बोधकथा

पूर्ण समर्पण

प्रिय विद्यार्थियों, आज की कथा वार्ता एक बुढ़िया माई की है। बुढ़िया माई समझते हैं आप। अपने ही घर की बुजुर्ग महिलाओं को अन्य लोग बुढ़िया माई भी कहते हैं। हम लोग तो अपने रिश्ते से बुलाते हैं और अन्य लोग बुढ़िया माई कहते हैं। यहाँ हम लोग भी अन्य लोग ही हैं। इसलिए बुढ़िया माई ही कहेंगे। 

अब बुढ़िया माई के बारे में कहा जाता है कि वह अपने पूरे जीवन में, अब तक के जीवन में, जैसा कि देखने में आया, आचार-विचार और व्यवहार में पूर्णतः सात्विक जीवन जीती हैं, आध्यात्मिक जीवन जीती हैं। वह अपना कोई भी कार्य, कोई भी कृत्य बिना ईश्वर को समर्पित किये नहीं करती। कुछ भी करना है तो भगवान को समर्पित करके ही करती हैं। सामान्यतः अपने भी घरों में ऐसा ही होता है। 

भोजन बनता है। पहले भगवान को भोग लगता है। उसके बाद ही और लोग ग्रहण करते हैं। कभी आप जल्दी मचाते हैं न स्कूल जाने में देर हो रहा है, ऐसा है, वैसा है, तब भी आपको टिफिन नहीं दिया जाता है। भगवान को भोग लगाये बिना आपकी टिफिन नहीं भरी जाती है। कोई भी नया काम जो आप करते हैं, भगवत-भजन, पूजन से ही शुरू होता है। 

किन्तु जैसा कि मैंने बताया बुढ़िया माई के बारे में वह अपना सभी कृत्य ईश्वर को समर्पित करके करती हैं। जो मैंने इधर गिनवाया यह सब शुभ कर्म है न। जब आपके यहाँ भोजन बना तो चढ़ाया आपने, नया घर बनवाया आपने, नई गाड़ी खरीदी कुछ भी ऐसा जो आपने नया काम किया ईश्वर को समर्पित किया या नहीं, यह आपकी बात है। लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं है, वे अपने सारे कर्मों को चाहे कर्म अच्छे हो या बुरे हों, ईश्वर को समर्पित करके करती हैं। उनके लिए न कुछ अच्छा है न कुछ बुरा है। 

अब सुबह-सुबह उनका काम आप जान ही रहे हैं। अपने घरों में देखिये जो भी बुढ़िया माई होंगी क्या करेंगी ? सुबह-सुबह पहला काम क्या है ? सुबह-सुबह अरे ! झाड़ू-बहारू है न, लगता है न आपके यहाँ। बुढ़िया माई कोई है ही नहीं अरे ! आपकी दादी-नानी नहीं हैं, हैं तो क्या करती हैं ? सुबह-सुबह पहला काम शुरू करती हैं झाड़ू लगाना। 

अब ये बुढ़िया माई कुछ ज्यादा ही फास्ट हैं। आपकी बुढ़िया माई घर में ही झाडू लगाती होगीं। यह बुढ़िया माई बाहर सारे दरवाजे पर भी झाड़ू लगाती हैं। तीन बजे ही उठ जाती हैं। काम क्या है पूरा घर के अन्दर-बाहर झाडू करने के बाद क्या इकट्ठा होता है ? कूड़ा-कचरा न ! अब कूड़ा-कचरा क्या किया जाता है बेडरूम में रखा जाता हैं न, किचन या फिर तब डस्टबिन में रखा जाता है। 

फिर डस्टबिन को क्या किया जाता है ? उसे पानी की टंकी में गिरा दिया जाता है या बाहर फेंका जाता है या अन्दर फेंका जाता है, बाहर कहाँ हुआ जी, बाहर की बात हुई है। कूड़ा कहाँ फेंका जाता है ? जिस स्थान पर कूड़ा फेंका जाता है, उस स्थान का नाम बताइये। शहर में तो नहीं है। लेकिन देहात में, गाँव में है। मैंने कहा- शहर में तो ऐसी जगह है नहीं, कहाँ होती हैं गाँव में होती है। गाँव में कूड़ा कहाँ फेंकते हैं तो घूरा पर। 

