पिता के साथ अन्याय किया है। किन्तु यह प्रथम दृष्टया ही सत्य है, यह वास्तविक सत्य नहीं है, इसमें वास्तविकता नहीं है।
वास्तविकता यह है कि तुम्हारे पिता का जन्म ही इसी उद्देश्य के लिए हुआ था, कि उनकी अस्थि से इस सृष्टि की रक्षा हो। तुम्हारे पिता की अस्थि से ही वृत्तासुर का अन्त होना पहले से ही तय था। यह भी तय था कि जब देवताओं को पता चलेगा, वे तुम्हारे पिता के पास जाएँगे, उनसे निवेदन करेंगे और वे स्वयं सहर्ष इस बात को स्वीकार करेंगे, अपनी अस्थि देंगे, उस अस्थि से विश्वकर्मा वज्र बनाएंगे और उसी वज्र से वृत्तासुर का अन्त होगा।
क्या तुम्हें नहीं लगता है कि तुम्हारे पिता ने अपनी अस्थियों का स्वयं कितना सार्थक उपयोग किया है, जो तुम नहीं कर सकते थे और यही कारण है कि यह धरती जब तक है तब तक ऋषि दधीचि का नाम अमर रहेगा। अब तुम्हें इस बात का गर्व होना चाहिए कि तुम ऐसे पिता के पुत्र हो जिनकी ऋणी यह सृष्टि स्वयं है।
प्रिय विद्यार्थियों, इतना कहकर भगवान शिव अन्तर्ध्यान हो गए। किन्तु यहाँ यह कथा आपको एक निश्चित संदेश देती है। वह यह कि आप इस सृष्टि के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आप अपने महत्त्व को समझें और इस सृष्टि को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर बनाने में अपना योगदान करें। अब आप हैं कि इससे केवल लेना जानते हैं। देने की तो आपकी आदत ही नहीं है। आपको केवल इनटेक्स से मतलब होता है। अब बताइए, क्या-क्या नहीं लेते हम ? और क्या देते हैं इस सृष्टि को ?
सवेरे, अगर प्रातः जागरण की बात की जाए, सवेरे उठने से ही शुरू की जाए तो जैसे ही आप उठते हैं, आपको पता है कि आप सीधे प्रकाश के सम्पर्क में आते हैं। आप सोकर उठते हैं आपकी आँखें बन्द होती हैं, आँखें खुलती हैं आपके सामने प्रकाश-ही-प्रकाश होता है। आप धरती पर पैर रखते हैं, धरती का आप उपयोग करते हैं।
आप श्वास लेते हैं। आप जल का उपयोग करते हैं। आप इस सृष्टि के उत्पादन का उपयोग करते हैं, और क्या-क्या गिनवाया जाए ? गिनवाएँगे तो पूरा दिन लग जाएगा। आपके लिए सृष्टि ने क्या-क्या व्यवस्थाएँ कर रखी हैं, और आप हैं कि उसके लिए कुछ भी नहीं करते वरन् उसको नष्ट करने के लिए, उसे डिस्टर्ब करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।
जरा ठंडे दिमाग से सोचें कोई आपके लिए सदैव अच्छा-ही-अच्छा करता हो और आप उसके लिए खराब-ही-खराब सोचते हों, करते हों, तो यह कितना बड़ा अपराध है। मात्र सोचना ही अपराध है, करना तो महाअपराध की श्रेणी में आता है और आपको तो अपने द्वारा किए जाने वाले इस महाअपराध का बोध भी नहीं है। बताओ, कैसे बात बनेगी ? है न बहुत मुश्किल? लेकिन बात तो बनानी ही पड़ेगी और नहीं तो फिर भगवान ही मालिक हैं, आप स्वयं मालिक हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, अब जरा अपने बारे में सोचें। आपके अन्दर क्या भाव है ? आपकी क्या भावना है अपने प्रति, अपने घर-परिवार के प्रति ? अपने शुभेच्छुओं के प्रति ? और यह जान लें अगर आपने किसी के प्रति अच्छा सोचा है, अच्छा किया है तो आपके प्रति स्वतः ही अच्छा-अच्छा होने लगता है और यदि आपकी भावना दूसरे के प्रति अच्छी नहीं है तो जान लें आपके साथ भी अच्छा नहीं होगा। यह शाश्वत सत्य है, यही प्राकृतिक नियम भी है। तभी तो कहा गया है ‘भली है भलाई’ जो दूसरों का भला करता है
उसका भला भगवान करते हैं अर्थात् यह प्रकृति स्वयं करती है।
अब जरा सोचें ! अगर आप किसी को तंग करते हैं, किसी को परेशान करते हैं, किसी को कष्ट में डालते हैं तो क्या उस समय केवल वही परेशान होता है, वही तंग होता है, वही कष्ट में पड़ता है या निश्चित रूप से आप भी उसी स्थिति में होते हैं। अन्तर बहुत थोड़ा होता है, वह व्यावहारिक रूप से कष्ट में पड़ता है, वह व्यावहारिक रूप से तंग होता है, वह व्यावहारिक रूप से परेशान होता है। किन्तु आप वैचारिक और मानसिक रूप से परेशान रहते हैं, परेशान होते हैं। क्योंकि उस समय आपके मन-मस्तिष्क में वही बात चलती रहती है। आपके मन-मस्तिष्क में वही घटता रहता है, आपके मन-मस्तिष्क में वही होता रहता है। वह तो भौतिक रूप से परेशान होता है और आप मानसिक रूप से परेशान होते रहते हैं। अब आप किसी को दौड़ाते हैं।
