प्रिय विद्यार्थियों, आज की कथा वार्ता उन दिनों की है, जब भगवान श्रीकृष्ण और उनके मित्र कौन थे ? सुदामा। अरे, सुदामा तो पढ़ने के समय के मित्र थे। अब पढ़ने के समय की बात थोड़े कर रहे हैं। विद्यार्थी श्रीकृष्ण की बात नहीं कर रहे हैं, हम महारथी श्रीकृष्ण की बात कर रहे हैं। महारथी श्रीकृष्ण के मित्र कौन हैं ? अर्जुन। बात सही है विद्वान् हैं आप, और उनके मित्र अर्जुन साथ-साथ नगर भ्रमण पर निकले हुए हैं।
प्रयोजन क्या है ? आप जानते ही हैं। नगर भ्रमण किस लिए कर रहे हैं ? दीन-दुःखियों का दुःख-दर्द दूर करने के लिए, उनकी सहायता करने के लिए, उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए और इसी भ्रमण में आज रास्ते में उन्हें एक भिखारी मिलता हैं। जो क्या कह रहा है ? आप जानते हैं भिखारी क्या कहता है ? कभी मौका मिला है सुनने का ? कहने का नहीं।
भिखारी कह रहा है- ‘जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला।’ यह जो भिखारी है, यही कहता हुआ भीख माँग रहा है जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला। अब कोई भिखारी हो और इस तरह की बात कर रहा हो तो स्वाभाविक है दया आनी-ही-आनी है। अर्जुन को उस पर दया आ जाती है।
जब दया आ गई तो दया बड़ी प्रगाढ़ होती है। दया में आदमी कुछ भी करने को तैयार है। अर्जुन क्या करते हैं अपनी कमर में जो स्वर्ण मुद्राओं की पोटली बाँधे हुए हैं, थैली रखे हुए हैं, वह पूरी-की-पूरी थैली निकालकर उसे दे देते हैं। उस थैली में क्या है ? स्वर्ण मुद्राएँ भरी पड़ी हैं। अब आप सोच सकते हैं वह थैली कितनी कीमती होगी।
अब जैसे ही वह थैली उस भिखारी के हाथ लगती है, तत्क्षण वह क्या हो जाता है ? अरे ! राजा हो जाता है न ? था तो भिखारी और इतनी सारी स्वर्ण मुद्राएँ उसे एक बार मिल जाती हैं तो लखपति, करोड़पति, अरबपति, खरबपति हो जाता है, वह भी अपने को इस धरती का अधिपति समझने लगता है। स्वाभाविक है जिसके पास खाने का ठिकाना न हो, उसके पास इतनी स्वर्ण मुद्राएँ ! प्रसन्न है। क्यों न प्रसन्न हो ? प्रणाम करता है और घर की ओर चल देता है।
जब तक वह भीख माँग रहा था तब तक उसका हाव-भाव, चाल-ढाल कुछ और था और अब इस समय बदल जाएगा कि नहीं बदल जाएगा ? अरे ! इतना रुपया हो गया उसके पास, इतना धन हो गया है, इतनी स्वर्ण मुद्राएँ हैं उसका चाल-ढाल तो बदल ही जाएगा। अब उस नए चाल-ढाल से घर की ओर जा रहा है, लेकिन उसका दुर्भाग्य भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है, वह भी उसके साथ-साथ है।
भिखारी और ऐसे चल रहा हो ! है न आश्चर्य की बात ? और इस आश्चर्य को तुरन्त ताड़ जाता है, कौन ? कौन ताड़ जाता है ? हम आप तो थे नहीं वहाँ। किसकी जरूरत थी ? देखिए, उधर से आवाज आ रही है, लगता है ये सभी वहाँ उपस्थित थे।
एक लुटेरा उस भिखारी को देखता है, उसे लगता है अरे ! यह तो भिखारी है और इस तरह से चल रहा है ! क्या बात है ? जरूर ऐसी कोई बात है कि इसकी चाल बदली हुई है, उसके पास पहुँचता है, अपनी प्रोसेसिंग शुरू करता है। अब आप समझ ही सकते हो प्रोसेसिंग में क्या है, पोटली उसके हाथ लग जाती है, पोटली छीन लेता है, लुटेरा है ही। भिखारी बेचारा फिर जैसे थे की स्थिति में आ जाता है। करता क्या ? उससे कमजोर है, स्थितियाँ ऐसी हैं कि उसके वश का कुछ नहीं है। अब मन मसोसकर कर अपने रास्ते चल देता है, घर पहुँचता है, जो रुखा-सूखा है, खाता है और फिर सुबह प्रतिदिन की तरह भिक्षाटन पर निकलता है।
