मेरे प्रिय जागो

क्या शिक्षा ही ज्ञान है ?

मेरे प्रिय, अपने आराध्य की असीम अनुकंपा के साथ इस पूरे परिवेश को नमन करते हुए अपनी वार्ता प्रारंभ करता हूँ। हाँ, आज का विषय है- ‘क्या शिक्षा ही ज्ञान है ?’ 

तो अब शिक्षा ज्ञान है या नहीं, यह तो आपको तय करना है, मुझे तो बस अपनी बात रखनी है- क्या शिक्षा है और क्या ज्ञान ? शिक्षा की शुरुआत परिवार में, परिवेश में, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, जरूरत, आवश्यकता , परिस्थिति जब जैसी बन पड़ती है। यूँ भी कह सकते हैं विद्यालयों में, एक सहज एवं सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। कह सकते हैं यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती, जीवनपर्यन्त चलती रहती है, सतत् प्रवाहमान रहती है। बस इसका स्वरूप बदल जाता है। हम जहाँ होते हैं, उसी के अनुरूप इसका स्वरूप हो जाता है, जैसे कि आप यहाँ हैं, मैं अपने विद्यालय में हूँ, तो कोई बाज़ार में है, लेकिन यह प्रक्रिया है तो सतत् गतिमान ही न। 

आज के परिवेश में शिक्षा का सीधे रोजी-रोटी से संबंध हो जाने के कारण इसका महत्व, इसकी जरूरत और भी बढ़ गई है। प्रत्येक का उद्देश्य एवं सोच यही हो गया है कि सभी शिक्षित हों। किसी-न-किसी रूप में हम सभी या जो जहाँ है, वहीं एक ऐसा प्रयास जरूर कर रहा है कि जो भी उसके आस-पास हो या जो भी उसके सम्पर्क में हो, जैसे- आपके घर दूध देने वाला आता है, कपड़ा धोने वाला आता है, बरतन मांजने वाली आती है, तो जो भी उसके डायरेक्ट टच में हो, वह उसे शिक्षित करना चाहता है। यह महत्वपूर्ण बात है, कोई इससे इनकार नहीं कर सकता। अर्थात् हममें से प्रत्येक व्यक्ति इस दिशा में प्रयासरत है।

एक शिक्षक, प्राचार्य के रूप में मेरा भी जीवन लक्ष्य कुछ ऐसा ही है कि अधिक से अधिक लोगों को शिक्षित कर सकूँ। हम शिक्षिका करने की वह हर कोशिश कर रहे हैं जिससे जो भी हमारे करीब हैं उन्हें हम शिक्षित कर सकें, लेकिन हमें इसका एहसास नहीं है कि हम इस प्रयास में हैं कहाँ ? यह भी हमारी एक कठिनाई है जिसका समाधान शायद यह हो सकता है। 

एक छोटी-सी घटना जो मेरे ही विद्यालय के छात्रावास की है, मैं उसे आपके सम्मुख रखना चाहता हूँ। यह बात अप्रैल-मई महीने की है जब वार्षिक परीक्षाएँ चल रही होती हैं। कॉलेज कैम्पस में ही मेरा आवास है। एक शाम मेरे मन में आया तो टहलता हुआ छात्रावास की ओर चला गया। वहाँ थोड़े-बहुत बच्चे रहते हैं। 

उस दिन सण्डे था। कुछ बच्चे घर गए हुए थे और शेष उपस्थित थे, लेकिन जो बच्चे घर गए हुए थे, उन्हें भी शाम तक हर हाल में आ जाना था क्योंकि मण्डे को उनकी परीक्षा थी। मेरा दृष्टिकोण यही रहा होगा कि जाकर देखूँ कि बच्चे आए कि नहीं आए। मैं टहलते-टहलते मेस में चला गया। खाना बन रहा था। मुझे लगा कि खाना कुछ कम बन रहा है। 

ऐसा ही था भी, लेकिन बात समझ में नहीं आई कि खाना कम क्यों बन रहा है ? जब सुबह परीक्षा है तो बच्चे रात तक आ ही जाएंगे। ऐसा तो है नहीं कि बच्चे परीक्षा छोड़ देंगे, जब उन्हें कोई परेशानी नहीं है, न ही कोई समस्या है। अब वे तो आएंगे ही और दाल, सब्जी सब एक ही साथ बन गया होता तो ठीक रहता, फिर दुबारा बनाना पडे़गा, तो ऐसी बात बिल्कुल नहीं है कि वे नहीं आएंगे। बच्चों को आना ही है तो फिर भोजन कम क्यों बन रहा है ? उनका भी बनना ही चाहिए। दाल, सब्जी तो जरूर बननी चाहिए, रोटी भले उनके आने पर बन जाए।

मैंने भंडारी से पूछ लिया- क्यों, ऐसी क्या बात है जो भोजन कम बन रहा है ? कल सुबह बच्चों की परीक्षा है, वे आ ही जाएंगे। ऐसा तो है नहीं कि कोई परीक्षा में न पहुँचे, सभी को देर-सवेर पहुँच ही जाना है। 

मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई, भंडारी कुछ कहता, तब तक उसके बगल में उसका लड़का, जो उसके साथ ही खड़ा है, कहता है- नहीं, ऐसी बात नहीं है। अब भंडारी से समझदार उसका लड़का रहा हो या जो भी बात रही हो। वह लड़का तपाक से बोल पडा़- नहीं, ऐसी बात नहीं है।

बात मुझे लगती है। आखिर ऐसी क्या बात है जो भंडारी का लड़का मुझसे ऐसे बोल रहा है ? मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि अब उस लड़के की ओर गई कि ऐसी क्या बात है, यह ऐसा क्यों कह रहा है, जबकि भोजन कम ही बन रहा है ? 

मैंने कहा- ऐसी बात नहीं है, यह तुम कैसे कह सकते हो ? तुम क्या जानते हो इस बारे में ? तुम यहाँ केवल रहते भर हो न।

उसने कहा- नहीं, ऐसी बात नहीं है। जो भोजन बन रहा है, वह कम नहीं बन रहा है।    

मुझे बड़ा अजूबा लगा। भंडारी चुप है। जैसे शायद पिता से ज्यादा समझदार पुत्र ही है। 

मैंने पूछा- अच्छा, तुम्हीं बता दो। अरे, मैं तो जान रहा हूँ कि बच्चे घर गए हैं और अभी लौटे नहीं हैं। हो सकता है भंडारी के दिमाग में भी यही बात रही हो कि बच्चे घर गए हैं और वे आज नहीं भी लौट सकते हैं। उसे ठीक-ठीक जानकारी भी न रही हो कि कल परीक्षा है।

वह लड़का कहता है- ठीक है, बता रहे हैं हम।

वह क्या बताता है, आप जानते हैं ? नहीं न। 

उसने कहा- भोजन कम नहीं बन रहा है। भोजन पूरा-पूरा बना है।

मैंने कहा- अरे, मैं दाल भी कम देख रहा हूँ, सब्जी भी कम देख रहा हूँ।

उसने कहा- दाल, सब्जी कहाँ कम है ? दाल, सब्जी तो बनी ही हुई है।

तब मैंने कहा- कम पडे़गा।

उसने कहा- कम नहीं पडे़गा।  

मैंने कहा- कैसे कम नहीं पडे़गा ?

उसने कहा- ऐसा है कि कम पड़ने के पहले थोड़ा पानी मिला देंगे, थोड़ा नमक मिला देंगे और ऊपर से मिर्च डाल देंगे, गर्म कर देंगे, बस काम खत्म। काम चल जाएगा। सभी भोजन कर लेंगे।

मेरे प्रिय, बेशक आप सही समझ रहे हैं। किन्तु यहाँ मेरा प्रश्न है आखिर यह पढ़ाई कहाँ पढ़ाई जाती है ? वह लड़का शिक्षित हो रहा है, दीक्षित हो रहा है और विद्वान् बन रहा है। वह स्कूल के हॉस्टल में रह रहा है। मैं फिर यह बात कह रहा हूँ कि बेशक यह पढ़ाई स्कूलों में नहीं होती, किसी स्कूल में तो ऐसा पढा़या नहीं जाता फिर उसने कहाँ सीखा यह सब ? ऐसी ही तमाम बातें हम कहाँ सीखते हैं, यह जानना होगा। यह एक अहम् प्रश्न है। इसे हम झुठला भी नहीं सकते। यह सच है।

मनुष्य पर ईश्वर की बड़ी कृपा है। उसके पास जो मन है, बुद्धि है, विवेक है, चैतन्य है; जब वह जागृत रहता है, तो वह अपने आस-पास के तथ्यों को देखता, सुनता, समझता है, महसूस करता है, परीक्षण करता है, संग्रह करता है और जरूरत, आवश्यकता पड़ने पर वे चीजें अपने आप बाहर आ जाती हैं।

जैसा कि आपने देखा भंडारी के बच्चे के साथ, समय के साथ जरूरत पड़ी और बात बाहर आ गई। यह भी शिक्षा ही है। एक शिक्षा हम भी देते हैं।दोनो में अंतर क्या है ? व्यक्ति एक स्वतः प्रकृति की व्यवस्था में सीखता है और दूसरा हमारी इस व्यवस्था से, जो हमने कर रखी है, जिसमें हम जी रहे हैं। यह भी शिक्षा ही है। एक शिक्षा हम भी देते हैं और दूसरी शिक्षा वह बाहर से पा रहा है तो हम दोनों से सीखते हैं। क्यों सीखते हैं ? सीखना हमारा स्वभाव है इसलिए हम सीखते हैं। एक स्वतंत्र रूप से सीखते हैं और दूसरा नियमबद्धता के साथ। 

यहाँ मैं एक शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ जिस पर ऑब्जेक्शन हो सकता है। वह है जबरदस्ती। तमाम बातें हमें जबरदस्ती सिखाई जाती हैं और हम सीखते भी हैं। मेरी बात आपको हास्यास्पद लग सकती है। तमाम बातें ऐसी होती हैं जो हास्यास्पद लगती हैं। कब ? जब वह महत्वपूर्ण होती हैं। क्योंकि वे या तो तुरंत समझ में नहीं आती हैं या फिर हम उसे समझना नहीं चाहते। समझना क्यों नहीं चाहते ? स्पष्ट है, समझ जाएंगे तो फिर करना पडे़गा। कौन झंझट में पडे़ ? उसे करने की परेशानी क्यों उठाए ? 