तमाम घूरे यहाँ भी हैं। ये घूरे चल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, स्कूल तक पहुँच सकते हैं। लेकिन जिस घूरे की मैं बात कर रहा हूँ, वह पूरी तरह  स्थाई और स्थिर रहता है। वह गाँव में ही रहता है। तब यह बुढ़िया माई जो कूड़ा-कचरा इकट्ठा करती हैं उसे ले जाती हैं घूरे पर फेंकने के लिए। फेंकना है कि नहीं फेंकना है, यह तो रोज का काम है उनका। 

जब घूरे पर फेंकती हैं तो क्या कहती हैं मालूम है, हे ईश्वर! हे प्रभु ! तेरा तुझको अर्पण। क्या कहती है, हे प्रभु ! हे ईश्वर! तेरा तुझको अर्पण। जैसा हम सूर्य को अर्घ्य देते हैं वैसे ही तो कूड़ा भी फेंका जाता है। जिस भी बर्तन में रखें, चाहे खाँची में, चाहे बाल्टी में, तो फेंकते समय क्या कहती हैं हे प्रभु ! तेरा तुझको अर्पण। 

अर्पण मतलब समझ रहे हैं न, दिया गया। अब बात सामान्य है। क्योंकि यह बात उनके मन की है। इस बात पर दूसरे की जोर जबरजस्ती नहीं है। आप उन्हें मना भी नहीं कर सकते कोई नियम कानून तो इस देश का तोड़ नहीं रही हैं। फिर भी यह समाज है। आस-पास के लोग जो सुनते हैं वे कहते हैं- बुढ़िया माई भी हद ही करती हैं। 

अरे ! ईश्वर को चढ़ाना है तो फूल चढ़ाओ, मिठाई चढ़ाओ। अरे ! 

चाहे कुछ और चढ़ा लो। अब वह कहाँ से लाकर चढ़ा रहे हो यह कोई नहीं पूछता है। पूछता है, अरे ! मिठाई तो खरीद कर लाते होंगे। लेकिन फूल तोड़कर नहीं और सही शब्द प्रयोग करो न खरीद कर लाते हैं। कम ही लोग, ज्यादा लोग, कोई अपने घर का फूल तोड़ता है। अपने घर का नहीं तोड़ता बगल वाले का चुराता है। 

आप सुबह-सुबह देखिये टहलने के बहाने लोग जाते है और दूसरे के घरों का चोरी से अंधेरे में, आप पता करिये अगल-बगल अपने घर का फूल कम लोग ही तोड़ते हैं। अब वह चुराया हुआ ही चढ़ाइये भगवान को कौन मना कर रहा है। 

अब लोगों का कहना है, मिठाई चढ़ाओ, फूल चढ़ाओ, वस्त्र चढ़ाओ, अरे ! रुपया, पैसा चढ़ाओ। यह तो समझ में आता है। किन्तु यह बुढ़िया माई का कचरा चढ़ाना यह तो बिल्कुल समझ में नहीं आता। यह तो बहुत गड़बड़ बात है। किन्तु इन सब बातों का बुढ़िया माई पर कोई असर होता नहीं है।

एक बार की बात है अब बुढ़िया माई का वही रूटीन है। रोज का काम है। घूरे पर कचरा फेंक रही है बहार करके और कह क्या रही है- हे ईश्वर! तेरा तुझको अर्पण। अब उसी समय वहाँ से संयोग वश कोई संत गुजर रहे थे। महात्मा गुजर रहे थे जैसे ही सुनते हैं, क्या सुनते हैं ? बुढ़िया माई कह रही है- तेरा तुझको अर्पण और कचरा गिरा रही है।  

अरे ! संत महात्मा स्तब्ध और किंकर्त्तव्यविमूढ़, यह तो बुढ़िया माई है क्या कहूँ, कैसे कहूँ, लेकिन फिर भी हैं संत महात्मा तुरंत रुक जाते हैं और कहते हैं- तुम यह क्या कह रही हो ? क्या कहते हैं, बुढ़िया माई से- तुम यह क्या कर रही हो ? तुम्हें कुछ जानकारी भी है। तुम्हें कुछ पता भी है ? 

