बोधकथा

यत्न देवो भव

प्रिय विद्यार्थियों, बात दक्षिण अफ्रीका की है। कुछ सत्याग्रहियों को जो आन्दोलन करना बन्द नहीं कर रहे थे, बार-बार मना करने पर भी नहीं मान रहे थे, जेल में बन्द कर दिया गया। 

जेल में बन्द होने पर वहाँ की व्यवस्था के अनुरूप कार्य करना होता है। आपको शायद नहीं मालूम होगा कि जेल में खाने-पीने के बदले काम करना जरूरी है, या फिर पैसा जमा करना होता है। बहुत नामिनल पैसा होता है, टोकन मनी होती है। अगर आप जमा कर दें तो आपको काम नहीं करना होगा, अन्यथा काम करना होगा। 

सत्याग्रहियों के पास पैसा कहाँ था कि जमा करते ? इसलिए सभी को काम करना ही था और जब सामूहिक काम करना है, तो जी चुरानेवालों की संख्या बताने की जरूरत नहीं है, वह भी आप सभी को। लेकिन एक व्यक्ति उनमें ऐसा था जो दिन-रात काम में लगा रहता। अगर काम नहीं होता तो कैदियों को पढ़ाने लगता। उसके बाद कुछ समय मिलता तो स्वयं पढ़ने लगता, कभी फूल-पौधों की देखभाल करने लगता, कभी सफाई का काम करने लगता। यानी की एक मिनट भी वह चैन से नहीं बैठता। इस बात को सभी कैदी जान रहे थे। 

एक दिन गवर्नर का मुआयना हुआ। गवर्नर आया कैदियों से मिलने, उनका हाल-चाल लेने के लिए।

गवर्नर उस कैदी से पूछता है- बताओ तुम्हें जेल में कोई कष्ट तो नहीं है ?

तो उस व्यक्ति ने क्या कहा मालूम है आपको ? 

उस व्यक्ति ने कहा- मुझे और तो कोई कष्ट नहीं है, लेकिन इतना कष्ट जरूर है कि यहाँ मेरे लिए कोई काम ही नहीं है। यहाँ समय नहीं बीतता है, इधर-उधर काम करना पड़ता है। कोई ऐसा काम मुझे दिया जाय जिसमें मैं व्यस्त रहूँ।

गवर्नर हतप्रभ, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसके साथ अब तक ऐसी घटना कभी नहीं घटी थी। चाहे कहीं भी गया हो, चाहे जेल में, चाहे अन्य जगह, अभी तक किसी ने ऐसा नहीं कहा कि मेरे लिए काम नहीं है, मुझे काम चाहिए। जेल में तो सब लोग ऐसे ही टाइमपास करते हैं, मटरग’ती करते हैं, कुछ करना नहीं चाहते।

गवर्नर ने पूछा- ऐसी क्या बात है जो तुम काम करना चाहते हो और लोग तो काम करना ही नहीं चाहते ? सभी तो लापरवाही करते हैं।

उस व्यक्ति ने कहा- मैं इसलिए काम करना चाहता हूँ कि मेरी जीवनीशक्ति नष्ट न हो जाय। 

आप समझते हैं, जीवनीशक्ति क्या है ? यह जीजिविषा है, यह किसके तहत कार्य करती हैं ? यह जीवनीशक्ति के तहत कार्य करती है। जब आपमें जीवनीशक्ति होगी तभी आप कार्य कर सकेंगे और उसी कार्य के उत्पाद हैं आप स्वयं।  

आप देखते ही हैं, जैसे आपके शरीर का ही कोई अंग हो, कोई पार्ट हो, अगर आप उससे काम न लें तो क्या होगा ? वह धीरे-धीरे काम करना बन्द कर देगा। आप सुनना छोड़ दें, देखें आप बहरे हो जाएंगे। आप देखना बन्द कर दें, या और भी आपके ऐसे आर्गन्स हैं जिनका आप यूज न करे, तो क्या होगा ? आप ज्वाइन्ट्स को ही लें, अगर आप हाथ को हिलाएं न, तो धीरे-धीरे वह इतना कड़ा हो जाएगा कि आप उससे काम नहीं ले पाएंगे। इसलिए बिना काम किए कुछ नहीं होना है। 

उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे करने के लिए कार्य चाहिए। वह व्यक्ति कौन था आपको पता है ? जी, गांधीजी थे। अफ्रीका के जेल में गांधीजी को बन्द कर दिया गया था, दक्षिण अफ्रीका की बात है। वह व्यक्ति और कोई नहीं गांधीजी जिन्हें कर्म का पुजारी, कर्मयोगी कह सकते हैं। यहाँ कर्म और योग, परन्तु योग, योग तो बहुत प्रचलित शब्द हो गया है। योग से योगा बन गया है। 

मैं इस पर कमेन्ट नहीं करने जा रहा हूँ, लेकिन योग का जो सबसे मूल कॉन्सेप्ट है वह कर्म का ही योग है। अगर आप कर्म करते हैं तो कोई भी चीज आपको प्राप्त करने के लिए शेष नहीं रह जाती है, आप जो भी प्राप्त करना चाहते हैं प्राप्त कर सकते हैं। प्राप्ति का रास्ता आपको बताया ही गया है।

कहा भी गया है, ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव।‘ इतना जानते हैं न ? ठीक, अच्छा एक और देवो भव, वह भी आपको बता देता हूँ। ‘यत्न देवो भव।‘ यत्न समझते हैं ? प्रयत्न करना, प्रयास  करना, कोशिश करना, लगे रहना और यही है कर्मयोग। 

बस इसी का परिणाम था कि गांधी, गांधीजी हो गये। इसके पहले मैं बता दूँ आपको कि इकतालिस वर्ष की अवस्था तक गांधीजी को कोई नहीं जानता था, या आप यूँ कह सकते हैं कि जितने लोग आपको जानते हैं उससे अधिक लोग इकतालिस वर्ष की अवस्था तक गांधीजी को नहीं जानते थे और अब दुनिया उन्हें जान गई, कब ? जब उन्होंने कर्मयोग को साध लिया, यत्न देव की शरण मे चले गये। जब वे अपने मिशन में लग गये, प्रयास करने लगे, जूझने लगे, उन्हें पूरी दुनिया जान गई। 

प्रिय विद्यार्थियों, आपके सामने भी अवसर है। आपको भी लगना चाहिए, आपको भी कर्म का पुजारी होना चाहिए। जिस दिन आप कर्मयोग को साध लेंगे, जिस दिन आप लग जाएंगे, जब आप लगे रह जाएंगे, एक तरह से कहा जाय कि जो भी आपका उद्देश्य है, जो भी आपके सामने लक्ष्य है, जो भी आप कर रहें हैं उसमे पूरी तन्मयता से लग जाएंगे, जूझने  लगेंगे तो निश्चित रूप से आपको भी दुनिया जानेगी और आप अपने लक्ष्य पर होंगे। 

कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। मैंने पहले भी आपको बताया है, आज फिर बता रहा हूँ, जो भी काम इस समय आपके पास है पूरे लगन से, पूरी निष्ठा से, पूरे मनोयोग से आप उसमें भिड़ जाते हैं, तो निश्चित रूप से आपको आपका लक्ष्य मिलना ही है। 

गांधीजी की सफलता का यही रहस्य था कि वे कर्मयोगी हो गये। आप भी कर्मयोगी बनिए, आप भी उस ऊँचाई तक पहुँच जाएंगे जहाँ तक आप पहुँचना चाहते हैं और ऐसा ही होता है। जो भी कर्मयोगी हो जाता है, जो भी एकनिष्ठ हो जाता है अपने उद्देश्य के प्रति, निश्चित रूप से उसे लक्ष्य मिलता ही है। आप इस दिशा में सोचेंगे, विचारेंगे और लगेंगे।

आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।

 धन्यवाद।


खंड पाँच - Mar, 09 2026