मेरे प्रिय, एक बात तो हुई जो सीखने पर थी, अब दूसरी बात शिक्षा पर। शिक्षा के लिए संसार, समाज, संस्कृति और संस्कार का अपना अलग-अलग महत्व है। मेरी समझ में जो बातें हैं वही मैं आपसे कह रहा हूँ। यह अलग बात है कि आप मुझसे ज्यादा विद्वान् हो सकते हैं। किन्तु यहाँ ये बातें मेरे मन की उपज है। इन तमाम बातों में कुछ ऐसी हो सकती हैं जो आपको पसंद नहीं भी आ सकती हैं। 

यहाँ जो मेरी समझ है, उसमें शिक्षा के तीन स्टेज हैं। एक हम सीखते हैं परिवेश से, जो हम जीवनपर्यन्त सीखते हैं। दूसरा हम सीखते हैं विद्यालयों से, जिसकी अवधि निश्चित है। एक टाइम पीरियड तक ही हम विद्यालय में सीखते हैं और तीसरी बात, वह है- स्वानुभव। यह चिंतन, मनन और बातों के जानने पर निर्भर करता है। इसमें कौन कहाँ तक पहुँच रहा है, अपनी-अपनी पहुँच की बात है।

अब शिक्षा के धनात्मक बिंदुओं को मैं आपके सामने रख रहा हूँ। इससे तो आप जरूर सहमत होंगे, लेकिन इसके बाद मैं जो बात कहूँगा उसमें आपकी असहमति हो सकती है। यह डिस्कशन का विषय है किन्तु मैं क्षमा चाहूँगा इस समय नहीं, उस पर हम बाद में बात कर लेंगे। मुझे शिक्षा और ज्ञान को जोड़ना है, मैं नहीं जोड़ पाऊँगा ऐसा मेरा मानना है। जोड़ना आप ही को है। शिक्षा के प्लस प्वॉइंट हैं जिन्हें आप जान ही रहे हैं- 

सा विद्या या विमुक्तये

शिक्षा मुक्ति प्रदाता है,अन्तर्निहित गुणों का प्रस्फुटन है, व्यवहार में परिवर्तन लाना है जिससे हम चुनौतियों का सामना करने योग्य बन सकें। एक जीवंत और अंतहीन प्रक्रिया है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण है। 

बस ये दो-चार प्वॉइंट अपने स्तर से या जैसे भी आपके सामने रख सका, किन्तु निगेटिव प्वॉइंट मेरे पास इससे थोडे़ ज्यादा हैं, इसलिए मैंने कहा कि ये मेरे अपने विचार हैं। इसमें कमी हो सकती है, इसका आप द्वारा विरोध हो सकता है, जिसके लिए मैं तैयार हूँ, लेकिन इसके बाद भी कुछ ऐसा है जिसे यहाँ कहना जरूरी है। 

आज की शिक्षा चतुराईपूर्ण उपाय बन गई है। आज की शिक्षा तकनीकी प्रशिक्षण बनती जा रही है। वह शिक्षा जो जीवन को समग्र बोध से दूर करे, आप क्या कहेंगे उस शिक्षा को ? भला वह शिक्षा किस काम की, जो मनुष्य को मनुष्यता से अलग कर दे ?

शिक्षा को हमने अपने अहम्, महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन बना लिया है। सारी शिक्षा कैलकुलेशन बेस्ड हो गई है। मैं मैथमेटिक्स का विद्यार्थी रहा हूँ, इस बात को मैं अपनी इसी योग्यता के आधार पर कह रहा हूँ। सारी शिक्षा कैलकुलेशन बेस्ड हो गई है।

शिक्षा ने अपना मूल स्वरूप खो दिया है। केवल कुछ परीक्षाएँ पास कर लेना या किसी बडे़ पद की नौकरी प्राप्त कर लेना, मैं नहीं समझता शिक्षा है। जिस शिक्षा का संबंध जीवनचर्या से न हो, वह एकदम बेकार है, किसी काम की नहीं है, उसका कोई मतलब नहीं है। चाहे कितनी भी बड़ी डिग्री ले लें, मैं इसे शिक्षा नहीं मानता।

मेरे अपने शब्दों में शिक्षित होने का अर्थ, जीवन के इस विशालतम क्षेत्र में सबके प्रति अपने कर्तव्य का बोध होना है। शिक्षा का मुख्य कार्य मानवीय संवेदनाओं को जागृत करना है। अब यह विचारणीय है कि हम कितना कर पाते हैं ? कैसे कर पाते हैं ? कब और कहाँ तक कर पाते हैं ?

मेरे प्रिय, आइए, अब बात की जाए ज्ञान की। ज्ञान तो मेरे अपने स्तर से ऊपर की बात है, किन्तु आप विद्वानों के साथ कुछ बातें हो ही जाएं। सही अर्थो में शिक्षा स्वयं को समझना है और यही ज्ञान है। ज्ञान प्रकाश है, ज्ञान अनुभूति होना है, जानना है, यह अंदर से उपजने वाली चीज है, अंकुरित होने वाली चीज है। 

जैसे अंकुरित होने वाली चीजें दबी रहती हैं, ढँकी रहती हैं उसी तरह ज्ञान भी अंदर से उपजने वाली चीज है। शिक्षा वास्तव में अंकुरण है ज्ञान का। जानकारियाँ बदलती रहती हैं, वेरियेबल हैं। ज्ञान स्थिर है, बदलता नहीं है। जो नित्य है, सदैव है, स्थिर रहता है, कॉन्सटेण्ट रहता है वही शाश्वत है, जिसका रूपांतरण नहीं है, सदा एक जैसा है। स्वयं को जानना ज्ञान है और दूसरे को जानना शिक्षा। 

आइए, आगे बढ़ते हैं। जो शिक्षा सृजन कर सकती है, समझिए वही ज्ञान है। बुद्ध ने कहा है, क्या कहा है बुद्ध ने ? उसे बाहर मत खोजो, अपने चित्त को जगाओ, यही ज्ञान है, इससे अलग ज्ञान कुछ भी नहीं है। चित्त जागृत हो गया, आप ज्ञानी हो गए। मीरा ने क्या कहा ? जब मैं उसे खोजने चली, मैं रही ही नहीं, वही ज्ञान है। कबीरदास कहते हैं- 

धीमर जाल डाल का करिहैं।

जब मीन पिघल भई पानी।। 

मछली पकड़ने वाला धीमर जाल डालकर क्या करेगा जब मछली पिघलकर पानी हो गई हो ? अर्थात् पूर्णता में समाहित होना। यही ज्ञान है।

            सूर ने, तुलसी ने, नानक ने, रैदास ने, ईसा ने, श्रीकृष्ण ने क्या कहा ? वही कहा है जो वेद की ऋचाएँ कहती हैं, उपनिषदों के सूत्र कहते हैं, आचार्यो के भाग्य, मुनियों की दृष्टि, विद्वानों की लेखनी, सभी का यही सार है- वही ज्ञान है जो मन को मथने से प्राप्त होता है। स्व से मुक्ति अर्थात् कर्ता भाव उपजना ही ज्ञान है। इस सृष्टि में दो चीजें अनंत हैं। एक ज्ञान और दूसरा जिसके खिलाफ हमारी लडा़ई है- अज्ञान। इस दुनिया में यह दो चीजें अनंत हैं एक ज्ञान और दूसरा है अज्ञान।

अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए, मैं आपको अपने पड़ोस में ले चल रहा हूँ। देवरिया चलिए आप, मेरे स्कूल के आस-पास की एक शाम की घटना है। मैं स्कूल कैम्पस में ही रहता हूँ लेकिन पड़ोसी तो तब भी रहेंगे, पड़ोसी तो हैं ही। 

मेरा एक पड़ोसी देर से घर लौटा। अब बताने की जरूरत नहीं है कि देर से कौन घर लौटता है। हाँ-हाँ सही कह रहे हैं आप, देर से घर कौन लौटता है ? मैं तो कभी देर से घर नहीं लौटता, मैं तो घर में ही रहता हूँ, मौका मिलता है तो भागकर जाता हूँ और समय से पहले ही वापस आ जाता हूँ कि कोई कहे ना। आपने कह दिया, कहना तो मुझे भी था।