हाँ इन्टरवल में ऐसा करते हो न ? अगर आप किसी को दौड़ाते हो तो उसके पीछे आपको भी दौड़ना होता है। नहीं दौड़ना होता है ? उसके और आपके बीच कितना फासला होता है ? मुश्किल से एक सेकेण्ड का या दो कदम का। जितनी मेहनत-मशक्कत उसे करनी पड़ती है। उससे कम मेहनत-मशक्कत आपको भी नहीं करनी पड़ती है।
आप क्या सोचते हो कि आप उसको तंग कर रहे हो। अरे ! आप क्या उसको तंग कर रहे हो ? आप तो स्वयं भी उसके साथ तंग हो रहे हो। कहा ही गया है- जब तुम किसी दूसरे के लिए गड्ढा खोदते हो तो होता यही है कि पहले तुम्हीं उसमें गिर जाते हो दूसरा तो गिरता ही नहीं है। वह तुम्हें ही देख करके कन्नी काट लेता है, किनारे से गुजर जाता है। जब तुम किसी दूसरे के लिए काँटा बिछाते हो तो उसे काँटा गड़े ना गड़े तुम्हें तो जरूर ही गड़ता है, क्योंकि तुम सदैव उसी के इर्द-गिर्द रहते हो, उसी उद्देश्य में लगे रहते हो, उसी फेर में पड़े रहते हो और स्वयं शिकार हो जाते हो। इसीलिए तो कहा गया है-
जो तोको काँटा बुये ताहि बोय तू फूल।
तोकू फूल के फूल हैं वाकू है त्रिशूल।।
प्रिय विद्यार्थियों, पहले तुम जब दूसरे की बुराई के चक्कर में पड़ते हो तो उसका बुरा हो न हो, तुम्हारा बुरा हो ही जाता है और मैंने बताया ही तुम्हें। उसके साथ यह घटना घटे न घटे, वह घटना तुम्हारे साथ निरन्तर घटती रहती है। तुम हमेशा उसी फेर में पड़े रहते हो कि ऐसा हो जाता, ऐसा हो जाता, ऐसा हो जाता। अरे ! उसके साथ हुआ न हुआ, तुम्हारे साथ हो गया। तो फिर ऐसा क्यों ? ठीक यही स्थिति यहाँ है पिप्पलाद के साथ है। उसके पिता के साथ क्या हुआ ? जब उसे लगता है कि मेरे पिता के साथ अन्याय हुआ तो मैंने क्या कहा ? किस उद्देश्य में लग जाता है वह ? प्रतिशोध के उद्देश्य में लग जाता है।
हर क्षण उसके अन्दर क्या है ? प्रतिशोध है, और स्थिति यहाँ तक आती है कि भगवान प्रसन्न होते हैं, उससे इच्छित वर माँगने के लिए कहते हैं लेकिन वह क्या माँगता है, आपने देखा ही, ईश्वर को प्रसन्न करो और ईश्वर प्रसन्न हो जाएँ और आएँ कहें कि जो माँगना हो माँगो तो क्या कहोगे कि हम पास हो न हों हमारा साथी फेल हो जाए। सही बात ! यही न माँगा पिप्पलाद ? वह अपने भले की बात नहीं कर रहा है, वह यही कह रहा है उसका बुरा हो जाए। तो अगले का बुरा हुआ, नहीं हुआ इसका तो बुरा हो ही रहा है प्रतिक्षण हो रहा है, प्रतिपल हो रहा है।
तुम किसी के शुभेच्छु हो और उसके बारे में शुभ सोच रहे हो तो उस समय तुम्हारा मन-मस्तिष्क शुभ्र होता है, श्रेष्ठ होता है, स्वच्छ होता है, सुन्दर होता है। तो स्पष्ट है जैसी करनी वैसी भरनी, जैसी सोच होगी वैसी दिशा मिलेगी, वैसा मार्ग मिलेगा। तो क्यों नहीं ऐसा किया जाए जो श्रेष्ठ हो, उत्तम हो, शुभ्र हो, और उसी का वरण किया जाए।
प्रिय विद्यार्थियों, क्या पिप्पलाद का उदाहरण यहाँ कम नहीं है ? निश्चित वह बालक था, उसे इतनी समझ नहीं थी, उसने प्रतिशोध की बात सोची भगवान शिव को प्रसन्न किया और जो घटना घटी आपने सुनी। तब जाकर उसे समझ में आया। आप किस बात के इंतजार में हैं ? आप भी तपस्या करने जाएंगे भगवान शिव प्रसन्न होंगे और जब समझाएंगे तब बात आपको समझ में आएगी, यह बात आपको समझ में आनी चाहिए, बात आपको समझ में आ रही है और आप इस दिशा में सोच रहे हैं, विचार कर रहे हैं और अपने अन्दर ऐसा परिवर्तन ला रहे हैं जो आपको आपके उद्देश्य तक पहुँचा सके।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
शिवोऽहम्
मैं कल्याणकारी हूँ।
धन्यवाद।