भीख माँगने निकला हुआ है। उधर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन इनका तो प्रतिदिन का वही काम है। रोज समय मिलते ही, मौका निकलते ही दोनों निकलते हैं नगर भ्रमण पर। आज भी निकले हुए हैं और संयोग भी कुछ ऐसा ही है कि फिर उस भिखारी से मुलाकात हो जाती है।
अर्जुन उसे भिक्षा माँगते देखकर आश्चर्यचकित हैं। कल ही की तो बात है और वह भी लगभग शाम की बात है। रात भर में ऐसा क्या हो गया ? मैंने इसे पोटली भर स्वर्ण मुद्राएँ दी और आज फिर यह भिक्षा माँगने लगा। उनके मन में आता है ठीक ही कहा गया है, आखिर भिखारी ही तो है, भीख माँगने की आदत जो है, यही उसकी दिनचर्या है, यही उसका रूटीन है, आदत पड़ चुकी है और आदत है कि छूटती नहीं।
स्वाभाविक है, आदतवश वह भिक्षा माँगने लगा है आज भी और धन चाहे जितना भी हो जाए, अब भीख माँगने की आदत है तो छूटने वाली नहीं है। कैसे छूटे, मानने वाला नहीं है, कैसे माने। अब यही विचार करते हैं, विचार करते-करते वे उसके समीप पहुँच जाते हैं। कौन ? अर्जुन विचार कर रहे हैं न ? तो अर्जुन विचार करते-करते उसके समीप पहुँच जाते हैं और उससे आज पुनः भिक्षा माँगने का कारण पूछते हैं। वह भिखारी अपनी व्यथा साफ-साफ कह देता है।
अर्जुन एक बार फिर उसकी इस स्थिति से दुःखी हैं। इस बार वे क्या करते हैं, करधन समझते हैं ? कमर में बाँधा जाता है। करधन में तमाम माणिक लगे हुए हैं, तो उसी में से एक माणिक, बड़ा कीमती होता है न माणिक। उसमें से एक माणिक निकालते हैं और उसे देते हैं। पोटली गायब हो गई कोई बात नहीं। चलो, यह बहुत कीमती माणिक है। इसे तुम ले जाओ, बेचकर इससे तुम सुखी जीवन जी सकते हो, तुम्हारा भला हो सकता है, तुम्हें भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह कहकर उसे माणिक दे देते हैं।
संध्या का समय है। थोड़ी देर में रात हो जानी है। वह जल्दी-जल्दी अपने घर की ओर बढ़ता है। फिर कोई चोर मिलेगा क्या ? क्यों फिर कोई चोर मिलेगा ? नहीं, नहीं, चोर-वोर छोड़ा जाए कुछ और सोचा जाए। क्यों, क्या कर रहा है वह ? माणिक लेकर जल्दी-जल्दी घर पहुँचता है।
मैंने कहा, संध्या होने को है। वह सोचता है रात भर की तो बात है, अगर इस माणिक को मैं रात भर छिपाकर रख लिया, फिर सुबह तो इसे बेचकर मैं अपनी मन वाली करूँगा ही, राजा हो ही जाऊँगा। आखिर छुपाएगा तो कहाँ छुपाएगा ? इसकी तो बहुत जानकारी आप लोगों को है। तमाम चीजें आप छिपाते रहते हैं मम्मी-पापा से, कभी-कभी हमसे भी और आज फिर छिपाने का बड़ा अवसर है आपके पास। सर लोग न देख पाएं और आप अपनी वाली कर लें।