मेरा वह पड़ोसी देर रात से घर लौटता है। अब जब घर देर से लौटता है तो आप जान ही गए हैं कि वह थोड़ी मस्ती में होता है। उस रात थोड़ा ज्यादा नशे में होता है। अपना घर पहचान नहीं पाता है। ऐसा होता होगा, हाँ मैं तो नहीं जानता, लेकिन ऐसा जरूर होता होगा तभी तो हुई यह घटना। वह अपना घर नहीं पहचान पाता है। 

अब जब घर नहीं पहचान पाता है, लेकिन अभ्यासवश, पै्रक्टिस से, आदतन वह अपने घर के दरवाजे तक तो पहुँच ही जाता है। अब रोज ही घर आता है तो पहुँच ही जाएगा, यह स्वाभाविक भी है। वह अभ्यास से अपने घर के दरवाजे पर पहुँच गया है, लेकिन जैसे ही देखता है, उस स्थिति में व्यक्ति की अपनी एक अलग स्टाइल हो जाती है देखने की, तो जैसे देखता है, उसे वह घर अपना नहीं लगता है।

वह कहता है कि आखिर यह घर मेरा कैसे हो सकता है ? मेरा घर तो कुछ ऐसे था, यह घर उसे कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। अब उसे जब अपना घर बदला-बदला सा लगता है और रात भी आखिर हो ही गई है, लेकिन उसी अभ्यासवश वह उस घर का दरवाजा खटखटाता है।

अब घर का दरवाजा खटखटाएगा तो घर में उसकी माँ जो अकेली होती है, बस माँ और बेटा ही हैं, वह घर का दरवाजा खटखटाता है तो उसकी माँ निकलती है। वह अपनी माँ का पैर पकड़ लेता है, खूब जोर से पैर पकड़ लेता है और कहता है कि ऐसा कर, मुझे मेरे घर पहुँचवा दे। 

वह क्या कहता है अपनी माँ से ? कि ऐसा कर मुझे मेरे घर पहुँचवा दे, तेरी बड़ी कृपा होगी। अभी उसकी माँ कुछ कहती, उसके पहले वह अपनी बात पूरी कर रहा है- मुझे मेरे घर पहुँचवा दे, मैं भटक गया हूँ, मैं रास्ता भूल गया हूँ। मेरी माँ मेरी राह देख रही होगी, मेरा इंतजार कर रही होगी। बहुत रात हो गई है। बड़ी कृपा होगी तेरी, जो किसी तरह मुझे मेरे घर पहुँचवा दे।

अब उसकी माँ कहती है- नासमझ, मैं ही तेरी माँ हूँ और यही तेरा घर है। यहीं पर तू पला-बढ़ा और इतना बड़ा हुआ है। क्या तू इसे नहीं पहचानता ? जरूर आज ज्यादा नशे में है, तभी तो ऐसा कह रहा है। 

तब तक वह कहता है- तुम मुझे समझाने की कोशिश न करो। मैं समझने वाला नहीं हूँ, मुझे अपनी बातों में उलझाओगी तो भी कोई फायदा नहीं है। रात बढ़ रही है और मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही होगी। मैं तुम्हारे झाँसे में नहीं आने वाला। मैं इतना भी नासमझ नहीं हूँ। बस यही एक कृपा कर सकती हो तो कर दो कि मुझे मेरे घर पहुँचवा दो।

अब इतनी और इस तरह की बात उस व्यक्ति के द्वारा होगी तो आस-पास के लोग जुट ही जाएंगे। मैं भी पड़ोसी, छत से ही देख सुन रहा था, मैं भी पहुँच गया वहाँ, पड़ोस के तमाम लोग उसे समझाने की कोशिश कर रहे हैं। अब क्या कोई उसे समझाता, आप ही बताइए ? 

सभी लोग उसे समझा रहे हैं। अब जो जितना भी उसे समझाता है उतना ही वह ज़िद करता है। वह कहता है- मैं इतना मूर्ख थोडे़ ही हूँ जो मैं अपना घर ही न पहचानूँ, मैं अपनी माँ को ही न पहचानूँ। यह कैसे हो सकता है ? 

यह दूसरी बात है कि मैं नशे में हूँ, मैं तो आदी हो गया हूँ। ऐसी कोई बात नहीं है। मैं सब समझ रहा हूँ, मैं सब जान रहा हूँ। अगर आप लोग कुछ कर सकते हैं तो बस इतना कर दीजिए कि मुझे मेरे घर तक पहुँचवा दीजिए, वहाँ मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही होगी।

तब तक हम क्या देखते हैं, एक लड़का जो निश्नित ही उसका साथी रहा होगा, तुरंत मोटरसाइकिल लेकर आता है। वह मोटरसाइकिल खड़ा करता है और कहता है कि चल मैं तुझे तेरे घर पहुँचा देता हूँ। वह मोटरसाइकिल स्टार्ट करता है और उस लड़के को बैठाने की बात करता है। 

इधर उसकी माँ चिल्ला रही है, बेटा तू उसकी बातों में मत आना, तू उसकी मोटरसाइकिल पर मत बैठना, वह भी नशे में है, जो तुझे कहीं और ले जा रहा है। वह भी नशे में है, तू भी नशे में है। वह तुझे कहीं और ले जा रहा है। तू मुझसे दूर चला जाएगा। तू फिर पता नहीं लौट पाएगा कि नहीं लौट पाएगा, लेकिन उस बूढ़ी माँ की कौन सुनने वाला है ? बूढ़ी माँ चिल्ला रही है, उसकी कौन सुने ?

ठीक यही हाल है। किसका ? बताएं। तो जान लीजिए, इस शिक्षा व्यवस्था का। बूढ़ी माँ और जवान बेटा, कहीं-न-कहीं यही स्थिति है। अब कितनी है ? आप इसे समझ रहे हैं। मैं जो समझ रहा हूँ उसे आपसे कह रहा हूँ कि हम सभी नशे में इसे एक से दूसरे तक पहुँचाते आ रहे हैं और कहाँ पहुँचते जा रहे हैं ? यह न तो हम जान पा रहे हैं, न समझ पा रहे हैं, न अनुभव कर पा रहे हैं।

मेरे प्रिय, समस्याओं की जड़ में जाना जरूरी है। मूल समस्या क्या है ? शिक्षा पद्धति पर गौर करना होगा, पुनः गौर करना होगा, बार-बार गौर करना होगा। जबसे यह शिक्षा पद्धति चली आ रही है, हम केवल इतना ही सीख पाए हैं। आगे क्या सीखेंगे, आप जानें, राम जानें।

जड़ पर ध्यान नहीं देंगे तो पत्ते, फूल और फल का भगवान ही मालिक है। पौधे की जड़ को पानी दिया जाता है। पत्ते को पानी देना किस श्रेणी में आता है, यह मैं नहीं कहना चाहता, लेकिन हम सभी कहीं-न-कहीं यही कर रहे हैं। 

क्या कर रहे हैं, कैसे कहूँ ? हमने कभी यह विचार ही नहीं किया कि शिक्षा के नाम पर हम क्या दे रहे हैं और क्या ग्रहण कर रहे हैं क्योंकि जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ रहा है, वैसे ही वैसे समाज की समस्याएँ बढ़ रही हैं। क्या यह इसी शिक्षा का परिणाम नहीं है ? आखिर यह रिजल्ट कहाँ से आया है ? आखिर यह सब चीजें तो इसी में से आ रही हैं। क्यों आ रही हैं ? कैसे आ रही हैं ? यह प्रश्न आज भी खड़ा है हमारे सामने। तो सत्यता यही है कि कमी इस शिक्षा-व्यवस्था में है जिस पर हमारा ध्यान ही नहीं जा रहा है।

इस शिक्षा का संपूर्ण आधार बदलना होगा, निश्चित बदलना होगा, बिना बदले कुछ भी संभव नहीं है। जीवन विषयक तथ्यों के साथ-साथ नित्य प्रति जीवन में घटने वाली घटनाओं, क्रियाकलापों को समझकर आज की शिक्षा में सम्मिलित करना होगा। यही मेरा मानना है कि आज समुचित शिक्षा की जरूरत है। आचार्य स्वयं समुचित शिक्षित होगा, तभी वह दूसरे को शिक्षित कर पाएगा। हमें किताबों से बाहर आना होगा।

मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि हमें क्लासरूम छोड़ने की भी जरूरत है। सहज, सजग और सचेत होकर स्वयं को जानना होगा, नहीं तो आज की जो यह स्थिति सामने है, कहने की जरूरत ही नहीं है। जहाँ से चले थे वहीं रह गए, इससे अधिक तो नहीं लगता। शिक्षा में प्रकृतिस्थ गुणों का समावेश करना होगा। शिक्षा को सृजनशील बनाना होगा, रुचि से जोड़ना होगा। अंदर तक प्रवेश करा कर मनुष्यता का विस्तार करना होगा, क्योंकि मनुष्यता का विस्तार महत्वपूर्ण है।

मेरे प्रिय, अभी थोड़े दिन पहले हमने गुरु पूर्णिमा मनाई। आप भी मनाए होंगे। दक्षिणा चढ़ाना और क्या-क्या करना सब अपनी जगह है ही, गुरु को याद भी करते हैं, इंतजार भी करते हैं और हम अपनी तैयारी के साथ पहुँचते भी हैं। मैं तो बुलाने पर एक दिन बाद पहुँचा, क्योंकि उस दिन तो मैं अपने विद्यार्थियों के बीच ही था, लेकिन उस बात को मैं कैसे कहूँ ? कहा जाता है-

