प्रिय विद्यार्थियों, शहर के एक बड़े व्यवसायी जो मेरे करीबी भी हैं, अपने व्यवसाय सम्बन्धी एक यात्रा का जिक्र कर रहे थे। उन्हें बार-बार कलकत्ता जाना होता है, जहाँ से उनके व्यवसाय का सामान आता है। तो जिस यात्रा का वे जिक्र कर रहे थे उस दिन उन्हें यहाँ से कलकत्ता जाना था। स्टेशन पर ट्रेन में वे चढ़ने को हुए तभी किसी कारण से उन्हें अपना बैग खोलना पड़ा।
आप जानते हैं, व्यवसायी हैं तो पैसे ले जाना होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि कैश भी ले जाना होता है। अभी आप बच्चे हैं, जानते नहीं हैं। बैंक ड्राफ्ट भी लोग ले जाते हैं, कैश भी ले जाते हैं। दो तरह का बिजनेस होता है, एक नम्बर और दो नम्बर कहा जाता है।
तो कुछ कैश उन्हें लेकर जाना था। कैश बैग में लिए हुए थे, हो सकता है स्टेशन पर चोर-उचक्के, ये सब, इनकी तो बड़ी लम्बी टीम होती है, उनमें से किसी ने देख लिया हो, इनके पास रुपये हैं; ये बेचारे तो चक्कर में पड़ गये। करते भी क्या, यात्रा तो पूरी करनी-ही-करनी थी।
ट्रेन में चढ़ते हैं, सोचते हैं कि शायद उचक्के यहीं रुक जायें, लेकिन जब वे अपनी बर्थ पर अपना सामान रखते हैं और ज्यों ही बिस्तर लगा कर लेटते हैं, तब तक क्या देखते हैं कि सामने वाली बर्थ पर जो अभी तक खाली थी उन्हीं में से एक आदमी आता है और अपना बिस्तर लगा लेता है। कुछ समझ में नहीं आता है इन्हें कि यह चोर-उचक्का और यह बर्थ कैसे उसके लिए रिजर्व ! अब होगी कोई सेटिंग-वेटिंग यह सब रेलवे की बात है। आप जानते हैं, उचक्कों की बड़ी लम्बी सेटिंग होती है।
अब वे परेशान हो जाते हैं। चोर ने देख लिया है कि उनके बैग में रुपये हैं। करते भी क्या ? अब चाहे जो किया हो उन्होंने। जब भी वे कहीं इधर-उधर जाते किसी आव’यकता से तो वह जो बगल वाली बर्थ पर चोर था, बार-बार उनका बैग खोलता, उसमें चेक करता कि रुपया कहाँ है। रुपया तो देखा ही था उसने। इन्हें भी अंदाजा था कि जैसे ही मैं हटूँगा वह रुपये निकालने की कोशिश करेगा। जब भी वे हटते पूरा बैग खँगालता, इधर-उधर खोजता, लेकिन रुपया मिला नहीं उसे। रात भर ऐसा कई बार हुआ। सवेरे जब उतरना होता है तो चोर परेशान, ट्रेन चलते समय तो रुपये बैग में देखे थे उसने और यह आदमी इतने रुपये पॉकेट में भी नहीं रख सकता। ऐसी स्थिति तो थी नहीं। आखिर वह समझ नहीं पा रहा था कि इतने रुपये जब मैंने बैग में देखे, वही बैग है और रुपये मिल नहीं रहे हैं तो गये कहाँ ?
जब सवेरे उतरने को हुआ स्टेशन पर तो उन्होंने पूछा- क्यों भाई साहब, बड़े परेशान लग रहे हो ? रात भर तुम्हें नींद भी नहीं आयी।
चोर ने कहा- आप कैसे जानते हैं कि रात भर मुझे नींद नहीं आयी और मैं परेशान लग रहा हूँ ?
उन्होंने कहा- परेशान ही नहीं लग रहे हो, तुम्हारे दिमाग में कोई प्रश्न बहुत तेजी से गूँज रहा है।
उसने कहा- अरे ! आप तो बड़े ज्योतिषी हैं, कैसे जान लिए कि मेरे दिमाग में प्रश्न बहुत तेजी से गूँज रहा है ?
फिर वह हार-पाछकर कहता है- हाँ, मैं परेशान भी हूँ और मेरे दिमाग में एक प्रश्न बहुत तेजी से गूँज रहा है।
वे कहते हैं- कहो तो मैं बताऊँ तुम्हें, कौन-सा प्रश्न है ?
उसने कहा- इतना आप जानते हैं ?