बुढ़िया माई कहती है- उसी से क्यों नहीं पूछ लेते, बुढ़िया माई क्या कहती हैं ? मुझसे क्या पूछते हो ? उसी से क्यों नहीं पूछ लेते। जब सब कुछ उसी का दिया है तो यह काट-छाँट क्यों करना, जो जैसा है जिसका है उसी को समर्पित है। आप क्या कहना चाहते हो, अब उस संत के पास कोई जबाब भी नहीं है। अपने रास्ते बढ़ जाते हैं। 

किन्तु संत महात्मा आज बहुत बेचैन हैं। अरे ! सुबह-सुबह की बात है, बड़ी बेचैनी है। बार-बार मन में बुढ़िया माई की बात उठती है। क्या कहा- बुढ़िया माई ने ‘उसी से पूछ लो’ बड़ी मार्के की बात है ‘उसी से पूछ लो’ और वह सब दृष्य बार-बार उनके आँखों के सामने। आज पूरे दिन डिस्टर्ब ही हैं उन्हें इस प्रश्न का उत्तर ही नहीं मिल पा रहा है, जो बुढ़िया माई ने कहा है और आज वे निरूत्तर ही सो जाते हैं। 

शाम हो गई, रात हो गई, सोना ही है उन्हें। बुढ़िया माई के इस प्रश्न का उत्तर मिला नहीं, अब सो जाते हैं। किन्तु सोने पर क्या है, निरूत्तर सोये हैं उत्तर की तलाश में हैं। अब रात स्वप्न में, स्वप्न में क्या आता है ? बताइये स्वप्न में वही आता है, जो हम दिनभर सोचते हैं, जो हम सोने से पहले सोचते हैं, विचारते हैं या यूँ कहे चाहते हैं। 

अब दिन भर मन में चलता रहता है रसगुल्ला, रस-मलाई, लड्डू, गुलाब-जामुन, अब नहीं भेंट हो पाई, नहीं व्यवस्था हो पाई, नहीं मिल पाई तो सोयेंगे और सोने में मुँह बाये रहेंगे लड्डू गिर जाता, रसुल्ला गिर जाता। देखना जिस दिन ऐसा सोचते उस दिन रात में सोए तो घर वालों से पूछ लेना मुँह खुला ही रह जाता है। जो आंकाक्षा होती है, उसकी पूर्ति प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप में उसे प्राप्त करने के लिए ही ये स्वप्न आते हैं। 

स्वप्न का यही इतिहास है, यही कारण है। संत ने रात में स्वप्न देखा। उनके मन में भी है न समस्या, स्वप्न देखना ही देखना है। लेकिन उन्हें  रसगुल्ला तो चाहिये नहीं, मुँह तो बाये नहीं होंगे। उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर चाहिये और प्रश्न क्या है, बुढ़िया माई का ‘उसी से पूछ लो’। उसी से पूछना है तब तो उसके पास पहुँचना पड़ेगा न। कैसे पहुँचेंगे ? 