अब आप ही बताइए, कहाँ छिपाता है ? छिपाने की जगह आप लोगों को भली प्रकार मालूम होगी। माणिक है, रात भर छिपाना है, उसे बेचकर राजा बन जाना है। कहाँ छिपाएगा ? घर पहुँच चुका है न ? अब घर में जाता है, कोने-अँतरे में खोजता है तो उसे समझ में आता है। एक पुराना घड़ा पड़ा हुआ है, ठीक कोने में एक पुराना घड़ा पड़ा हुआ है। वह सोचता है रातभर की बात है, इसी घड़े में अगर इस माणिक को डाल दूँ तो कोई क्या जानेगा। अरे! अँधेरा है ही और सुबह तक की बात है। बस सुबह को उठूँगा और बेचकर फिर क्या पूछना। उसे उसी में रख देता है।
दिनभर की मेहनत है ही, थका-हारा है ही, वह थोड़ा विश्राम की मुद्रा में लेटता है। इधर उसकी पत्नी जल लेने गई है पनघट पर, नदी पर और वह जैसे ही जल लेकर लौट रही है, जल किसमें ला रही है ? घड़े में न ला रही है ? और दूसरा पात्र क्या हो सकता है ? घड़े में ही जल भरा जाता रहा है पनघट से, नदी से पहले यही व्यवस्था थी। तो पनघट से जल भरकर सिर पर मटकी रखकर ला रही है। तब तक क्या होता है ? रास्ते में बिल्ली रास्ता काट देती है ?
उसकी पत्नी क्या कर रही है ? मटके में पानी लेकर सिर पर रखकर आ रही है न ? तो रास्ते में क्या होना है ? कुछ होना होगा तभी न बात आगे बढ़ेगी। तो रास्ते में उसे क्या कहते हैं ? गाँव की भाषा में ठेक लग जाती है पैर में। उबड़-खाबड़ जमीन है कहीं ठोकर लग गई। अब बताइए, सिर पर घड़ा है, भले पकड़े हुई है, लेकिन जब ठोकर लग गई तो क्या होगा ? घड़ा गिरेगा ही, गिरते ही चकनाचूर हो जाएगा। चकनाचूर कहते हैं न ? तो घड़ा गिरते ही चकनाचूर हो गया। जैसे ही ठोकर लगी, घड़ा गिरते ही चकनाचूर हो गया।
अब क्या करेगी ? वह घर आती है। पानी चाहिए न ? भोजन बनाना है, चाहे और भी जरूरत, आवश्यकता है। बिना पानी के कैसे काम चलेगा ? घर आती है बेचारी चोट-वोट लगी नहीं है, बची हुई है घर आ रही है। अब क्या करेगी ? कोई दूसरा पात्र लेगी और जाएगी पानी भरने। शाम हो रही है रात को पानी कैसे भरने जाएगी। आती है, दूसरा पात्र तलाशती है। दूसरा पात्र कौन-सा है ? अच्छा ! जिसमें माणिक रखा हुआ है न। हाँ, यह बात तो आप सही कह रहे हैं, दूसरा पात्र वही है माणिक वाला। क्यों है ? घर में वही पात्र पुराना पड़ा हुआ है।
एक बात और है यहाँ, उसके पति ने उसे बताया नहीं है। बता दिया होता या वह घर में रही होती। बता दिया होता देखो, ऐसा-ऐसा है। क्यों नहीं बताया ? अपनी पत्नी को खोजकर बताया होता न, इतनी बड़ी बात थी तो खोजकर भी नहीं बताया। पत्नी से भी छुपाया है, क्यों छुपाया है ? पत्नी से क्यों छुपाया है यह बात ? इतनी बड़ी घटना है पत्नी से नहीं बताया। पत्नी को सरप्राइज देना चाहता रहा होगा, नहीं ? आप भी सरप्राइज देते हैं, मजा आता है न ? जब किसी को सरप्राइज देते हैं तो बड़ा मजा आता है।
वह भी मजा ही लेने के लिए पत्नी को नहीं खोजा, पत्नी को नहीं बताया। अभी तक पत्नी से बात छुपा रखी है, अभी पोटली वाली बात भी नहीं बताया है और इसलिए नहीं बताया है कि सरप्राइज देना चाहता है। अब देखा जाए उसके सरप्राइज का क्या हाल होता है।
पत्नी आती है और क्या करती है ? मटका उठाती है, जल्दी भागती है। नदी की ओर जाकर वहाँ से पानी भरती है और लेकर चली आती है। ऐसे ही होता है न ? आप होते तो जरूर ऐसा होता। आप होते तो जाते और पानी में डुबाकर लेकर भाग आते। अरे ! इतने दिन से मटका पड़ा हुआ है घर में, धूल-धक्कड़ नहीं हुआ होगा ? धोएगी नहीं उसे ?