गुरु बिन होहि न ज्ञान 

यह बात कही हुई है, सत्य भी है, हम सभी मानते भी हैं। मैं इस समय आप द्वारा वोटिंग नहीं करा रहा हूँ कि कौन मानता है और कौन नहीं मानता है, लेकिन हाँ, आपसे यह बात कह रहा हूँ, यह एकदम निहायत मेरी अपनी बात है।

मेरा ऐसा भी कुछ नहीं कहना है कि आप मेरी बात को मान ही लीजिए। मेरी इस बात को केवल सुन लीजिए और अपने दिमाग के किसी कोने में जगह दे दीजिए बस, उससे अधिक मेरी जरूरत भी नहीं है। समय आएगा तो जैसा आज मेरे साथ आया है, वैसे ही कल आपके साथ भी बाहर आ जाएगा।

‘गुरु बिन होहि न ज्ञान।’यह पुरानी परंपरा है, यह तो आप मानते हैं। क्योंकि हमारे पास एक नई परंपरा भी है, जिसे हम जानते हैं, कहते नहीं, लेकिन मैं आज कहूँगा। पुरानी परंपरा में क्या होता है ? गुरु और शिष्य के बीच क्या है, बताइए ? पुरानी परंपरा है, पुरानी परंपरा में गुरु और शिष्य के बीच क्या है ? एक भाव है। है न ? वह कौन-सा भाव है ? समर्पण का। है न ? अब ईमानदारी से वहाँ चला जाए जहाँ यह बात हो रही थी, तो वहाँ यह एकदम स्पष्ट है कि गुरु और शिष्य के बीच समर्पण है।

गुरु क्या कहता है ? गुरु कहता है- जानो। गुरु और शिष्य के बीच समर्पण का भाव है। गुरु का पहला शब्द है, जानो। शिष्य क्या करता है ? जानने की कोशिश करता है, जानने के क्रम में लगा रहता है, उसे बहुत जल्दी नहीं है। ऐसा नहीं है, शिष्य कह दे कि मैं इतने दिन शिष्य रहा और आज से मैं शिष्य नहीं। आपके कई गुरु हो सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि जो पहले गुरु थे अब आप उनके शिष्य नहीं हैं। 

छठवीं में पढ़ाते थे हमें श्री नन्दू जी। अरे ! वे तो छठवीं के मास्टर साहब थे। अब वे कहाँ गुरु रहे ? अब तो हमारे गुरु जो एम.एससी. में पढ़ाए थे, मेनसेरवानी जी पढ़ाए थे, बस वे ही गुरु हैं। आज कोई और गुरु होगा। वह बहुत लम्बी प्रोसेसिंग है। गुरु और शिष्य का संबंध समर्पण का है और उसमें शिष्य क्या करता है ? शिष्य सार ग्रहण करता है। अब कैसे करता है यह तो आप समझ ही रहे हैं, लम्बी प्रोसेसिंग है, चाहे साथ रहता है चाहे अन्य भी चीजें हैं। 

जैसे हम भोजन करते हैं, तो हमें साफ-साफ दिखाई देता है, किन्तु टी.वी. में प्रचार आता है कि एक कप पीए और तुरंत काम बन जाए तो ऐसा नहीं है, जो भोजन हम करते हैं उसकी एक लम्बी प्रोसेसिंग चलती है। सेवेन स्टेजेज में हमारा भोजन पचता है और उसके बाद उसमें से ओज उत्पन्न होता है।

स्टेजेज आप जान ही रहे होंगे। भोजन पचने के बाद वह रस में बदलता है। रस मांस में बदलता है। मांस मेद में, मेद अस्थि में, अस्थि मज्जा में और मज्जा ओज में। यानी कि टाइम टेकिंग प्रोसेस है जैसा कि मैंने कहा। आज हमने जो भोजन किया है तीस-पैंतीस दिन बाद उससे ओज तैयार होता है। यह प्रोसेसिंग है। यह हुई गुरु और शिष्य के बीच की बात। गुरु और शिष्य के बीच बहुत टाइम टेकिंग काम है, बहुत लम्बा काम है। शिष्य बनना या गुरु होना यह भगवान जाने, मेरे वश का तो नहीं है। न तो मैं बन पाया और लगता है बन भी नहीं पाऊँगा। 

अब कहने-सुनने के लिए गुरु और शिष्य की बात दूसरी है। गुरु और शिष्य के बीच जो बात कहनी थी आपसे वह यह है कि गुरु और शिष्य के बीच समर्पण है और गुरु की पहली शर्त क्या है अपने शिष्य से, तो वह है- जानो।

अब आइए नई परंपरा की बात हो जाए जिसमें हम, आप इस समय हैं। गुरु क्या कहता है ? गुरु तो यहाँ है ही नहीं, यहाँ तो शिक्षक है और सामने कौन है ? शिक्षार्थी है, स्टुडेण्ट है, शिष्य नहीं है। यहाँ शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच क्या है, बताइए ? फ्रेण्डशिप, क्योंकि टीचर और स्टुडेण्ट के बीच केवल दस मिनट का फासला है। 

हम पढ़कर जाते हैं तब पढ़ाते हैं। बात ठीक ही कह रहे हैं फ्रेण्डशिप है ही, बिना पढे़ तो आप खडे़ नहीं हो सकते हैं। इसलिए कि वे अलग-अलग जगह से पढ़कर, कहीं और किसी गुरुजी, बडे़ गुरुजी से पढ़कर आ गए और ऐसा प्रश्न कर दिया कि परेशानी में डाल दिए। तब तो पढ़कर ही जाना पडे़गा, मजबूरी हो गई पढ़कर जाने की।

मेरे प्रिय, जो बात मैं कह रहा हूँ वह यह है कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच जो संबंध है, वह आज अविश्वास का हो गया है, है न। उसे आप पर विश्वास नहीं है, तभी तो वह दूसरे सर को पकड़ा रहता है। जानता है कि विश्वास वाले सर इतना ही जानते हैं, वे तो चार हजार तनख्वाह पाते हैं। वे क्या पढ़ाएंगे ? चालीस हजार तनख्वाह वाले से पढ़ने जाता है। सारी पढ़ाई कानपुर में होती है और कोटा में होती है। देवरिया, गोरखपुर और इलाहाबाद में कहाँ पढ़ाई होती है ? खैर यहाँ मेरा ऐसा कुछ कमेण्ट करने का कोई इरादा नहीं है। 

मुझे अपनी बात कहनी है। नई परंपरा में शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच अविश्वास है, और क्यों है, इसका भी जवाब मेरे पास है। वहाँ गुरु और शिष्य के बीच क्या बात थी ? समर्पण था। क्यों ? क्योंकि गुरु ने कहा, जानो, जान लो ! और मैं क्या कहता हूँ ? मैं क्लास में जाता हूँ, मैथमेटिक्स का टीचर हूँ, कैसे शुरू करता हूँ ? मान लो, सपोज दैट। 

अब वह क्या करेगा, बोलिए ? जब मैं कहूँगा मानो तो वह क्या मानेगा ? वह तो जान ही रहा है कि जब सर स्वयं मानकर चल रहे हैं तो फिर क्या दिक्कत है ? बस उसने भी मान लिया। वह फ्रेण्डशिप निभाएगा या क्या निभाएगा यह रास्ता चलते में पता चलेगा। बहुत तो झेल भी रहे हैं, चलिए कोई बात नहीं। लेकिन तब भी ठीक है जब काम अपना है तो फिर कोई बात नहीं। इसी की रोटी खा रहे हैं तो क्या करें ? गुरु और शिष्य, शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच जो संबंध है जान लो और मान लो का, वही समर्पण और अविश्वास का है।

शिक्षार्थी क्या करता है ? वहाँ मैंने कहा आपसे कि शिष्य क्या करता है, पचाता है और शिक्षार्थी क्या करता है, बताइए ? वोमिट करता है, उल्टी करता है। जैसा आप उसे देते हैं ठीक वैसा ही वह बाहर कर देता है। एकदम फास्ट फूड वाली बात हो गई, खाइए और उल्टी कर दीजिए। मैं तो कर ही दूँगा, मेरे वश का पचाना नहीं है। शिक्षार्थी उल्टी कर देता है, जैसे का तैसा ही बाहर कर देता है। जबकि शिष्य पचाता है और उसमें से सार तत्व निकालता है।

आइए बहुत बात हो गई, मैंने तो स्वयं को कह दिया कि मैं वह शिष्य नहीं हूँ। हम सभी कहीं-न-कहीं कितने शिष्य हैं ? यह अपना-अपना व्यक्तिगत विषय है। इसे अपने स्तर से हर कोई समझ रहा है या पकड़ रहा है। मैं यह कहूँगा कि हम सभी शिक्षार्थी हैं तो एक प्रश्न मैं करूँ ? उसके उत्तर से हम आगे बढे़ंगे।

आप बताइए जहाँ से मैं आया हूँ, वह देवरिया किसकी भूमि है ? देवरहवा बाबा से लेकर बुद्ध, बुद्ध का वहाँ परिनिर्वाण हुआ। मेरे लिए वह भूमि बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि वहीं सब कुछ है। बस चले जाइए वहाँ सब कुछ मिल जाएगा। उन्हीं की बात मैं आज आपके सामने रखना चाहता हूँ। आप मुझे बस इतना बताइए कि बुद्ध के गुरु कौन थे ? मेरे प्रश्न के जवाब में ऐसा कुछ नहीं है, मैं तो केवल आगे बढ़ने के लिए यह प्रश्न कर रहा हूँ, लेकिन इसे जानिए जरूर।

