आलेख

सम्पादकीय

मैं नहीं जानता यह कितना सच हो सकता है, किन्तु इतना तो है ही कि अगर पुनः मनुष्य होना हो तो चाहूँगा कि तेरी ही कोख में लौटूँ, तेरी ही परवरिश में पलूँ-बढूँ और तेरे ही मार्गदर्शन-पथप्रदर्शन में जीवन यात्रा प्रारम्भ करूँ। यह कैसे कहूँ कि तू केवल माँ थी, अब तो लगता है तू जगत्जननी धरती माँ थी। मेरा क्या, सभी अपनों का जितना ख्याल रखती, उतना अपने बारे में कभी नहीं सोचती।

तेरा पूरा जीवन ही जैसे परोपकार के लिए था। गाँव-नगर, देश-परदेश जहाँ, जब भी, जो भी तेरे सम्पर्क में आया, उसे तूने जरूर कुछ-न-कुछ दिया ही, चाहे वह आशीष ही क्यों न हो। कितना खजाना तेरे पास था, यह तो तू ही जानती थी। आज जब तू नहीं है फिर भी कहीं से यह नहीं लगता कि तू नहीं है। जब भी तेरी ओर देखता हूँ, तू अन्तःकरण में प्रकट होकर ठीक वैसे ही व्यवहार करने लगती है जैसे साक्षात् किया करती। यह सत्य है कि अब तू नहीं है, किन्तु मेरा मन यह कैसे माने ? तू तो सदैव उसके साथ रहती है, उसकी वाली किया करती है, अब भी जो तेरा अपना है।

कितनी विचित्र है यह दुनिया और यहाँ का विधान भी। लोग कहते हैं जो शरीर त्याग देता है फिर उसका अस्तित्व कहाँ ? मैं कहता हूँ शरीरी जीवन के बाद भी जीवन है। हम चाहे तो उसे अशरीरी जीवन कह सकते हैं। तू इसका प्रमाण है, क्योंकि अब भी तू मेरे साथ है। तेरे साथ जीवन का जो क्षण मैंने जिया है, वही आज मुझे वह सम्बल देता है कि मैं जो कर रहा हूँ, वह सत्य है, शिव है, सुन्दर है। 

तेरा आध्यात्म, तेरी सात्विकता, तेरी संस्कृति एवं संस्कार, तेरी मति-गति जैसे रग-रग में भरी होती और तू जीवन को जीवन बनाने में जुटी होती अपने हर रंग में, हर रूप में। तू सदैव ही त्योहारों का विशेष ध्यान रखती। जब गर्मी की छुट्टियों में आता तो प्रत्येक त्योहार के लिए दिन फिक्स करती, उसके अनुसार सारी व्यवस्था करती। जरूर पटाखे नहीं फोड़ती, गुलाल नहीं लगाती, किन्तु उस दिन के सारे पकवान बनाती और सामने बैठाकर विधिवत् पहले अपने हाथ से खिलाती, उसके बाद ही मैं अपने हाथ से खा पाता।

जब कभी तेरे साथ पिछवाड़े कोड़ार अर्थात् खेत में मनचाही सब्जी लाने के लिए जाना होता तो तू कहती बाबू इहे माटी हऽ, इ दुनिया एही से बनल बा एक दिन एही में समा जाई, एकर कदर करे के चाहीं, जे एकर कदर कइलस बूझऽ ओके कवनो कमी ना हो सकेला। तहरा लगे एतना माटी बा कि तहार गुजारा खूब आराम से चल जाई, तहके कवनो तकलीफ ना होई। हम जानत बानीं। 

अब कैसे कहूँ, तू सब जानती थी किन्तु तू यह कहाँ जानती थी और कोई जान भी कैसे सकता है यही तो जीवन रहस्य है और रहेगा। हम सभी को इससे गुजर कर ही जीवन के पार जाना है। 

चेरो गाँव जहाँ धनराज बाबू सबसे रसूखदार व्यक्ति के घर अमावस्या की रात्रि का प्रथम प्रहर, चारों ओर सन्नाटा, दरवाजे पर ढिबरी के धुँधले प्रकाश में घर के मुखिया के साथ तमाम लोग बैठे हैं। अन्दर से कराहने की ध्वनि स्पष्ट आ रही है। कभी-कभी कुछ महिलाओं के द्वारा आपस में की जाने वाली वार्ता भी सुनाई पड़ रही है। तभी कराहने की ध्वनि तेज हो जाती है और प्रसव पीड़ा की पूर्णता के साथ जिसका जन्म होता है सबकी घिग्गी बन्द। खबर चमाइन जब बाहर देती है, क्रोध का स्वर उठता है बिग... बिग..., जल्दी लेजा के बिग... दे। चमाइन क्या कहती, क्या करती, उसके वश का भी क्या था, वह सीधे अपने घर चली जाती है और पूरे गाँव में हल्ला हो जाता है कि रामस्वार्थ के घर बिगनी आइल बाटी।

