बोधकथा

फर्क

प्रिय विद्यार्थियों, एक बार की बात है, एक आदमी समुद्र के किनारे टहल रहा था। वह देखता है, समुद्र की लहारों के साथ छोटी-छोटी मछलियाँ किनारे आ जा रही हैं और जब समुद्र का पानी लौट रहा है तो मछलियाँ लौट नहीं पा रहीं, वहीं बालू पर रह जा रही हैं।

धूप तेज है, वे तड़फड़ाती हैं और लगता है कि जैसे अब वे बचेंगी नहीं।

वह आदमी एक कदम आगे बढ़ाता है। एक मछली को उठाता है और उसे फेंकता है पानी में। फिर आगे बढ़ता है, दूसरी मछली को उठाता है और उसे भी पानी में फेंकता है। इसी तरह का क्रम लगा रखा है उसने। 

एक दूसरा आदमी जो कुछ दूरी पर खड़ा होकर यह सब देख रहा है, कुछ समझ नहीं पाता। वह पास आता है और उससे पूछता है- तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम्हारे ऐसा करने से क्या फर्क पड़ने वाला है ? इतना बड़ा समुद्र है, जाने कितनी लम्बाई है इसके तट की, हजारों-हजार मछलियाँ इसी तरह लहारों के साथ आती है, किनारे पर रह जाती हैं और धूप में मर जाती हैं। तुम्हारे इन दो-चार मछलियों को उठाकर फेंक देने से क्या फर्क पड़ने वाला है ?

फेंकने वाला कहता है- बात सही है। लेकिन जिस मछली को मैं फेंक रहा हूँ उसे तो फर्क पड़ता है, उसके जीवन की रक्षा तो हो रही है।

प्रिय विद्यार्थियों, यह फर्क पड़ने वाली बात है, आप जरा महसूस कीजिए। कोई काम आपके जिम्मे है और आप उसे जिम्मेदारी से नहीं करते हैं तो ऐसा थोड़े ही है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर यही सभी लोग सोच लें तो क्या स्थिति होगी ? 

आप सोचते हैं- परीक्षा है, चलिए बहुत होगा तो क्या होगा, प्रथम श्रेणी नहीं आयेंगे, द्वितीय श्रेणी में आयेंगे या बहुत होगा तो क्या होगा, द्वितीय श्रेणी नहीं तो तृतीय श्रेणी में आयेंगे। 

‘बहुत होगा तो क्या होगा’से क्या फर्क पड़ता है ? आज आपको दिखाई नहीं पड़ रहा है लेकिन जब आप जीवन-क्षेत्र में उतरेंगे तो एक-एक नम्बर बहुत फर्क लाएगा। प्रतियोगी परीक्षाओं में एक-एक नम्बर के बीच हजारों-हजार विद्यार्थी रहते हैं। एक नम्बर बढ़ जाएगा तो आप हजारों-हजार से ऊपर चले जायेंगे और एक नम्बर कम हो जाएगा तो हजारों-हजार आपसे ऊपर हो सकते हैं। 

तो फर्क तो बहुत पड़ता है। एक नम्बर से आप हजारों-हजार से पीछे हो सकते हैं, एक ही नम्बर से हजारों-हजार से आगे हो सकते हैं। उस एक नम्बर का फर्क समझिए कितना है। आज की थोड़ी-सी मेहनत कल आपको हजारों-हजार से आगे पहुँचा देगी। फर्क तो पड़ता है। 

गौर करें, आपको ट्रेन पकड़नी है। आप जानते हैं ट्रेन रोज लेट आती है। आप घर से निकलते हैं, निकलने में ही लेट हो जाते हैं, सोचते हैं, तेज चल लूँगा, समय पर पहुँच जाऊँगा, ट्रेन तो लेट आएगी-ही-आएगी। रिक्शा लेते हैं, आगे बढ़ते हैं और जाम में फँस जाते हैं। देर होना स्वाभाविक है। आप बेचैन हैं, परेशान हैं, कितना भी पैर पटकते हैं, लेकिन कर क्या सकते हैं ? कुछ नहीं। 

अब जब आप स्टेशन पहुँचते हैं, आज ट्रेन समय से आ गयी है। दौड़कर ट्रेन पकड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन सब बेकार, ट्रेन छूट जाती है। आपका जाना आवश्यक है, बहुत आवश्यक है, अति आवश्यक है। कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। 

आप अपना सिर पकड़ लेते हैं और वहीं बैठ जाते हैं। अब सोचते हैं फर्क तो पड़ता है। क्योंकि आपको फर्क पड़ा है, आप इस फर्क को समझ पा रहे हैं। तो फर्क पड़ता है, निश्चित ही फर्क पड़ता है-

जाके पाँव न फटे बिवाई 

वह क्या जाने पीर पराई। 

प्रिय विद्यार्थियों, कहना ही होगा, जो सीधे प्रभावित होता है वह इस दर्द को, कष्ट को, प्रभाव को समझ पाता है। जो प्रभावित नहीं है वह तो कुछ भी कहकर निकल सकता है। एक बूँद पानी, एक छोटा-सा हवा का झोंका, एक छोटा-सा बादल का टुकड़ा, हरियाली का छोटा-सा हिस्सा, एक छोटी-सी चिंगारी, एक छोटा-सा घास का टुकड़ा जिसे आप तृण कहते हैं जिससे चिड़िया अपना घोंसला तैयार कर लेती है, ये चीजें भले आपको छोटी लगती हों पर ये चीजें फर्क डालती हैं।

का वर्षा जब कृषि सुखानी

तो फर्क तो पड़ता है। इस फर्क को सोचकर, इस फर्क को समझकर अगर आप ऐसी कोशिश करें कि अपने समक्ष आया एक अवसर भी न चूके तो निश्चित रूप से कल आप शीर्ष पर होंगे, आप अपने उद्देश्य पर होंगे, निश्चित ही आपको आपका लक्ष्य मिलेगा।

आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।                                   धन्यवाद।


खंड दो - Mar, 09 2026