तब वे कहते हैं- हाँ जानता हूँ। तुम इसीलिए परेशान हो कि जो रुपये तुमने स्टेशन पर मेरे बैग में देखे थे, वे रुपये कहाँ हैं ? बहुत खोजने के बाद भी तुम नहीं पाये।
अब उससे नहीं रहा गया, उसने कहा- एकदम सही, यकीनन यही प्रश्न मेरे दिमाग में है और मैं बहुत परेशान चल रहा हूँ। मुझे जवाब देना पड़ेगा। मेरी टीम है, और भी सदस्य मेरे साथ-साथ चल रहे हैं। मुझे जवाब देना होगा कि आखिर वे रुपये हैं कहाँ ? इसका मलतब मैंने स्वयं रख लिया। आखिर वे लोग तो समझेंगे कि मैंने चुरा लिया, लेकिन रुपये आपके बैग में है नहीं। मेरी सबसे बड़ी समस्या यही है कि मैं अपनी टीम को क्या जवाब दूँगा ? मुझे तो डिप्यूट किया गया था रुपये चुराने के लिए।
उन्होंने कहा- हाँ, यह बात तो सही है कि रुपये मेरे बैग में नहीं थे और तुम खोजे और खोजते रहे, पाये भी नहीं।
तो चोर पूछता है- अच्छा ! मैं रुपये तो पाया नहीं। मुझे देना होगा, मैं दूँगा। लेकिन अब तो आप यह बता दें, ये रुपये आपने रखे कहाँ थे ?
उन्होंने कहा- बता दूँ ?
उसने कहा- हाँ।
तो इन्होंने बताया- मैंने ये रुपये तुम्हारे बिस्तर के नीचे रख दिये थे। मुझे लगा कि तुम मानोगे नहीं और अपने बैग से रुपये निकाल कर जो बिस्तर लगाया था तुमने, अपने झोले का जो तकिया बनाया था तुमने, उसी के नीचे मैंने रख दिये। सारी रात तुम उसी पर सिर रखे रहे, बेचैन रहे।
प्रिय विद्यार्थियों, चोर बेचारा कहाँ खोजता रहा ? किसके बैग में ? जिसके बैग में उसने रुपये देखे थे और रुपया कहाँ था ? उसी के बैग के नीचे, उसी के बिस्तर के सिरहाने। उस चोर ने बहुत कोशिश की लेकिन उसे रुपये नहीं मिले, कारण ! रुपये तलाशने की जगह। वह रुपये वहाँ तलाश रहा था जहाँ उसे लग रहा था कि रुपये रखे हुए हैं।
ऐसा आपको भी लगता है, क्या लगता है ? कहते हैं न कि दूसरे की थाली में घी ज्यादा नजर आता है। अपनी थाली में चाहे घी-ही-घी हो, किसी को नजर नहीं आता। अपना मूल्यांकन आप नहीं कर पाते हैं। दूसरे का मूल्यांकन आप जरूर करते हैं। अरे ! वह तो बड़ा तेज है पढ़ने में, आप अपने को तेज नहीं मानते हैं। कहते हैं, हम फिसड्डी हैं। जैसे आपको कुछ
आता ही नहीं है। ऐसा नहीं है, सभी
का मस्तिष्क लेवल एक ही होता है लगभग। अब कौन कितना उसे इम्प्रूव करता है, यह महत्वपूर्ण है।
अगर दिमाग में यह बात है कि अरे ! मैं तो वीक हूँ, मेरे दिमाग में तो कुछ आता ही नहीं है; तो कैसे कुछ आएगा ? आप मान लेते हैं, अगला ही विद्वान् बैठा हुआ है, सब जानता है। क्लास में दो चार लड़के हैं जिन्हें आप लोग मान लेते हैं। वे तो बहुत विद्वान् हैं, बहुत तेज हैं। उनसे कौन अधिक नम्बर पा सकता है, हमारी कहाँ उनमें होड़ है ?