आप लोगों को धोने की जरूरत ही नहीं पड़ती। क्या जरूरत है धोने की ? कोट पता नहीं कब से पहने हुए होंगे ? आज भी पहन के चले आए हैं, धुला थोड़े न होगा यह। अब कितने लोगों का धुला है मैं नहीं जानता। उसे तो मटका धुलना है न ? खाने-पीने की व्यवस्था करनी है। तो क्या करती है नदी में मटका धोएगी न, पानी में डुबाएगी, निकालेगी, धोएगी उसके बाद पानी भर कर आएगी।
अब धुलने के क्रम में क्या करेगी उलट-पलट करेगी ही और उलट-पलट करने से क्या होता है माणिक नदी में गिर जाता है और बह भी जाता है। गिरकर वहाँ रहेगा तो नहीं ? वह तो पानी की धार में बह जाएगा। उसे तो पता नहीं था कि उसमें माणिक है और आप जान रहे हैं न, आप जान रहे हैं कि नहीं जान रहे हैं ? आप तो जान रहे हैं न उस मटके में माणिक है, लेकिन आपके जानने से क्या फर्क पड़ेगा। अरे ! आप यहाँ हैं और मटका कहाँ है वहाँ है।
आप जानते रहिए। जिसे जानना है वह तो जान ही नहीं रहा है। तो स्वाभाविक है अब वह पानी लेकर घर आ जाती है। देर हो ही गई है, जल्दी-जल्दी खाना बनाती है, पति को जगाती है, खाना परोसती है, पंखा झलती है, उसे खाना खिलाती है और खाना खिलाने के ही क्रम में अपनी बात कहती है। पति तो छिपा ले गया।
पत्नी बेचारी क्या छिपाएगी ? वह अपनी बात कहती है, पानी लेने गई थी और उधर से लौट रही थी क्या हुआ ? ठोकर लग गई और मटका फूट गया। अब क्या करती, कोई दूसरा विकल्प नहीं था। अतः जल्दी-जल्दी आई कोने में जो पुराना वाला मटका पड़ा था, उसे उठाई और जाकर धोकर, खंगालकर, माँजकर फिर उसमें साफ पानी लेकर आई हूँ।
अब पत्नी की बात सुनकर क्या हुआ होगा ? जैसे ही पत्नी बोलती है कि मटका ले गई थी धो-धाकर, साफकर पानी लाई तब खाना बनाई हूँ, खाना बनाने में विलम्ब भी हो गया है। अब उसे विलम्ब समझ में आ रहा है ? खाने में टेस्ट आ रहा है ? वह तो सर पकड़ लेता है अपना, बहुत दुःखित है। करता भी क्या ? अपनी पत्नी से दोनों दिन की बात बताता है, देखो कल अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण मिले थे, उन्होंने सोने की पोटली दी उसका यह हाल हुआ और उन्होंने माणिक दी उसका तुमने यह हाल कर दिया।
दोनों दुःखी हैं लेकिन कर भी क्या सकते हैं ? है तो बेचारा भिखारी ही। आज फिर क्या हुआ ? आज फिर भिक्षा माँगने के लिए निकला हुआ है। निकलना-ही-निकलना है और इसी वृत्ति में वह कहीं से गुजर रहा है। अब इसे संयोग कहें या प्रभु की लीला, अर्जुन की निगाह फिर उस पर पड़ती है। उसे भिक्षा माँगते देखकर अर्जुन के आश्चर्य का ठिकाना नहीं है। वे तुरन्त उसके पास पहुँचते हैं और इस भिक्षाटन का कारण पूछते हैं। उस भिखारी के मुख से सारा वृत्तांत सुनकर अर्जुन को बड़ी हताशा होती है, वे बहुत दुःखी होते हैं। मन-ही-मन सोचते हैं, क्या सोचते हैं-