आज रात संत ने स्वप्न देखा कि वे स्वर्ग में ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत हैं। अच्छा तुम भी खड़ी थी क्या वहाँ आगे-आगे बोल रही हो। ईश्वर अपने सिंहासन पर विराजमान हैं और फिर सुबह-सुबह का समय है अभी सूर्य देवता उदित ही हो रहे हैं। चारो ओर लालिमा फैली हुई है। सुन्दर हवायें बह रही है। भौरें गीत गुनगुना रहे हैं। बहुत अद्भुत, आकर्षक और अप्रतिम वातावरण है। क्यों न रहे जब स्वर्ग ही है। 

अभी मैंने कम बताया इससे भी बढ़िया वातावरण है उससे भी सुन्दर वातावरण है वहाँ का। तभी अचानक क्या होता है ? आप समझ गये होंगे, क्या होने जा रहा है ? अद्भुत घटना घटने वाली है। वही घटना रिपीट होने वाली है। क्या होता है ? तभी अचानक ईश्वर के ऊपर कूड़ा-कचरा गिरने लगता है। 

अब जब कूड़ा-कचरा गिरना बंद होता है। ईश्वर क्या कहते हैं- यह बुढ़िया माई भी गजब की है। एक दिन भी क्या, एक मिनट भी नहीं चूकती। ठीक तीन बजे सबेरे उठती है। समझ लो, झाडू़-बहारू करने में भी कितने समय की पांबद हैं एक मिनट भी आगे-पीछे नहीं। प्रतिदिन नियत समय पर अपना कार्य सम्पन्न करती-ही-करती हैं। 

संत ईश्वर के समक्ष हैं कहते हैं- मैं इस बुढ़िया माई को जानता हूँ। इसीलिए न पहुँचे हैं स्वर्ग। मैं इस बुढ़िया माई को जानता हूँ। अभी कल ही मैंने उसे देखा और कहा भी कि तू यह क्या करती है ? क्यों करती है ? तुझे कुछ समझ भी है या नहीं है। उसने कहा- तेरा तुझको अर्पण, क्या कहा- उसने कहा- तेरा तुझको अर्पण। 

इसमें समझ जैसी बात कहाँ से आ गई। तभी उन्हें ध्यान आया कि उनके जैसे अनेक समझदार लोग वहाँ पहले से उपस्थित हैं। संत जी को एकाएक ध्यान आया कि उनके जैसे अनेक लोग हैं जो ईश्वर को फूल, फल, दूध, मलाई जाने क्या-क्या चढ़ाते हैं। काजू, किशमिश नहीं मिठाई, रसमलाई नहीं रहा सबसे अच्छा घर में बना हलुआ लाकर भगवान को चढ़ाते हैं यह सब समझदार लोगों के काम हैं।  

सुबह तीन बजे ही शुरू हो जाता है घंटा बजाना, भगवान को जगा दिया जाता है। लेकिन उनका चढ़ाया तो कुछ भी पहुँचा दिखाई नहीं दे रहा है यहाँ। संत क्या देख रहे हैं ? तभी से वहाँ हैं, बुढ़िया माई का चढ़ाया कूड़ा-कचरा तो दिखाई दिया, आ गया पहुँच गया। लेकिन सबेरे तीन बजे से जो लोग चढ़ा रहे हैं घंटा बजा रहे हैं और क्या-क्या कर रहे हैं, तरह-तरह का मंत्र जप रहे हैं न, तमाम हल्ला-गुल्ला मचाये हुए हैं। उन सबका कुछ नहीं पहुँच रहा है, अब यह सब वहाँ कुछ भी पहुँचा हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। 

संत के मन में चल रहा है, वे सोच रहे हैं कि अब यह दिखाई देगा, वह दिखाई देगा। किस दुकान का लड्डू दिखाई देगा ? अब नाम नहीं लूँगा। आप लोग खरीदते हैं, सबसे अच्छा लड्डू चढ़ाते है किन्तु कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा वहाँ। यह बात उनके मन में चल रही है, धीरे-धीरे बैठ रही है, घर कर रही है। 

तब तक ईश्वर ने कहा- जो आधा-अधूरा चढ़ाता है, उसका नहीं पहुँचता। क्या कहा ईश्वर ने- जो आधा-अधूरा चढ़ाता है उसका नहीं पहुँचता। इस बुढ़िया माई ने अपना सर्वस्व चढ़ा दिया। कुछ भी नहीं बचाया ऐसा नहीं कि फूल चढ़ाये और काँटे बचा लिए। कोई काँटा चढ़ाता है, केवल शंकर जी पर चढ़ता है, लेकिन वह भी चढ़ाने की हिम्मत चाहिए। 