मेरा प्रश्न आपसे यह है कि बुद्ध के गुरु कौन थे ? जी, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। सही बताया आपने ‘अप्प दीपो भव’ हम अपने गुरु स्वयं हैं। बुद्ध का कोई गुरु नहीं था। कौन गुरु था बताइए ? उन्हें तो ज्ञान हुआ, उन पर तो ज्ञान की वर्षा हुई, फिर उन्हें गुरु बनाने की क्या जरूरत थी ? अब चूँकि यह एक परंपरा है। यहाँ फिर मेरा कोई काट नहीं है, या यह किसी परंपरा का विरोध नहीं है। मैं स्वयं आस्तिक व्यक्ति हूँ। इस तरह से मैं कोई काट नहीं कर रहा हूँ।

मेरा कहना आपसे मात्र इतना ही है कि जब बुद्ध का कोई गुरु नहीं रहा तो फिर हम क्यों गुरु बनाएं, गुरु पूर्णिमा मनाएं, गुरुजी से मिले, उनका पैर छुए, दक्षिणा दे, इसे क्या कहेंगे ? परंपरा या मजबूरी। मजबूरी कहना अच्छी बात नहीं है तो मजबूरी नहीं कहेंगे, परंपरा कहेंगे और इसका निर्वहन जरूरी है तो उसे पूरा करेंगे। आपको, हमें और सभी को करना चाहिए। यह सब चीजें हमारी संस्कृति से जुडी़ हैं और हमारी परंपरा से जुडी़ हैं इसलिए इन चीजों को इग्नोर करना अच्छी बात नहीं है।

मेरे प्रिय, बात आगे बढ़ाते हैं, बस जानो और जागो, यही अंदर है, बाहर कुछ भी नहीं है। यह मेरा कहना है जो हम बाहर देख रहे हैं, वह आखिर बाहर है या नहीं है। वह सब कहाँ है ? तो वह सब हमारे अंदर है। 

आइए, देखते हैं कि वह कैसे अंदर है ? आपने खिले हुए फूलों को देखा होगा। अब फूल का कॅान्सेप्ट हर कोई अपने-अपने हिसाब से लेता है, लेकिन उस फूल में मैं क्या देखता हूँ ? अब आप ही बताइए कि फूल कैसे बना है, किन चीजों से बना है ? जी, फूल किससे बना है ? जो फूल देखते हैं हम, उसे अपनी दृष्टि से देखते हैं, लेकिन वह फूल इन्हीं पाँच तत्वों से बना है। 

जिन्हें हम क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर चाहे समीरा कहते हैं। क्षिति यानी पृथ्वी से वह क्या लेता है ? पोषक तत्व लेता है। जल से शीतलता, पावक से धूप की गर्मी जरूर चाहिए। गगन से प्रकाश संश्लेषण और समीर से, हवा से स्पर्श पाते ही वह खिल जाता है। है न ऐसा ? फूल का बाहरी प्रभाव देखें, जो भी देखता है फूल का बाहरी प्रभाव ही देखता है, अच्छा लगता है, बहुत अच्छा लगता है। 

वास्तव में यह सब भीतर से ही उपजता है। फंक्शनिंग अंदर हुई न, पौधो के जड़ से हो रही है और अंदर ही अंदर आ रहा है, यह सब जो भीतर से उपजता है और भीतर से उपजना क्या है, बताइए ? यह भीतर से उपजना ही तो ज्ञान है। 

इस जगत में प्रत्येक जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, चराचर की अपनी प्रवृत्ति है। क्या प्रवृत्ति है ? हम सबकी क्या प्रवृत्ति है ? हम क्या चाहते हैं ? पूर्ण होना चाहते हैं। हर कोई क्या चाहता है ? अपने बारे में जानना चाहता है न, कि हमारा क्या होगा ? यानी कि हम पूर्ण होना चाहते हैं। फूल का पूर्ण होना क्या है ? फूल खिल गया, वह फूल हो गया। फूल खिल गया, हमें अच्छा लगा, इसलिए फूल, फूल हो गया। वह क्यों अच्छा लगा ? इसलिए नहीं कि वह फूल है, हमें बता दिया गया है फूल अच्छा होता है।

फूल का स्वभाव है खिलना और खिलने पर ही वह पूर्ण होता है। इसीलिए जब फूल खिलता है, तो हमें अच्छा लगता है, क्योंकि हम भी यही चाहते हैं न। हम भी क्या चाहते हैं ? हम भी पूर्ण होना चाहते हैं। फूल पूर्ण हुआ, हमें अच्छा लगा। 

पूर्णता क्या है ? एक तरह से कह सकते हैं कि हमारा स्वभाव है पूर्ण होना। हम यहाँ इसलिए आए हैं कि पूर्ण हों। हर कोई पूर्ण होना चाहता है। हमारी यह प्रवृत्ति है कि हम पूर्ण हो जाएं। 

अंततः इस स्थिति को हम प्राप्त कर लेते हैं। आप मानें, भले न मानें। मेरा यह सेन्टेन्स सुनेंगे तो जरूर मान लेंगे। कब ? चाहे उसके लिए हमें कितने भी जन्म लेने पडे़। अगर आपको यह लगता है कि इस जन्म में नहीं पूर्ण होंगे, तो जान लीजिए बिना पूर्ण हुए आपका कोई मीनिंग ही नहीं है। आप इसलिए हैं कि आपको पूर्ण होना है और यही ज्ञान है।

आइए, अब बात हो इस शरीर की, अब इसका थोड़ा-सा कॉन्सेप्ट हमें लेना होगा। इस विषय को गूढ़ तो नहीं कहेंगे, क्योंकि आप सभी विद्वान् हैं। अभी फूल की बात हुई, अब हम अपनी बात कर रहे हैं। अपनी मतलब शरीर की बात। यह शरीर भी इन्हीं पाँच तत्वों से बना है, जिसे अभी हमने फूल में देखा। फूल में हमने क्या देखा ? यही न कि वह पाँच तत्वों के मिलने से खिल गया। 

मेरे प्रिय, यह हमारा शरीर भी पाँच तत्वों से बना है। अब देखिए, यहाँ इस शरीर में भी फूल खिलते हैं। इसमें फूल खिले हैं, अन्तर्निहित फूल को खिलते देखें, कहाँ-कहाँ खिले हैं ? यही बात मैं आपसे करूँगा। आप तो तत्वज्ञानी हैं ही, इधर देखिए, वे सातां स्थान आपको दिखाई दे रहे हैं, जहाँ फूल खिले हैं। 

आप समझ लीजिए, इस शरीर में आधे से ऊपर जो सात प्वॉइंट हैं जहाँ फूल खिले हैं, और क्लियर हुआ आपको। हाँ देखिए, इसे हम चेस्ट कहते हैं न, अब यह जगह बहुत नामी जगह है। वजह क्या है ? सही कहा आपने, जी-जी, बहुत सही, कुण्डलिनी जागरण। है बहुत टेढ़ा काम, ऐसा हमने सुन रखा है, आपने भी सुन रखा होगा।

आइए, हम इसके संबंध में आगे की बात करते हैं। बात इस प्रकार है कि इस शरीर में, जो हमारा शरीर है, इसमें तीन तरह की नाड़ियाँ हैं, जिन्हें आप जान रहे हैं। एक को कहते हैं इड़ा, दूसरे को कहते हैं पिंगला और तीसरे को सुषुम्ना। तो इड़ा और पिंगला दोनो ऑर्डर में रहती हैं, वह पूरे टाइम आपके साथ वर्क करती रहती हैं, जब तक आप हैं।

किन्तु एक जो तीसरी नाडी़ है जिसे हम सुषुम्ना कहते हैं, वह एक्चुअली सुषुप्तावस्था में रहती है। वह सुषुप्तावस्था में रहती क्यों है ? रहने का कारण क्या है ? सुषुप्तावस्था में रहती इसलिए है कि उसमें जन्म और जन्मांतर, यह जान लीजिए यह आपसे मेरी पहली मुलाकात नहीं, हम इससे पहले भी मिल चुके हैं। बस इसका आपको ज्ञान नहीं है। ज्ञान तो मुझे भी नहीं है, लेकिन मुझे इसका एहसास है। जगह दूसरी हो सकती है, लेकिन कहीं-न- कहीं जरूर मिले हैं। यह सब चीजें कहाँ है, जानते हैं, सुषुम्ना में पड़ी हुई है।

सारी चीजें अब तक की ऑल प्रोसेसिंग, चूँकि हम सभी अभी तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हुए हैं, इसलिए हम अब तक भटक रहे हैं। हम प्रोसेस में हैं, हम ऑर्डर में हैं। जब ऑर्डर पूरा होगा तब हम पूर्ण होंगे। इसी प्रोसेस में हमारी कई बार मुलाकात हुई है। उसका गवाह कौन है ? यही सुषुम्ना नाडी़ है, जिसमें हमारे शरीर, जन्म-जन्मांतर के सारे कार्य संचित हैं। वह जागृत नहीं है, उसे जागृत करने का कार्य योगी, महात्मा, सिद्ध पुरूष करते हैं, लेकिन उनकी विधा दूसरी है।