चाहे जितनी करो चतुराई।
करम का लेख मिटे ना रे भाई।।
आप सोच सकते हैं कितनी ही कोशिश की उन्होंने अर्थात् ‘चाहे जितनी करो चतुराई करम का लेख मिटे ना रे भाई।’ उन्हें समझ में आ जाता है कि इस अभागे के जीवन में सुख नहीं है और वे हार मान बैठते हैं। सोच लेते हैं इसके लिए कुछ भी करना व्यर्थ है।
अब जैसे ही ऐसा विचार अर्जुन के मन में आता है। इधर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की यह दशा देखकर मुस्कराते हैं। अर्जुन की पीड़ा और बढ़ जाती है। अर्जुन कहते हैं- केषव ! यह तुम मुझ पर मुस्कुरा रहे हो या उस अभागे भिखारी पर मुस्करा रहे हो ?
श्रीकृष्ण कुछ बोलते नहीं बल्कि उस भिखारी को अपने करीब बुलाते हैं, अपने समीप बुलाते हैं, उसे दो पैसे देते हैं और विदा कर देते हैं। श्रीकृष्ण के पास खजाना कहाँ से मिलेगा, बाँसुरी के अलावा और क्या है ? दो पैसे पड़े हुए थे कहीं से उनके पास, उन्होंने उसे दो पैसे दिए और विदा कर दिया। दो पैसे देता देखकर अर्जुन की उत्सुकता जागती है और श्रीकृष्ण से पूछते हैं, कि भगवन् ! मेरे द्वारा दी गई सोने की वह पोटली और माणिक से जब इसकी दरिद्रता दूर नहीं हो पाई, तो क्या होना है आपके इन दो पैसों से ? आपने व्यर्थ ही उसे दो पैसा दिया, दो पैसे का क्या औचित्य है इस जमाने में।
श्रीकृष्ण उनकी बात सुनकर फिर मुस्करा देते हैं और कहते हैं- चलो आज इसके पीछे चला जाए लेकिन छिपकर चलना चाहिए, देख लेगा तो वह भी परेशान होगा। उसे पता न चले, हम इसके पीछे-पीछे चलते हैं। अब जैसे ही श्रीकृष्ण उसे दो पैसे देते हैं, दो पैसे पाकर भिखारी विचलित है। श्रीकृष्ण के हाथ से दो पैसा पाया है, अर्जुन ने क्या-क्या नहीं दिया उसे ? उसके किसी काम नहीं आया और श्रीकृष्ण उसे दो पैसे दे रहे हैं। समझ नहीं पा रहा है आखिर बात क्या है ? चक्कर क्या है ? वह दो पैसों का करे भी तो करे क्या ? फेंक सकता नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण की दी हुई चीज है और इससे उसके परिवार को एक जून की रोटी भी नहीं मिलनी है, एक समय का खाना भी नहीं बन पाना है। आखिर प्रभु अन्तर्यामी हैं, सब जानते भी हैं। फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया ? यह उनकी गलती है या मेरा भ्रम है, मैं आखिर इन दो पैसों का करूँगा क्या ?