ज्यादा लोग फूल ही चढ़ाते हैं, काँटा अपने लिए बचा लोगे और कल कहोगे कि काँटा गड़ गया। अरे ! जो बचाओगे वही न गड़ेगा, जो अपने पास रखोगे वही न गड़ेगा। फूल चढ़ाते हैं काँटे बचा लिए जाते हैं। अब छाली चढ़ा दिया आपने शंकर जी को खूब छाली से स्नान कराया और छाछ प्रसाद के लिए बचा लिया, अपने लिए बचा लिया। 

अब अच्छी चीजे चढ़ाई और खराब बचा लिया, जो समग्र चढ़ाता है उसी का पहुँचता है। आधा-अधूरा नहीं पहुँचता। तब तक संत जी को क्या हुआ, आँख खुल गई, नींद से उठ गये और नींद से क्या उठे नींद में ही पसीने-पसीने पूरा कपड़ा ही भीग गया। इतना पसीना हुआ कि संत क्या कोई भी रहता, भीग जाता। 

अब उनकी छाती लुहार की धुकनी की तरह चल रही है। अब फेल हो तब फेल हो। बड़ी बात है न पूरा जीवन भर का किया धराया सब व्यर्थ हो गया, क्यों व्यर्थ हो गया। क्योंकि संत जी भी वही करते रहे अब तक। केवल फूल ही चढ़ाते रहते, काँटा रख लेते अपने पास। आधा-अधूरा ही चढ़ाते रहे, छाँट-छाँट कर चढ़ाते रहे। आज समझ में आया है  आधा-अधूरा चढ़ाना पहुँचता ही नहीं है। अब तक का उनका पूरा जीवन ही व्यर्थ हो गया।

प्रिय विद्यार्थियों, यह समर्पण समग्र ही हो सकता है। अगर उसमें समग्रता नहीं तो समर्पण नहीं है। अब जरा आपकी बात हो जाये आप तो महान हैं पुराने महान हैं, नये महान तो हैं नहीं, कोई कई वर्षों से महान 

हैं, कोई छठवीं में आते ही महान हो गया तो कोई नवीं में आकर महान हो गया। क्यों महान हुए आप ? क्योंकि आपने अपना समग्र रूप से समर्पण कर दिया अपने उद्देश्य के प्रति और यही कारण है कि जाने कितने-कितने मानक आपने ध्वस्त कर दिये हैं। 

उनमें से कुछ आश्चर्यजनक , कुछ अति आश्चर्यजनक और कुछ के लिए 

तो मेरे पास शब्द ही नहीं है। अब यह स्वंय ही तय कर लें कि आप किस श्रेणी के हैं ? आश्चर्यजनक वाली श्रेणी में हैं कि अति आश्चर्यजनक वाली श्रेणी में हैं कि जिनके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं उस श्रेणी में हैं। 

तय कर लिया आपने, पूछें- हाथ उठायेंगे ? भाग रहे हैं, आपमें हिम्मत नहीं है, होगी कैसे ? आप कह नहीं पायेंगे और मुझे कहने के लिए कहेंगे तो मैं कहूँगा- आप इनमें से किसी श्रेणी में नहीं हैं। मन में लड्डू कितने भी फूटे कोई बात नहीं है। लेकिन जब कसौटी पर कसा जाना है तो परिणाम ऐसे ही आता है आप किसी भी श्रेणी में नहीं हैं। 

आप पूछ सकते हैं कि बहुत चढ़ाया आपने और तुरन्त गिरा दिया तो न तो मैने आपको चढ़ाया और न ही गिरा दिया। क्यों ? क्योंकि समग्र समर्पण किया था कबीर ने और हुआ क्या परिणाम क्या आया बताये