आप जानते ही हैं उनकी विधा योग की विधा है, प्राणायाम जो सबसे ईजी है, और भी तमाम कठिन-कठिन साधनाएँ हैं जिनके द्वारा वे इसे जागृत कर लेते हैं और जागृत कर लेने के बाद के परिणाम से आप परिचित ही हैं।

मेरे प्रिय, यहाँ मैं जो बात आपसे कहने जा रहा हूँ वह मैं अपने स्तर से कहने जा रहा हूँ। मैं आपको किसी योग, साधना, तपस्या करने की बात नहीं कह रहा हूँ। मैं आपको कोई प्राणायाम करने की बात नहीं कह रहा हूँ। मैं केवल आपको एक छोटी-सी बात बताना चाहता हूँ, उसे जनाना चाहता हूँ कि ऐसा भी हो सकता है। कैसे हो सकता है ? शरीर में जो सेवन प्वॉइंट हैं उसी सेवन प्वॉइंट की बात हो रही है आपसे। 

पहला प्वॉइंट क्या है ? मूलाधार, मूलाधार चक्र है। यह मूलाधार चक्र क्यों है ? अब कोई चक्र है तो उसका कारण है, उसकी प्रोसेसिंग है। इस तरह से सात चक्र है। जिसमें पहला मूलाधार है, दूसरा स्वाधिस्ठान है। जी हाँ पहला है मूलाधार, वैसे यह तो आपको मालूम ही होगा। मैं तो ऐसे ही छोटी-सी बात लेकर चला था। पहला- मूलाधार, दूसरा- स्वाधिस्ठान, तीसरा- मणिपुर, चौथा- अनाहत है। अनाहत नाम सुना होगा आपने कि अनाहत नाद जागृत हो गया। फिर विशुद्ध है। विशुद्ध, शुद्ध से विशुद्ध, इसके बाद आज्ञा है, फिर सहस्त्रार। यह अंतिम चक्र है।

मैं तो अभी उन्हीं बिंदुओं पर चल रहा हूँ। इन्हें गौर से देखें, मूलाधार जो है उसका स्थान सबसे नीचे है। उसके बाद फिर स्वाधिस्ठान है फिर मणिपुर है, अनाहत है, यहाँ फिर अनाहत के बाद विशुद्ध है, फिर यहाँ आज्ञा है और सहस्त्रार की पोजिशन अंत में है, अर्थात् फिर से ऊपरी मार्ग में आज्ञा कण्ठ के ऊपर है, विशुद्ध हृदय में है, अनाहत नाभि के ऊपर है उसके नीचे मणिपुर, स्वाधिस्ठान और मूलाधार। अगर ऐसा है तो निश्नित रूप से इनकी कोई न कोई फ़ंक्शनिंग है। इनका कोई न कोई काम है।

मूलाधार का क्या काम है ? जिसमें हम ज्यादा फँसते हैं। इसे ऋषि कहते हैं कि यह जगह वासनामय है। यह जगह जिसे हम वासना कहते हैं, उसका केंद्र है मूलाधार, वह सबसे नीचे है। वह वहीं से जागृत होती है, जिसकी मैंने आपसे बात कही। फिर मैं आगे बढ़ता हूँ, स्वाधिस्ठान जिसका केंद्र है वहाँ से जागृत होता है स्वाद। अब तीसरा स्थान है मणिपुर। यह केंद्र है यश एवं चाह का।

क्या कॉन्सेप्ट मिला हमें इससे ? इन तीन स्थितियों की बात जो मैंने आपसे अभी की है। मैं जिस रास्ते से आपको ले चल रहा हूँ वह है आचरण। आचरण मतलब जो हम कर सकते हैं, हम आचरण करते हैं, यह हमारी प्रोसेसिंग है। मैं वहाँ तक आपको आचरण की सहायता से ले चल रहा हूँ। अलग से कुछ नहीं करना है। कोई विधा नहीं, कोई प्रोसेसिंग नहीं, कोई प्राणायाम नहीं, कोई योग नहीं, कोई साधना नहीं। उन सबसे हटकर इस समय मैं केवल आपको आचरण के माध्यम से आगे ले चल रहा हूँ।

आचरण क्या है ? अब आपको बताने की जरूरत नहीं है। हमें तो रोज ही सीखना है कि आचरण क्या है। अब हम अपना आचरण ऐसा करें कि उसमे संयम का समावेश हो जाए। संयम का समावेश हो जाए तो क्या होगा ? हम दृढ़ संकल्पित हो सकते हैं और अगर दृढ़ संकल्पित हो गए तो क्या होगा ? 

इन तीनों को हम रोक सकते हैं। बताइए क्या कठिन काम है ? हाँ, है तो बहुत कठिन काम, अगर हम सभी अपने स्तर से इस बात पर विचार करें, मैं ईमानदारी से कह रहा हूँ, इसे आप भले ही न मानें, लेकिन इस समय मान लीजिए। बाहर जाकर आप मेरी बात भले ही न मानें लेकिन इस समय मान लें। अगर हम सभी अपने आचरण में ऐसी बात लाएं, संयम और संकल्प कर लें और इन तीनों चीजों को रोक सकें तो क्या होगा जानते हैं ? हम सीधे अनाहत में पहुँच जाएंगे। चौथे चक्र में प्रवेश कर जाएंगे।

अब है तो बहुत टफ काम, लेकिन इतना भी टफ नहीं है कि कोई कर न सके। साधु-महात्मा मात्र इतने के लिए भिन्न-भिन्न विधाएँ अपनाते हैं, लेकिन उसके बाद भी यही काम करते हैं। वे सभी गौण रूप में यही काम करते हैं। उनका यह कहना है कि हम भी ऐसा करते हैं। प्राणायाम करते हैं, यह करते हैं, वह करते हैं, जो भी करते हैं लेकिन उसके साथ-साथ वह सब भी करते हैं न, जो मैं आपसे कह रहा हूँ आचरण में लाने के लिए। वे लोग बिना कहे करते हैं, जो मैं आपको करने के लिए कह रहा हूँ।

मेरा मतलब है कि यही असली बात है जबकि प्राणायाम, योग आदि तो केवल माध्यम हैं। उसकी अपनी जरूरत है, वह भी सही चीज है, होनी चाहिए, करनी चाहिए। लेकिन मूल में जो बात है उस पर आप गौर करें, इसे मैथमेटिकली देखें, तो क्या वे लोग इस काम को नहीं करते हैं ? निश्चित वे ऐसा ही करते हैं।

वे क्या करते हैं ? पहले चक्र का काम अर्थात् वासना रहित हो जाते हैं। दूसरे चक्र का काम जो स्वाद वाला है, स्वाद से उन्हें कोई मतलब नहीं होता, वे तो साधु-महात्मा ठहरे। तीसरे चक्र का काम यश, चाह से उन्हें क्या सरोकार।

अब ऐसा करें कि आप मूलाधार के काम को रोक दें, स्वाधिस्ठान के काम को रोक दें और मणिपुर के काम को रोक दें, तो अनाहत अपने आप जागृत हो जाता है। मैं आपसे एकदम सत्य कह रहा हूँ। अगर अनाहत जागृत हो गया तो अपने आप पिछले सारे चक्र निष्क्रिय हो जाएंगे। दोनों एक ही बात है न। या तो हम उन्हें निष्क्रिय कर अनाहत जागृत कर लें या अपना ऐसा  आचरण बना लें, ऐसे क्रियाकलाप करने लगें कि अनाहत जागृत हो जाए और ऐसा करने से अनाहत जागृत हो जाता है।

अब जो चौथा स्टेज है, वह बहुत टफ है। उस पर आदमी रुक ही नहीं पाता है। जो रुक लिया, वही आगे बढ़ गया। जो नहीं रुका, वह सांसारिकता में है ही और उसे कहाँ कोई दिक्कत। 

अनाहत जागृत होने के बाद क्या होता है ? आदमी सात्विक हो जाता है। आप कहते हैं कि हम बहुत सात्विक हैं। आप कितने सात्विक हैं, वह हम जानते हैं, हम बताएंगे नहीं, अगर बताएंगे तो गड़बड़ हो जाएगी और आप हमें कहेंगे पहले आप कितने सात्विक हैं ? जो हम कर रहे हैं वही आप कर रहे हैं। स्कूल पर रहते हैं तो निन्यानबे का चक्कर है, यहाँ होते हुए भी वही है। सब जगह वही चक्कर है, तो कितने सात्विक हैं, बताइए ? केवल कोशिश करते हैं सात्विक बनने की। इसलिए मैंने कहा कि न तो मेरा कहीं काट है, न कहीं किसी का विरोध है, न ही मेरा कहना है कि केवल यही एक विधा है।

मेरे प्रिय, इस दुनिया में, इस धरती पर तो भगवान ने भी जन्म लिया है और वे भी यह सब कृत्य किए हैं। हमारी-आपकी क्या बात है ? ये तमाम विधाएँ हैं और सभी विधाएँ सही हैं। हमने सहज योग कहा, ध्यान योग कहा, ज्ञान योग कहा, यह जो कीर्तन योग है जैसे कि आप गाना सुनिए, आप कुछ भी कीजिए सब में योग है और इन सभी से वहाँ तक पहुँचा जा सकता है। पहुँचने की बात मैं आपसे कर ही दूँगा बाद में, अंत में मैं आपको वहाँ पहुँचा भी दूँगा। यहाँ बहुत सारी विधाएँ हैं लेकिन मैं आपसे जो विधा बता रहा हूँ, यह मेरी व्यक्तिगत खोज है। 