अभी ऐसा ही कुछ विचार करते-करते वह आगे बढ़ रहा था। तभी क्या देखता है कि नदी में से एक मछुआरा जाल खींचकर बाहर ला रहा है और उस जाल में एक मछली है, जो तड़प रही है उस जाल से छूटने के लिए, अपनी जीवन रक्षा के लिए।
इसके मन में आता है ये दो पैसे मेरे हाथ में है, जो मेरे किसी काम के नहीं है। क्यों न इन दो पैसों से मैं इस मछली को जीवनदान दे दूँ। इस मछली को खरीदकर मैं इसे पुनः जल में छोड़ दूँ। यह सुखी होगी, यह ख़ुश होगी मेरे इन पैसों का उपयोग भी हो जाएगा, मेरे पास तो यह व्यर्थ ही है। जैसे ही उसके मन में यह विचार आता है, वह मछुआरे से कहता है, उससे सौदा कर लेता है, उससे उस मछली को खरीद लेता है और उस मछली को अपने भिक्षापात्र में रखता है, पानी भरता है और ले जा रहा है उसे नदी में छोड़ने के लिए।
जैसे ही वह उसे लेकर कुछ आगे बढ़ा है, तब तक उसके पात्र में कुछ खनकने की आवाज आती है। खनकना समझते हैं ? सिक्का डालिए बर्तन में तो खनकता है। तभी उसके पात्र से कुछ खनकने की आवाज आती है। वह देखता है उठाकर। ऊपर उठाकर ले जा रहा होगा न ? तो ऐसे उठाकर देखता है। अरे ! यह तो वही, हाँ, यह हुई न बात। क्या देखता है ? अरे ! यह तो वही माणिक है जो कल अर्जुन ने मुझे दिया था।
अब माणिक देखते ही वह, आप यहाँ भले पागल न हों, लेकिन वह तो वहाँ पागल हो ही जाएगा। जैसे ही माणिक देखता है ख़ुशी का ठिकाना नहीं है, पागलों की तरह चिल्लाने लगता है। क्या चिल्लाता है ? यही न क्या हुआ, मिल गया न ? कहता है, मिल गया ! मिल गया ! मिल गया ! और जैसे ही कहता है मिल गया, मिल गया, मिल गया। फिर देखिए, संयोग क्या है ? वह चिल्ला रहा है मिल गया, मिल गया, मिल गया। तभी कोई उसके बगल से कौन गुजर रहा है ? यही सब रहे होंगे। इन्हें पता है, यही सब रहे होंगे। तब तक उसके बगल से कौन गुजर रहा है, लुटेरा गुजर रहा है।
अब लुटेरा देखता है इस भिखारी को चिल्लाते हुए मिल गया, मिल गया, मिल गया। इसका मतलब इसने मुझे पहचान लिया और सरे बाजार का वाक्या है। अब तो बहुत मुश्किल है, पकड़ा गया तो जेल और तमाम बातें अभी अलग है।
वह दौड़ता है दौड़कर इसका पैर पकड़ लेता है। कहता है- जल्दी चुप हो जाओ, जल्दी चुप हो जाओ, देखो मुझसे गलती हो गई, मैंने जाना नहीं, मैंने तुम्हें पहचाना नहीं, मुझे क्या पता था कि तुम मुझे जान जाओगे, पहचान जाओगे। यह जैसे तुमने हमें दिया है पोटली, वैसे ही तुम्हें यह पोटली वापस कर रहा हूँ। उसने स्वर्ण मुद्राओं की पोटली जैसी की तैसी उसे वापस कर दी।
पीछे-पीछे कौन है ? भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन। अर्जुन यह सब देखते ही श्रीकृष्ण के चरणों में साष्टांग दण्डवत्। क्या कहते हैं ? प्रभु, यह कैसी लीला है आपकी ? जो काम पोटली भर स्वर्ण मुद्राएँ एवं माणिक से न हो सका मात्र आप द्वारा दिए गए दो पैसों से हो गया।
प्रिय विद्यार्थियों, श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन यही तो अपनी-अपनी सोच का अन्तर है और यही शाश्वत सत्य है। जब तक वह भिखारी ‘जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला।’ सोच रहा था अर्थात् जब तक वह समभाव में था उसका गुजारा ठीक-ठाक हो रहा था। वह असंतुष्ट नहीं था ? वह संतुष्ट था। रोज भीख माँगता था, उसका काम चल ही रहा था। उसे न कोई शिकायत थी, न कोई परेशानी थी, न कोई दिक्कत थी।