                                                                                                                   कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंग को नीर।

                                                                                                                         पाछे पाछे हरि फिरे, कहत कबीर-कबीर।।

सोच लें समग्र समर्पण, आप भगवान को खोजते हो और भगवान स्वंय कबीर को खोजते फिर रहे हैं। क्यों ऐसा क्या किया कबीर ने ? अरे ! कितनी दूरी की बात है, महज यहाँ से कितने किलोमीटर पर कबीर का घर था आज भी है यहाँ से दूरी कितनी है नब्बे किमी भी नहीं है। नब्बे तो ज्यादा कह दिया पचहत्तर किमी भी नहीं है। सड़क के रास्ते जाओगे तो पचहत्तर किमी भी नहीं है। एयर डिस्टेन्स पचास किमी होगी। बमुश्किल कौन सी जगह है मगहर। अरे यहाँ से केवल पचहत्तर किमी की दूरी पर कबीर और भगवान उन्हें खोज रहे थे। कहाँ गये कबीर, कहाँ गये कबीर आखिर कबीर में ऐसा क्या है ? 

वह आपको पता है, उनका काम क्या था, मालूम है, क्या पढ़ते-लिखते हो। कबीर जी का जीविकोपार्जन का साधन क्या था ? कबीर क्या करते थे ? खेत काटते थे, पढ़ाई करते थे, कपड़ा बुनते थे। जानलो ! कबीर क्या करते थे ? कपड़ा बुनने का काम करते थे न। वही मगहर खलीलाबाद हो गया है न। यह जो तौलिया चादर यूज करते हो मैक्सिमम वहीं का है। 

पता कर लेना दुकान वाले से लेबल लगा देगा मुम्बई, दिल्ली और कलकत्ता का परन्तु बनता है मगहर में। यह परम्परा कबीर के समय की है। कबीर कपड़ा बुनने का काम करते थे। लेकिन कोई उनसे पूछता- यह कपड़ा किसके लिए बुन रहे हैं तो कहते राम के लिए। कहते और किसके लिए बुन रहा हूँ राम के लिए ही तो। कोई कपड़ा खरीदने आता तो कहते मैं कपड़ा राम को बेच रहा हूँ। 

उनका पूरा जीवन ही राममय था, कोई कृत्य करते उसमें राम होते। बुढ़िया माई कोई कृत्य कर रही है वह ईश्वर को समर्पित कर रही है। कौन पहुँचेगा ? कबीर पहुँचेंगे, बुढ़िया माई पहुँचेगी। आप और हम आखिर क्या नहीं करते ? जो बुढ़िया माई करती है और कबीर ने किया। क्यों हमारे साथ सम्भव नहीं हो पाता है, जो उनके साथ सम्भव है। 

प्रिय विद्यार्थियों, बस एक ही स्थिति है वह है समर्पण की भाव दशा । साध्य भी है, साधन भी है और साधक भी है। फिर भी नहीं संभव है क्यों ? क्यों नहीं संभव है ? शर्बत पीते हो, नहीं पीते हो, चीनी और पानी से शर्बत बनता है न, पानी में चीनी डालते हो, क्या करते हो, फिर उसे घोलते हो। अब एक गिलास पानी में एक बोरा चीनी डाल दो, एक बोरा चीनी में एक गिलास पानी डाल दो। अब पियो शर्बत कौन मना कर रहा है, तो ऐसा ही शर्बत पीते हो। 

जब तक ऐसा ही शर्बत पीयोगे तब तक यही दशा रहेगी। एक गिलास पानी में एक कण डालो चीनी का शर्बत हो गया, दूसरा कण डालो शर्बत हो गया, तीसरा भी डालोगे तो शर्बत हो जायेगा। अब एक गिलास पानी में कितना चीनी डालोगे तो शर्बत होगा थोड़ा और तो यह थोड़ा-सा क्या होता है ? 

