बोधकथा

आत्मावलोकन

प्रिय विद्यार्थियों, एक सर्वश्रेष्ठ कलाकार ने अपनी पूरी योग्यता, दक्षता और जितनी भी काबिलियत उसमें थी, सभी को संजोकर एक कलाकृति बनाई। उसे लगा- यह मेरी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है, इससे अच्छी कलाकृति तो 

मैं बना ही नहीं सकता।

अपनी उस सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को एक दिन सुबह-सुबह नगर के मुख्य चौराहे पर लगे खम्भे पर टाँग देता है और उसके नीचे लिख देता है- इसमें किसी को जहाँ कहीं कोई कमी दिखाई देती हो, चिह्नित करने का कष्ट करें।

सुबह-सुबह का वाकया है यह। शाम को जब वह जाता है अपनी कलाकृति को उतारने के लिए, तो देखता है कि उस कलाकृति में थोड़ी भी जगह शेष नहीं बची है, कोई ऐसा बिंदु शेष नहीं है जहाँ चिह्न न लगाया गया हो।

आप समझ रहे हैं न ? कलाकार ने अपनी कलाकृति को वहाँ इसलिए लगाया था कि उसमें जो भी कोई कमी रह गयी हो जानकार लोगों या वहाँ से गुजरने वाले लोगों की नजरों में तो उस कमी को चिह्नित कर दें और शाम को वह देखता है कि उसकी कलाकृति में एक भी बिंदु ऐसा नहीं रह गया है, जहाँ चिह्न न लगाया गया हो।

वह अपनी कलाकृति को उतार लाता है। उसके मन में पता नहीं क्या बात आती है, दूसरे दिन वह अपनी एक और कलाकृति, जिसे वह उतना श्रेष्ठ नहीं समझता है, जिसमें उसे लगता है कि वाकई कहीं कोई कमी रह गयी है, दूसरी सुबह उसे भी वहीं टाँग आता है।

लेकिन पहली कलाकृति के नीचे जो नोट लिखा था, उसे बदलकर वह इस बार लिखता है- इसमें जहाँ कहीं भी कोई कमी समझ में आती हो, कृपया उसका सुधार कर दें। यह जो दूसरी कलाकृति टाँगता है इसके नीचे लिखता है कि इसमें जो भी कमी आपको समझ में आ रही हो, कृपया सुधार कर दें।

शाम को पहुँचता है, उस कलाकृति को उतारने के लिए। आप इमेजिन कर सकते हैं, क्या स्थिति रही होगी। पहली बार जो स्थिति थी उसका इमेजिनेशन आपको नहीं था, क्योंकि वह उसकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति थी, उसमें किसी सुधार की गुंजाइश नहीं थी, लेकिन फिर भी उसने सोचा- चलो, तमाम विद्वान् और कबिल लोग हैं, उनके बीच जाएगी तो जरूर...।

परिणाम आपने देखा ही। लेकिन इस बार क्या हुआ, बता सकते हैं आप ? इस बार जब उसने नीचे लिख रखा था कि इसमें जो भी कमी हो, कृपया सुधारने का कष्ट करें, क्या किसी ने उस पर ब्रश, पेन चलाया ? एकदम नहीं, किसी ने नहीं चलाया।

कैसी विचित्र स्थिति है ! कलाकार जब चाहता है कि जो कमी हो, उसे इंगित करें, तो इतनी कमियाँ इंगित की गयीं कि उसका चित्र भर गया और जब कलाकार की अपेक्षा है कि उसमें सुधार कर दिया जाए तो सुधार करने के लिए कोई नहीं खड़ा होता है। कैसी विचित्र विडम्बना है यह ! लेकिन है तो, ऐसा ही होता है, हो रहा है और मुझे तो लगता है कि होता ही रहेगा। यह मैं भले कह रहा हूँ लेकिन मेरा ऐसा कहना ठीक नहीं है। ऐसा क्यों होता रहेगा और ऐसा हो रहा है तो क्यों हो रहा है ? आइए, इस पर विचार करें।