अरे ! वह अर्जुन से माँगने तो गया नहीं कि आप हमें ऐसा-ऐसा दीजिए। तो जब तक समभाव में था, अपनी स्थिति से संतुष्ट था। जब तुमने उसे स्वर्ण मुद्राएँ एवं माणिक दिए, क्या हुआ ? क्या हुआ बोलिए ? सपने देखने लगा। राजा हो गया, अधिपति हो गया। वह केवल और केवल अपने बारे में सोचने लगा। पहली स्थिति में वह समभाव में था, उसके अन्दर ‘जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला।’
जैसे ही अर्जुन ने उसे स्वर्ण मुद्राएँ दी, माणिक दिया वह केवल और केवल अपने बारे में सोचने लगा। फिर क्या हुआ भगवान श्रीकृष्ण ने उसे दो पैसे दिए। तब क्या हुआ ? वह अपना सब कुछ भूल गया वह दूसरे के बारे में सोचने लगा। है न ? वह केवल और केवल दूसरे के बारे में सोचने लगा।
उसे मछली का दर्द समझ में आने लगा, उसे मछली का दुःख समझ में आने लगा। अपने को भूल गया, अपनी सुधि खो बैठा। उसे लगने लगा मैं मछली को बचा सकता हूँ, उसे जीवनदान दे सकता हूँ। वह पुनः जल में चली जाएगी, प्रसन्नता से रहेगी। तो केवल दूसरे के बारे में सोचने लगा, उसका दुःख दर्द जान गया, उसकी भलाई के बारे में सोचने लगा। तो जब वह ऐसा सोचने लगा तो किसका कार्य कर रहा है ? वह मेरा कार्य कर रहा है और जब वह मेरा कार्य कर रहा है तो मुझे उसके साथ रहना-ही-रहना है। तुम ही बताओ, क्या ऐसा नहीं है ?
प्रिय विद्यार्थियों, अर्जुन ने श्रीकृष्ण से जरूर यही कहा होगा, केशव ! यही ध्रुव सत्य है और मेरा आज आपसे यहाँ कहना है कि आज भी यह उतना ही सत्य है जितना द्वापर में था। सत्य समय, काल, परिस्थिति में नहीं बदलता। सत्य इन सबसे ऊपर है क्योंकि सत्य, सत्य है। मैं कैसे न कहूँ, ‘पर उपकार कुशल बहुतेरे’ दूसरे का उपकार करने वाला सदैव सुखी होता है। वह प्रसन्न रहता है, उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई नहीं हो सकती, किन्तु आज की परिस्थिति ऐसी है कि तुम्हें मेरी बात शत-प्रतिशत सच नहीं लग सकती।
मैंने कहा न कि दूसरे का भला सोचने वाले को कोई कठिनाई नहीं होगी। मेरा मानना है कि आप इस बात पर विश्वास नहीं भी कर सकते हैं, क्योंकि आज हम ‘येन-केन-प्रकारेण’ की सत्ता में विश्वास करते हैं। हम जो भी पाना चाहते हैं, भले हमारे अन्दर उसकी पात्रता न हो फिर भी मानते नहीं हैं और वही करते हैं, जो मैंने अभी बताया येन-केन-प्रकारेण आप उसे हासिल कर ही लेते हैं।
जान लीजिए, इस युक्ति का प्रयोग करके यदि वह मिल भी जाता है तो उसका तुम्हारे लिए कोई अर्थ नहीं है। व्यर्थ है वह। क्योंकि जब तक तुम उसे साध न सको, उसका क्या औचित्य ? देखा तुमने, भिखारी के साथ यही हुआ। अर्जुन ने उसे पोटली भी दी, माणिक भी दिया, लेकिन वह उसे साध नहीं सका क्योंकि उसके अन्दर वह क्षमता नहीं थी। तो फिर उसका औचित्य ही क्या है ।