अब यह पितृसत्तात्मक सत्ता का क्रोध रहा हो या टोटका, क्योंकि इसके पूर्व जिसने भी जन्म लिया वह तत्क्षण ही नहीं रहा। रह गई तो यह बिगनी, जो धीरे-धीरे बढ़ने लगी और घर के सभी के अन्दर जीवन का नव संचार हुआ। पाँच वर्ष तक यह बिगनी सभी लोगों के आँखों की लकड़ी बनी रही, और तब जिस बच्ची का जन्म हुआ, उसका नामकरण हुआ प्रभावती और प्रभावती का प्रभाव हुआ कि घर में ब्रह्मा भी आए और उनके जाते ही इस परिवार पर कहर बरपा। बस, इन दोनों के अलावा इस धरती पर इनका अपना कोई नहीं रहा। 

फिर शुरू हुई धनलोलुप रिश्तेदारों की उठापटक और उसी उठापटक में कभी पट्टीदार बीस पड़ते तो कभी फुआ के घर वाले। यह सिलसिला तो लम्बा चला, किन्तु बारह के होते-होते बिगनी की शादी उनके फुआ की ननद के लड़के से कर दी गई और वह आ गई अपने इस नए घर, जहाँ भरा-पूरा परिवार, सबकी अपेक्षाएँ, क्योंकि यहाँ सास जैसी इकाई पहले ही ध्वस्त हो चुकी थी। समझ सकते हैं बड़ा परिवार, सभी को संतुष्ट करना कितना जटिल एवं कठिन। फिर परदेश गई, वहाँ मेरा जन्म और जब लौटकर आई तो फिर पारिवारिक बँटवारे के बाद तो बाबा की सेवा में समर्पित और उनके रहने तक कहीं निकल ही नहीं पाई और अब तेरी दुनिया बस सभी की सेवा, मदद बनकर रह गई।

एक समय आया जब अपना स्टेबलिशमेंट शहर में हो गया और तू स्थायी रूप से साथ रहने लगी। यहाँ भी कोई आता तो उसका इतना ध्यान रखती कि वह स्वयं परेशान हो जाता और फिर शुरू हुआ तेरा अपना खेल जब तू स्वयं अस्वस्थ रहने लगी। फिर भी कहाँ मानती, वही करती क्योंकि माँ क्या होती है,  यह तुझसे ज्यादा कौन जान-समझ सकेगा और परिणाम, तो तूने माँ को सभी आयामों में जिया है, माँ को पूर्णता प्रदान किया है और एक मार्ग भी...। तभी तो बहुत बचपन में लगभग तीन-चार वर्ष की अवस्था में पिताश्री ने कुछ लिखने के लिए कहा, मैंने नहीं कर दिया। बहुत कहने पर भी नहीं माना तो उन्होंने हाथ-पैर बाँधकर लटका दिया और तू देखती रही असहाय-सी क्योंकि तू माँ थी...।  

ननिहाल जाते समय रास्ते में अध्यापक द्वारा किसी बच्चे की पिटाई देखकर मुझे न पढ़ाने वाली तू माँ थी...। अपने से अलग कर अर्थात् अपने कलेजे पर पत्थर रखकर मुझे पढ़ने के लिए चौदह वर्ष का वनवास देने वाली तू माँ थी...। दिव्या, शिवेश, शिवांश, शिवांगी की परवरिश अपने जिम्मे लेकर उन्हें इस लायक बनाने वाली तू माँ थी...। मेरे साथ-साथ दोनों बहनों की जिम्मेदारी, कुशल-सफल-गृहिणी बनाने के साथ-साथ उनके बच्चों की जिम्मेदारी लेने वाली तू माँ थी...। शिवालय का सपना देखना और उसे मूर्त रूप दिलवाने वाली तू माँ थी...।  कभी कोई समस्या आई हो उसके पहले ही सदैव प्राब्लम साल्वर की भूमिका में उपस्थित रहने वाली तू माँ थी...। अपने पुत्र को यहाँ तक पहुँचाने वाली तू माँ थी...। मेरे लिए इस धरती का सबसे महत्वपूर्ण अस्तित्व तेरा है, क्योंकि तू माँ है। तू ही मेरा संसार है। 

सच जानिए जिस प्रकार सूर्य के बिना सौर मण्डल की कल्पना नहीं की जा सकती ठीक उसी प्रकार माँ के बिना परिवार की कल्पना व्यर्थ है। जैसे सूर्य के चारों ओर अपनी-अपनी विशिष्टताओं के क्रम में ग्रहों की स्थिति होती है, ठीक वैसे ही केन्द्र में माँ होती है और उसके चारों ओर रिश्ते अपने अनुक्रम में होते हैं और जो माँ के सबसे करीब होता है, वह उसकी अपनी रचना होती है।

विज्ञान भी कहता है इस सृष्टि में माँ से शक्तिशाली कोई दूसरा नहीं हो सकता क्यांकि स्त्रियों में सहनर्शीलता, धैर्य, विश्लेशण क्षमता, विषम परिस्थितियों में ढलने की दक्षता पुरुषों से अधिक पाई जाती है अर्थात् इनका थर्ड सेन्स ज्यादा विकसित होता है।