ऐसा नहीं है। मैंने फिर कहा आपसे कि सबका आई.क्यू. लेवल लगभग बराबर होता है। ईश्वर कभी किसी के साथ पार्शिआलिटी नहीं करता। जो भी पार्शिआलिटी है, आप स्वयं अपने साथ करते हैं। ईश्वर ने जब सबको बनाया, तो एक जैसा बनाया, एक तरह से सभी को बनाया। सभी को एक ही ब्रेन लेवल दिया। यह आपका डिफरेन्शिएशन है, आपका बँटवारा है, आपका मापांक है, आप ऐसा सोचते हैं कि आप कमजोर हैं और वह तेज है। तो न कोई कमजोर है न तो कोई तेज है।
वही बात, जो चोर है वह बैग में तलाश रहा था, जहाँ उसने देखा था, लेकिन पैसा उसके पास ही था, जो खोज इनके पास रहा था। वही काम आप भी करते हैं। बुद्धि आपके पास है, सब कुछ आपके पास है, पर आप
इधर-उधर भटकते हैं, उसे तलाशने के लिए। अभी जितना आपके पास है न, यदि उसका केवल ट्वेन्टी परसेंट भी आप यूज करें तो आप कुछ भी कर सकते हैं। एट्टी परसेंट को रेस्ट रहने दीजिए, अगले जन्म में उसका यूज करिएगा।
प्रिय विद्यार्थियों, आपको वि’वास नहीं होता मेरी बातों का कि वह सब कुछ आपके अन्दर भरा पड़ा है जिसे आप बाहर खोजते हैं। क्यों आप बाहर खोजते हैं ? इसलिए न कि आपको पता नहीं है कि अन्दर भरा पड़ा है, लेकिन कौन आपको दिखाएगा कि सब कुछ आपके अन्दर ही भरा पड़ा है-
कस्तूरी कुण्डलि बसे, मृग ढूँढ़े वन माहि
ठीक यही स्थिति आपकी भी है। अब मेरे वश का तो नहीं, क्योंकि यह कार्य तो केवल एक ही आदमी ने किया था, भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। उन्होंने अर्जुन को दिखा दिया कि अर्जुन सारी सृष्टि मेरे मुँह के अन्दर है। देखा ही होगा आप लोगों ने, जरूर कहीं देखा होगा, सीरियल में देखा होगा, नहीं तो कहीं फोटो में देखा होगा।
जब अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण शिक्षा दे रहे थे, अर्जुन को बातें नहीं समझ में आ रही थीं। उन्होंने अपना मुँह खोला और उसमें दिखाया ही सारी सृष्टि देखो, मेरे मुँह के अन्दर है, एकदम सत्य है और मेरा यही मानना है कि केवल भगवान श्रीकृष्ण के मुँह के अन्दर ही नहीं थी वह सारी सृष्टि, हमारे-आपके, सभी के अन्दर है। मुहँ खोलिएगा मत ! क्योंकि हमें दिखाई नहीं देगा और हम खोलेंगे तो आपको दिखाई नहीं देगा, इसलिए कि आप देखना नहीं चाहते हैं। नहीं तो, है सारा कुछ आपके अन्दर ही, बस देखने के लिए वह दृष्टि चाहिए। वह दृष्टि कहाँ से उत्पन्न होगी ? आपके अपने अन्दर से उत्पन्न होगी, आपके अपने विचार से उत्पन्न होगी, आपकी सोच से उत्पन्न होगी, आपके करने से उत्पन्न होगी। कैसे करेंगे ? यह आपको नित्य प्रति बताया जाता है, उसे आप आचरण में उतारें, सीखें तो निश्चित रूप से आप वहाँ तक पहुँच जायेंगे, जहाँ आपको पहुँचना है।
प्रिय विद्यार्थियों, मैं फिर आपसे कहता हूँ, जितनी आपके अन्दर ऊर्जा है, जितनी आपकी बुद्धि है, जितनी शक्ति है, जो कुछ भी आपको ईश्वर ने दिया है, उसका मिनिमम भी आप उपयोग करते हैं, तो आप वहाँ तक पहुँच सकते हैं, जहाँ आपका लक्ष्य है, लेकिन आप ऐसा करते नहीं हैं। आप तो केवल एक साधारण जिन्दगी जीते हैं। आप पढ़ते हैं, आप खाते हैं, खेलते हैं, लेकिन आप वह नहीं करते हैं। इस साधारण रुटीन से थोड़ा ऊपर उठकर इस बारे में सोचे कि ईश्वर ने आपको इतना विशिष्ट क्यों बनाया है ? इतना सब कुछ क्यों दिया है आपको ? जवाब स्पष्ट है, वह आपसे कुछ अतिरिक्त उम्मीद करता है।
इस दिशा में सोचें और ऐसा कुछ कर गुजरें जो इस सृष्टि के लिए आव’यक समझ में आता हो, आव’यक हो, क्योंकि सब कुछ आपके अन्दर ही निहित है। ऐसा ही उस चोर के साथ हुआ। आपने देखा ही, वह चोर इधर- उधर खोजता रहा और वह चीज एकदम उसके पास थी, लेकिन वह उसे पा नहीं सका। तो अब वक्त नहीं रह गया है, समय के साथ लगिए, आगे बढ़िए और प्रयास कीजिए। सब कुछ आपके अन्दर ही छिपा हुआ है, उसे आप बाहर निकालें, उसका लाभ समाज को पहुँचायें, मानव मात्र को पहुँचायें, यही आपके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। प्रयास करें, निश्चित ही सफलता मिलनी है।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों। धन्यवाद।