हमें औचित्यपूर्ण जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि वही इस जीवन की सार्थकता है। यह भी सत्य है कि हम यह नहीं जानते कि अगले क्षण क्या होना है। फिर हमें यह लगता है कि हम जो सोच रहे हैं वही होना है। जैसे अर्जुन को भी लगा कि मैंने उसे इतना धन दे दिया है, अब वह कल से सुखी हो जाएगा, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। कारण चाहे जो रहा हो किन्तु कहीं-न-कहीं इसमें अर्जुन का अहंकार झलकता है। है न बात ? मैंने ऐसा कर दिया, फिर ऐसा हो जाएगा।
प्रिय विद्यार्थियों, मुझे लगता है यह अधूरा ज्ञान है, जिससे श्रीकृष्ण अर्जुन को मुक्त करना चाहते हैं क्योंकि पूर्ण एवं परिपक्व ज्ञान ही अहंकार से मुक्ति दिला सकता है और यहाँ ऐसा ही हुआ। जब अर्जुन के समक्ष सारी स्थितियाँ स्पष्ट हुई फिर अर्जुन को बताने की जरूरत नहीं पड़ी, वे स्वतः श्रीकृष्ण के चरणों में दण्डवत् हो गए।
मनुष्य वही है जिसमें मनुष्यता है, मानव मात्र के लिए तत्पर है। जब तक वह भिखारी सभी के भले की बात सोच रहा था, उसका जीवन ठीक-ठाक चल रहा था। जब उसने केवल अपने बारे में सोचा, आत्मकेन्द्रित हुआ और जब उसने दूसरे के बारे में सोचने की शुरुआत की आपने देख ही लिया। जब वह दूसरे के बारे में सोचता है अहंकार रहित है। उसका अहंकार विसर्जित हो गया है।
अहंकार मुक्त ज्ञान द्वारा ही हम इस जीवन की गहराई को समझ पाते हैं, दुनियादारी की विसंगतियों को जान पाते हैं और प्राकृतिक रूप में सरल, सहज, निष्छल जीवन की ओर बढ़ पाते हैं। जिसने भी इसे समझ लिया, आत्मसात् कर लिया फिर उसका क्या पूछना। किन्तु यह इतना आसान नहीं है जितनी आसानी से मैं तुम्हें समझा पा रहा हूँ। क्योंकि मेरा समझाना मात्र सिद्धांत है और सिद्धांत तब तक व्यर्थ है जब तक कि वह प्रयोग की जटिलताओं में परिष्कृत होकर, निखरकर बाहर न आ जाए, तब तक तुम उसमें प्रवेश न पा सकोगे कहा भी गया है-
काजल की कोठरी में कैसो हू सयानो जाए।
एक लीक काजल की लागिहैं पै लागिहैं।।
अर्थात् बेदाग बाहर न निकल जाए। हाँ, ऐसा भी नहीं है कि कोई निकल ही नहीं पाता। वे सभी निकल आते हैं जिन्हें अहंकार मुक्त ज्ञान है।
प्रिय विद्यार्थियों, ज्ञान का अर्थ है- जहाँ अहंकार विसर्जित हो चुका है, जहाँ अहंकार है ही नहीं, उसका नामोनिशाँ मिट चुका है और वे लोग कौन हैं जानते हैं ? वे लोग और कोई नहीं, वे हैं आप। लेकिन कब और कैसे ? तो यहीं जब आप प्रार्थना सभा में मुझे सुन रहे होते हैं, उस समय आप निश्चित ही पूर्ण मनुष्य की श्रेणी में पहुँच जाते हैं। बस जरूरत है इस अवस्था को विस्तार देने की।
जो भी इस अवस्था को जितना विस्तार दे सकता है, वह उतना ही बड़ा ज्ञानी हो जाता है। आप ज्ञान की ओर बढ़ रहे हैं और यही ज्ञान आपके जीवन के हर क्षेत्र में विकास के अवसर बनकर आपको वहाँ पहुँचाता है, जहाँ आपकी जगह है, जिस उद्देश्य के लिए आप हैं और आपको सब कुछ अपने अनुकूल लगने लगता है। आप उसमें रम जाते हैं और ऐसा कुछ कर गुजरते हैं, जो इस दुनिया को दो कदम आगे पहुँचा देता है। क्योंकि आपके जीवन का उद्देश्य ही यही है कि आप इस दुनिया को अपनी मेहनत से, अपनी योग्यता से, अपनी क्षमता से और अपने कर्मों से दो कदम आगे ले जाएं।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
शिवोऽहम्
मैं कल्याणकारी हूँ।
धन्यवाद।