अगर हम अनाहत जागृत कर लेते हैं, जैसे कि मैंने आपको बताया कि इन तीनों चक्रों पर स्थापित हो जाते हैं या उनके अंदर जो बातें हैं उसे रोक पाते हैं, तो हम सात्विक हो जाते हैं। सात्विकता की बहुत लम्बी डेफिनिशन है। यहाँ उसे दे पाना भी कठिन है। यह केवल फीलिंग की बात है कि मैं आमिष नहीं खाता हूँ, तो मैं सात्विक हूँ। मैं ऐसा नहीं बोलता हूँ, तो मैं सात्विक हूँ। मैं ऐसा नहीं करता हूँ, तो मैं सात्विक हूँ। यही सात्विक होना है न। 

इसमें कई चीजों का क्षय हो रहा है या कई तरह की चीजें क्षय होती है हमारी बॉडी से। यहाँ मैं अपने मुँह से यह सारी बातें कह रहा हूँ लेकिन आँख हैं, कान हैं, त्वचा है, हर चीज से बात बाहर निकल रही है। रोम-रोम से बाहर निकल रही है जिसे हम बॉडी लैंग्वेज भी कहते हैं। 

अब मेरा जो आभामण्डल है, वह भी तो आपको प्रभावित कर रहा है। जो औरा है वह कितना दूर तक प्रभावित कर रहा है। वह मुझसे निकल भी रहा है और आपसे मुझ तक आ भी रहा है और किस बिंदु पर मैं सात्विक हूँ, यह तय भी हो रहा है। 

अनाहत की बात हो रही थी कि जब अनाहत जागृत हो जाता है, तो आदमी सात्विक हो जाता है। यह बडे़ लम्बे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है इसलिए उलटफेर की संभावना ज्यादा ही रहती है। अब जब व्यक्ति सात्विक हो जाता है, तो कहता है, अरे ! क्या झंझट में पड़ा है, फिर लौटो। फिर वहाँ कुछ लगता है, फिर यह आना-जाना लगा रहता है। लेकिन जब यह रुक जाता है तो जानते हैं क्या होता है ? अगर आप पूर्णतः सात्विक हो जाते हैं तो आपमें समझ डेवलप हो जाती है।

अब आप कहेंगे कि हम तो ऐसे ही समझदार हैं आप क्या समझाएंगे ? लेकिन यह उस उच्च स्तर की बात है जिसकी बात यहाँ चल रही है। इससे आपमें समझ डेवलप होती है। जब समझ डेवलप होती है, तो एक स्टेप और आगे बढ़ते हैं। अब कहाँ पहुँचेंगे ? विशुद्ध में, अब अनाहत से उपर आ गए।  

अगर आप विशुद्ध में पहुँच गए तो क्या होगा ? वहाँ वैराग्य जागृत होगा। यह नहीं कि घर छोड़कर चले जाओ, यह वैराग्य नहीं है। वैराग्य एक तरह का भाव है, यानी दुनियादारी या इस तरह की चीजें मन में स्थायी नहीं रहतीं, जब वैराग्य भाव जागृत हो जाता है। यह एक दिन की प्रोसेसिंग नहीं है। यह तो जन्म-जन्मांतर की प्रोसेसिंग है।

मैं जानता हूँ, आप भी जानते हैं कि इस जन्म में नहीं कर पाऊँगा, लेकिन करना तो मुझे ही है। किसी को भी बिना किए छूटना नहीं है, किसी को नहीं छूटना है। कोई यह कहे कि मैं बच जाऊँगा तो आप लिखकर रख लीजिए बचेंगे नहीं, जो मैं कह रहा हूँ वह आपको करना है, करना है, करना है। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में। करना तो है ही। आप भाग नहीं पाएंगे और मैं रहूँगा तो भागने भी नहीं दूँगा। इसलिए मेरी मुलाकात आपसे हो गई है। आज सशरीर आपके साथ हूँ। हम भले यहाँ से चले जाएंगे, फिर मैं आपके विचारों में रहूँगा। कहीं-न-कहीं आपके साथ जरूर रहूँगा और मैं तो कम-से-कम आपको भागने नहीं दूँगा, यह सब कराकर ही रहूँगा।

मेरे प्रिय, जैसा कि मैंने कहा, इस क्रम में वैराग्य उत्पन्न होगा और जब वैराग्य का क्रम लम्बे समय तक चलता है। तब कहीं जाकर पहुँचते हैं आज्ञा चक्र में और वहाँ आत्मसाक्षात्कार होता है। यह आत्मसाक्षात्कार क्या है ? कहने को तो शब्द है। यहाँ शब्दों का संसार है। शब्द किताबों में हैं, व्यावहारिकता में हैं। शब्द का इस्तेमाल तो होगा ही होगा, उसके बिना कोई बात आगे नहीं बढ़ सकती। 

साक्षात्कार में होता क्या है, बताइए ? आत्मसाक्षात्कार शब्द तो है, जैसे कि आपने कह दिया कि उन्होंने अपने को देख लिया। अब यह कि उन्होंने अपने में क्या देखा ? आज तो मैं शिव नारायण सिंह हूँ। इसके पहले क्या था, फिर उसके पहले क्या था ? इसे जानना ही आत्मसाक्षात्कार है। कल्पना कीजिए, आज्ञा में आत्मसाक्षात्कार हुआ और उसके बाद यह आत्मसाक्षात्कार बार-बार होता है। जैसे रामकृष्ण को मूर्छा आ जाती थी। बैठे-बैठे बात करते रहते मूर्छा आ जाती थी। ऐसा आपने सुना है। किसी से बात करते रहते और मूर्छा आ जाती। माताजी की पूजा करते-करते अपनी पूजा करने लगते। प्रसाद वहाँ चढ़ाने के पहले अपने भोग लगा लिया करते, बिना चखे कैसे माता को खिलाऊँगा ? मान लो नमक ज्यादा हो, चीनी ज्यादा हो, तेल ज्यादा हो, घी ज्यादा हो। वह मेरी माँ है। क्या माँ बच्चे को बिना चखे खिलाती है ? तब वे बिना चखे कैसे माँ को खिला देंगे ? जब माँ बच्चे को खाना खिलाती है, तो चखकर खिलाती है और जब बच्चे का मौका आएगा तो क्या वह कुछ भी खिला देगा ? बिना चखे कैसे खिला देगा ? रामकृष्ण परमहंस जी को आत्मसाक्षात्कार हुआ। उन्हें उसकी बराबर पुनरावृति होती रहती थी।

अब पुनरावृति होने से जानते हैं क्या होता है ? सभी बंधन कट जाते हैं। बंधन इतना मजबूत है कि यहाँ तक आपके साथ रहता है। आत्मसाक्षात्कार के स्टेज तक रहता है। उन्हें भी पता था कि यह मेरा शिष्य है। क्या नहीं पता था ? क्या है यह ? माया है, बंधन है। नरेन्द्र क्या है उनके लिए ? बंधन ही तो था, मजबूरी ही तो थी। बंधन कटेगा तब कहाँ पहुँचेंगे ? तब पहुँचेंगे सहस्त्रार में। वहाँ क्या है ? निर्वाण है और उसे ही हम कहते है ज्ञान की सीमा। यही कुण्डली जागरण है यही ज्ञान का अंतिम स्टेज है।

मेरी आपसे जिस विधा पर बात हुई है, एक बार आप इस पर गौर करें। कहीं ऐसा नहीं कि यह किसी किताब की बात है, बस यह अपनी फीलिंग है कि ऐसे भी हम सोच सकते हैं, कर सकते हैं। अब कितना कर पाते हैं ? यह ईश्वर जाने।  

अब मेरी बातें लगभग पूरी हैं। एक-दो स्टेप्स और हैं। मैंने जो बातें आपसे की हैं, अब आपको तय करना है कि क्या शिक्षा है और क्या ज्ञान है। हाँ, यहाँ विषय है ‘क्या शिक्षा ही ज्ञान है ?’ अब मुझे नहीं पता, यह आपको तय करना है क्या शिक्षा ही ज्ञान है ? 