प्रिय विद्यार्थियों, अब एक चीज जो मेरी समझ में आ रही है, वह यह है कि हम आत्मावलोकन नहीं कर रहे हैं। हम अपने अन्दर नहीं झाँक रहे हैं। हम हमेशा से यह देखते आ रहे हैं कि कौन क्या कर रहा है, वह बदमाशी कर रहा है, वह बदमाश तो नहीं है। हम यह नहीं देखते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। उस कलाकार की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति में लोगों को कमी नजर आ रही है, ‘क्या करना है, निशान लगाओ और निकल चलो’और जब कहा गया कि सुधार करो तो किसी के पेन का ढक्कन ही नहीं खुला।

तो ऐसा ही होता है, जब कुछ करने की बात आती है तो आप बगले झाँकने लगते हैं और जब कमेंट पास करने की बात आती है तो सबसे आगे, यह बताने के लिए कि आपने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया, कोई मौका चूकते नहीं है। कमी को सुधारने की बात आती है तो किसी का पता ही नहीं चलता, जैसे- चौराहा खाली हो गया हो। ऐसा नहीं था कि उस दिन वहाँ कोई पहुँचा ही नहीं या उस दिन रास्ता जाम हो गया या उधर से जाने की मनाही हो गयी। जाने की मनाही नहीं हुई, किसी ने हिम्मत ही नहीं की, कोई यह सोच ही नहीं पाया, किसी में इतनी काबिलियत ही नहीं रही कि कोई सुधार कर दे, उसे ठीक कर दे। लेकिन कमी बताने वाले लोगों की संख्या बताने की जरूरत नहीं है।

मैं कोई नयी बात नहीं कह रहा हूँ। हमारा दृष्टिकोण इसी तरह का हो गया है, हमारी सोच में यह बात भर गयी है कि हम अपने बारे में नहीं सोचते हैं, हम अपने अन्दर नहीं झाँकते हैं, केवल दूसरों के बारे में ही सोचते रहते हैं, इधर-उधर झाँकते रहते हैं और कमेंट पास करते हैं। आपने पढ़ा भी है-

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपनो, मुझसा बुरा न कोय।।

हम दूसरों में बुराई देखते हैं, अपने अन्दर नहीं झाँकते कि हमारे अन्दर क्या है। अपने अन्दर झाँकना बहुत जरूरी है और जिस दिन आप अपने अन्दर झाँकने लगेंगे, बाहर सब ठीक हो जाएगा, बाहर कोई गड़बड़ी रह ही नहीं जाएगी। ऐसा जादू कैसे होगा, बता सकते हैं ? हम, आप, यहाँ जितने भी लोग हैं, यही न दुनिया है हमारी और अगर इतना ही ठीक हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा। 

प्रिय विद्यार्थियों, मैं केवल अपने लिए तो कह नहीं रहा हूँ अन्दर झाँकने को, हम सब अगर अपने अन्दर झाँकना शुरू कर दें, अपनी कमियों को सॉल्व करना शुरू कर दें, अपनी बुराइयों को दूर कर लें तो निश्चित रूप से बाहर जहाँ भी देखेंगे, वहाँ अच्छाई-ही-अच्छाई दिखाई देगी, बुराई रह ही नहीं जाएगी। यह आज की जरूरत है, यह बात चाहे जब कही गयी हो, आज इसकी जितनी आवश्यकता है, मुझे लगता है कि जब कही गयी होगी तब इतनी आवश्यकता नहीं रही होगी। आज यह बात बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है, क्योंकि इस दिशा में किसी का ध्यान नहीं है। हर कोई दूसरे की ओर ही देख रहा है, हर कोई दूसरे के बारे में ही सोच रहा है। 

अपने बारे में सोचिए, अपने अन्दर की कमियों को निकालने की कोशिश कीजिए। अगर आप ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित रूप से आपसे ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्ति कोई है ही नहीं, आप सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बनेंगे, आप इस समाज को दिशा देंगे। आप आत्मावलोकन करें और जो भी कमी आपको समझ में आए उसे दूर करें और जो सही हो उसी का आचरण करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो निश्चित ही आपको वह लक्ष्य मिलेगा, जिसके लिए आपका यहाँ आना हुआ है। 

आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।                                   धन्यवाद।


खंड तीन - Mar, 09 2026