मैंने स्वयं देखा है, मनुष्य क्या जानवरों में भी, किसी माँ के तुरन्त जन्में शिशु के समक्ष यदि महाकाल भी आ जाए तो वह उससे भिड़ जाएगी  और अपने बच्चों को बचा लेगी, फिर मनुष्य की तो अपनी पराकाष्ठा है। 

एक बार की बात है। हमारे ही घर में खरगोश ने बच्चे को जन्म दिया। कहीं से बिल्ली को पता चल गया, उसी रात बिल्ली ने धावा बोल दिया उसकी सारी कोशिशें उस माँ के आगे पस्त हो गई, तब तक हम लोग जाग गए और उसे अपना मुँह लेकर लौटना पड़ा। 

मैथिलीशरण गुप्त का कहना है कि ‘आँचल में दूध और आँखों में पानी’, तो मैं कहता हूँ तू जननी है, तू दुर्गा है, तू काली है। तेरे सामने कोई टिक नहीं सकता और यहाँ यह कहना सत्य है कि तू गौरी है, तू ही शिव है, तेरे अन्दर दोनों गुण हैं क्योंकि जो सृजन कर सकता है, ध्वंस का अधिकार उसी के पास है और यही कारण है पद्मश्री उषा किरण खान का यह कहना समझ में आने वाली बात है कि माँ : जो गौरी है, वही शिव है।

माँगन से मरना भला... यदि यह सद्गुरु की सीख है तो फिर माँ के सामने बच्चों की ज़िद और उसे किसी कीमत पर पूरी करता माता का हृदय, इसे क्या कहेंगे ? कृष्ण यशोदा से माखन माँगते हैं और न मिलने पर ग्वाल बालों के संग क्या करते हैं, इसकी परिणति क्या होती है, यह किसी से छिपा नहीं है। फिर क्यों न माँ अपने बच्चे की ज़िद पूरी करे।

तभी तो अपनी प्रेयसी के द्वारा माँ का कलेजा माँगे जाने पर पुत्र द्वारा कलेजा ले जाते समय रास्ते में ठोकर लगने से जब कलेजा हाथ से छूटकर गिर जाता है, तत्क्षण उससे आवाज आती है ‘बेटा, तुझे चोट तो नहीं लगी’। यह माँ का कलेजा ही कह सकता है।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।

सुर नर मुनि सबकी यह रीती।।

इस पृथ्वी पर सभी रिश्ते स्वार्थ से सराबोर हैं किन्तु एक माँ ही है जो निःस्वार्थ भाव से प्रेम करती है। उसे अपनी संतति से कभी कोई लालसा नहीं होती। उसकी संतति भली है या बुरी, उसके लिए इसका कोई विशेश अर्थ नहीं होता। वह सदैव अपनी संतति के साथ खड़ी रहती है।

कहीं-न-कहीं यही कारण है कि डॉ. राजेन्द्र पंजियार कहते नहीं थकते-

माँ दीपक की वर्तिका, माँ पीपल की छाँह।

करुणा के उस सिन्धु को, कौन सका है थाह।।

तभी तो तेरी स्मृति मात्र की अनुगूँज हमें धकेल देती है अतीत के किसी छाया चित्र में, उस माँ के विराट रूप में तुझे विलीन होते हुए देखता हूँ, तो लगता है, माँ एक अनुभूति है, विभूति है, स्वयं में पूरी सृष्टि है। शास्त्रों में माँ के लिए आया है ‘मातृ देवो भव’और-तो-और माँ के महत्व को प्रभु श्रीराम ने इस रूप में प्रकट किया है

सुन जननी सोई सुत बड़ भागी।

जो पितु मातु वचन अनुरागी।।

तासु तनय तिसु तोषनिहारा। 

दुर्लभ जननि सकल संसारा।। 

अर्थात् इस संसार में माँ के आर्शीर्वाद से दुर्लभ कुछ भी नहीं है। तब  क्यों न कहा जाए ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’इस धरा पर जब तक माँ की पूजा होती रहेगी तब तक सत्य विजयी होता रहेगा। 

जिस प्रकार उपवन में फूल के डाली से झड़ जाने के बाद भी सुगंध बनी रहती है, वैसे ही भौतिक काया की अनुपस्थिति के बाद भी माँ अपने अनंत रूप में उपस्थित रहती है और उसकी स्मृति की सुगंध से जीवन अनुप्राणित होता रहता है। 

माँ अपने विभिन्न रूपां में हमारे भीतर प्राण का संचार करती है चाहे धरती माता के रूप में, चाहे काली माता के रूप में, चाहे गंगा माता के रूप में, चाहे गौ माता के रूप में, चाहे भारत माता के रूप में और यही भाव-बोध माँ को अनंत रूप में स्थापित करता है और मन कहने को उद्धत हो उठता है

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

इस महान उद्देश्य में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाली समस्त शक्तियों को नमन् करते हुए...। 

 

13 अगस्त 2016 शिव नारायण सिंह


तू फिर मेरी माँ बन - Feb, 05 2026