मैंने बात की आपसे शिक्षा पर, शिक्षा की पॅाजिटिव और निगेटिव दोनों बातें आपसे कह दी। फिर मैंने ज्ञान की बात आपसे की और ज्ञान के बारे में जो भी थोड़ा-बहुत जानता था, उसे आपके सामने रखा। अब ज्ञान का मार्ग, ज्ञान का रास्ता हर कोई खोजता है, रास्ता पकडे़ और चल दिए। क्या जरूरत है मेहनत करने की ? सड़क बनी हुई है, तो तेजी से चलकर पहुँच भी जाएंगे।

फिर भी बहुत दिक्कत है, लेकिन करें क्या ? सब कुछ बहुत तेजी से भाग रहा है तो दौड़ना तो पडे़गा ही। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ फीलिंग है और कौन कितना फील कर रहा है ? अब कैसे कहूँ, तमाम चीजें पर्सनल फीलिंग पर निर्भर हैं। शिक्षा तक तो यह है कि हम कोशिश कर सकते हैं, हम प्रयास कर सकते हैं, लेकिन ज्ञान तो बहुत व्यक्तिगत चीज हो जाती है। उसे मैं भी समझ रहा हूँ, आप भी समझ रहे हैं। तमाम चीजें इसमें व्यक्तिगत हो जाती हैं। उनका अलग से बहुत मतलब नहीं रहता।

मेरे प्रिय, हमारी इस वार्ता में तमाम ऐसे शब्द आए हैं, जिन शब्दों का जिक्र आवश्यक लगता है, जैसे- एकाग्रता। जब ध्यान की बात आती है, तो एकाग्रता, सरलता, सरसता, सहजता, प्रकृतिस्थ होना, महसूसना, स्वानुभव, अनंत चिंतन, मर्म को समझना, जानना, सततता, प्रवेश करना, संवेदना, गहरी समझ, चेतना जागृत होना में से किसी एक शब्द को भी आप पकड़ लें, उसकी साधना कर लें तो मुझे लगता है कि यह ज्ञान का मार्ग है। कोई एक शब्द आप पकड़ लें। ध्यान आप करते हैं, ध्यान, गौर करना, देखना, जुड़ना, सहज होना, यहाँ तक कि बोर होना यह भी ध्यान है। लेकिन ध्यान का जो रूपांतरण है वह बहुत गड़बड़ है। मैं गड़बड़ कह रहा हूँ, आप कह भी सकते हैं कि ऐसा नहीं है, तो जो ध्यान हम समझ रहे हैं, मेरा मानना नहीं है कि वही ध्यान है।

ध्यान क्या है ? ध्यान का मतलब किसी कोने में या किसी कमरे में आँख बंद कर बैठना, यह ध्यान है ? अब चूँकि सीखने-सिखाने के क्रम में चीजें जो भी हैं सिखा दी जाती हैं और हम उसे पकड़ लेते हैं। ध्यान से देखिए तो पूरे समय, पूरा रूटिन जो है हमारा ध्यान ही ध्यान है। कैसे है ? जागते हुए, या कहें हम जागते तो रहते ही हैं, सजग होकर अपनी गतिविधियों में, जो गतिविधि हमारी है, मैं बोल रहा हूँ, आप सुन रहे हैं, इन्हीं कार्यों में जो हम कर रहे हैं, उसे ही देखना। किसे देखना ? जो हम कर रहे हैं, जो हमारे साथ चल रहा है, उसका अवलोकन करना। जो हम कर रहे हैं उसका अवलोकन, यही तो ध्यान है।

हम सोच रहे हैं, अब हम देख पाए कि हम सोच रहे हैं। हम आपसे बोल रहे हैं, हम देख पाए कि हम बोल रहे हैं। हम चल रहे हैं, हम देख पाए कि हम चल रहे हैं या हम कुछ भी कर रहे हैं, हम देख पाते हैं तो यही ध्यान है। या यूँ कहिए कि अवधान ही ध्यान है, सृजन ही ध्यान है। क्यों ? क्योंकि सृजन ही ध्यान का उत्तम स्रोत है। सृजन नहीं है तो संसार नहीं है, हम और आप नहीं हैं।

एक बात और, यह तो परंपरा की बात है, यहाँ यह भी कहा गया है कि श्रद्धा का बहुत महत्व है। आपके मन में किसी के प्रति श्रद्धा है, कैसी भी है ? आपको मान्य है, सर्वमान्य है। श्रद्धा का बहुत महत्व है। श्रद्धा का महत्व है, तो मैं भी अपनी यह बात श्रद्धा से ही पूरी करूँगा।

श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्

श्रद्धा से समझ, समझ से मन का प्रादुर्भाव होता है। जब मन जागृत होता है, तो वह प्रज्ञावान हो जाता है और जब प्रज्ञा जागृत होती है, तो हम ज्ञानवान हो जाते हैं। 

आप मेरी बात समझ रहे हैं। श्रद्धा से समझ और समझ से मन, मन से प्रज्ञा और प्रज्ञा से ज्ञान। अर्थात् श्रद्धा को कार्यरूप में परिणत करना। जैसे हमारी किसी तथ्य के प्रति श्रद्धा है, तो उस श्रद्धा को पकड़ लें और उसे कार्यरूप में परिणत कर दें, तो निश्नित ही ज्ञान तक पहुँच जाएंगे। 

ऐसा है न ? एकदम ऐसा है। अब जैसे रैदास जी को ले लीजिए, चाहे कबीरदास जी को ले लीजिए। पढ़ा-लिखा कोई क्या करेगा ! कहीं शिक्षा की बात ही नहीं आई। पढ़ाई-लिखाई तो आप जान ही रहे हैं क्या चीज है। उनमें ये बातें कहाँ से उपजी ? जब किसी बिंदु पर श्रद्धा उपजी, उसी श्रद्धा से मन का प्रादुर्भाव हुआ, मन से प्रज्ञा जागृत हुई और उसने उन्हें ज्ञानवान बना दिया।

श्रद्धा को कार्यरूप में परिणत करना, यह बहुत टेढ़ा काम नहीं है। मैं समझता हूँ, बस किसी बिंदु पर श्रद्धा जागृत हुई, आपने उस चीज को समझा, आपने उस चीज को अपने साथ जोड़ लिया, आप उसके साथ लग गए, तो आप ज्ञानी हो गए। ज्ञानी तो होना ही होना है, बचकर कोई जाने वाला नहीं है। यह पहले से तय है, किसी को छूट नहीं मिलनी है। अज्ञानी रहकर मुक्ति हो जाए, यह मुक्ति नहीं है, यह तो शरीर की मुक्ति है। जब भी मुक्त होंगे, शरीर से मुक्त होंगे। जो वास्तविक मुक्ति होनी है, वह तभी होगी, जब ज्ञानी हो जाएंगे।

मेरे प्रिय, ज्ञान की एक और विधा मैं आपको बता रहा हूँ। यह मेरी आपसे आज की अंतिम बात है। सृजन ही ज्ञान है। अब सृजन क्या है ? यह बताने की जरूरत नहीं है। छोटा बच्चा जो प्राइमरी में जाता है उसे ‘क’ बनाना सिखाया जाता है। सिखाया जाता है ‘क’बनाना छोटी क्लास में, बहुत छोटी क्लास में, क्या यह सृजन नहीं है ? खूब सृजन है।

उस बच्चे के लिए तो यह एक सृजन है। उसने कुछ किया, क्या किया उसने ? ‘क’ बना लिया, यही सृजन है। बच्चे पहले जागरुक होते हैं और बाद में ‘क’देखकर ‘ख’बना लेते हैं। यह क्या है ? सृजन। सृजन ज्ञान है। उसने सृजन किया, ‘क’बनाया, उसे ज्ञान हो गया ‘क’बनाने का। जान लिया ‘क’का कोई मतलब भले ही न जानता हो, लेकिन वह आज तो जान ही गया न, कि उसने ‘क’बनाया पहली बार, पहले दिन। यही सृजन ज्ञान है।

आप सृजनशील बनें, मेरी बात मानें आप सृजनशील बनें। मैं पूछता हूँ आपसे, आपने कभी कोई सृजन का काम किया है ? पहली बार तो मैंने भी ‘क’बनाया था, मैंने भी सृजन किया था।

आप निरंतर सृजन करते आ रहे हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसने सृजन न किया हो। नित्य प्रति आप सृजन करते हैं, कुछ न कुछ करते हैं। कभी दो लाइन लिखते हैं, कोई भी ऐसा काम करते हैं, किसी नए शब्द का प्रयोग करते हैं, आपकी सारी-की-सारी एक्टिविटी सृजन है, केवल उसे फीलिंग से जोड़ने की जरूरत है। आपकी पूरी दिनचर्या सृजन है, आप केवल उसे फीलिंग से जोड़ दीजिए। जैसे भी, जो भी करते हैं, जिसमें कुछ नयापन हो अर्थात् हर जगह सृजन है। बस उसे अपनी फीलिंग से जोड़ दीजिए।

गुरुजी ने क्या कहा था ? मानो, लेकिन मैं नहीं कह रहा हूँ कि मान लीजिए, कभी मत मानिएगा, बस जान लीजिए कि आपने सृजन किया है सुबह से शाम तक। कब जानेंगे ? जब सोने जाएंगे, तब की बात करने जा रहा हूँ और कह रहा हूँ कि जब दिनचर्या पूरी हो जाती है, तब सोने जाते हैं। उस क्षण एक बार पूरी तरह अपनी दिनचर्या पर गौर कर लें और इस बात को तय कर लें कि मैंने यह काम किया है, ऐसे-ऐसे किया है और मुझसे यह-यह सृजन हुआ है।

यह नई बात है। जो है, जैसे भी है, हर कोई सृजन करता है, आपकी कोई एक्टिविटी ऐसी नहीं है जिसमें आप सृजन न करते हों। अगर आप सृजन करते हैं तो सत्य है, आपको ज्ञान है और आप ज्ञानी हैं। क्योंकि ज्ञान शीर्ष है और शिक्षा ज्ञान का अंकुरण है। 

मेरे प्रिय, जागो ! अपने अंदर की अनंत शक्ति को जागृत कर इस संसार को और सुंदर बनाने में अपना योगदान कर सको, यही इस जीवन की सार्थकता है। इसी भावना के साथ आप सभी मेरा प्रणाम स्वीकार करें एवं मेरा साथ दें। 

शिवोऽहम्

मैं कल्याणकारी हूँ।

धन्यवाद।

 

28.07.2008                                                                                                                                                                                                                                                          पूर्वाह्न 11.00

आमंत्रण- डॉ.शरदिन्दु 

निदेशक

राज्य शैक्षिक प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीमेट)  

 इलाहाबाद (उ.प्र.)


मेरे प्रिय जागो - Feb, 05 2026