पानी में चीनी डालिए एक समय आता है जब चीनी का घुलना बंद हो जायेगा। उसके बाद क्या करोगे नहीं घुलेगा नहीं घोलना चाहोगे, घोलना चाहोगे तो क्या करना होगा ? पानी डालना होगा जब गिलास फिक्स है तो पानी कैसे डालोगे उसे हीट देना होगा। तब चीनी और घोली जा सकती है। तो यह क्या हुआ जब उसे आपने थोड़ी ऊष्मा दी। 

पानी क्या है एच टू और ओ है। होइड्रोजन के दो मॉलिक्यूल और आक्सीजन का एक लाओ और मेज पर रखो टप टप पानी बहने लगेगा, नहीं न। तब क्या ? इधर से एच टू डालो और उधर से ओ डालो और गटगट पी जाओ। नहीं न, कैसे होगा ? अरे ! कोई स्थिति, परिस्थिति क्रियेट करनी पड़ेगी न। बुढ़िया माई झाड़ू लगाई, कचरा इकट्ठा की, अब कचरा अर्पण कर रही है। अर्पण करते समय वह भाव दशा की वह विशेष प्रवृत्ति महत्त्वपूर्ण है कि नहीं है। 

हाइड्रोजन के दो मॉलिक्यूल और आक्सीजन के एक, अब क्या देना पड़ेगा उसे परिस्थिति देनी पड़ेगी न, ऐसी स्थिति देनी पड़ेगी न और हमारे लिए वही भाव दशा है। जब वह पानी बने जब हमारा समर्पण स्वीकार्य हो जब तक वह स्थिति नहीं आयेगी कैसे सम्भव होगा ? परिस्थिति महत्त्वपूर्ण है कि नहीं है। बिना परिस्थिति के कुछ भी संभव नहीं है। 

यह परिस्थिति क्या है ? हमारी भाव दशा का है उस समय हम क्या रहते हैं ? कहाँ रहते हैं ? आप फेंक दे रहें हैं, कचरा आप क्या करते हैं ? आप जाने पढ़ने चले आये अलग बात है। अब पढ़ रहे हैं कि क्या कर रहे है ? आप जाने हम तो वही देख रहे हैं जो भौतिक रूप से दिखाई दे रहा है। 

प्रिय विद्यार्थियों, लेकिन उतने से तो होना नहीं है, क्योंकि कचरा तो सभी फेंकते हैं कचरा भी है ? फेंकने वाला भी है और फेंका भी जा रहा है। एक दो नहीं लाखों लोग फेंक रहे हैं। तुम्हें भी फेंकने का मौका मिलेगा जाकर फेंकोगे। अब चाहे लाख बार कह लो, ‘तेरा तुझको अर्पण’ तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण पहुँचेगा। अरे ! पहुँचना होता तो पहुँचता नहीं ? इतने लोगों का यहाँ कहाँ पहुँच रहा एकदम नहीं पहुँच रहा है। 

केवल एक ही आदमी का पहुँच रहा है, बुढ़िया माई और फेंकने वाले लाखों करोड़ों हैं, उदाहरण दें तो लम्बा हो जायेगा। ऐसे ढे़र सारे उदाहरण पड़े हैं, बुद्ध से लेकर अब तक। सत्य यह है कि जो भी आप कृत्य कर रहे हैं, उस कृत्य में आप कितने समर्पित हैं और उस कृत्य के प्रति कितने समर्पित है। वह उतना आगे है या उसकी उतनी पहुँच है, वह वहाँ तक पहुँचा है। 

आप पढ़ने आते हैं, निश्चित रूप से कुछ लोग वास्वत में पढ़ते हैं। कुछ लोग केवल पढ़ते है और कुछ की बात मैं नहीं करता क्योंकि उनके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। कहना सुनना यह प्रक्रिया है लेकिन उसे आत्मसात् करना आपकी अपनी आवश्यकता है कहीं-न-कहीं उसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आप यहाँ आये हैं और कर भी रहे हैं, करते रहिये। यही मार्ग है।

आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों। 

    शिवोऽहम् 

 मैं कल्याणकारी हूँ।

         धन्यवाद।


खंड नौ - Feb, 04 2026