बोधकथा

तन्द्रा

प्रिय विद्यार्थियों, कुछ दिन पहले मेरा इलाहाबाद जाना हुआ। आप पहले से ही जान रहे हैं, यह मेरा भ्रम हो सकता है कि आप नहीं जानते। जानकारियाँ तो आपको रहती ही हैं। इलाहाबाद में राज्य शिक्षा एवं प्रशिक्षण तथा प्रबन्धन संस्थान जिसे सी-मैट कहा जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा संचालित शिक्षा में शोध एंव गुणवत्ता संवर्धन के लिए दो संस्थान हैं, जिसमें से एक सी-मैट इलाहाबाद में है और दूसरा एन.सी.ई.आर.टी. लखनऊ में है। 

सी-मैट के एक कार्यक्रम में मेरा भी व्याख्यान था। इसी सिलसिले में मुझे वहाँ पहुँचना था। अब वहाँ पहुँचने के लिए तो साधन की जरूरत पड़ेगी न, क्या साधन हो सकता है ? हाँ ट्रेन, सब पता रहता है आप लोगों को। अब ट्रेन पकड़नी है तो रेलवे स्टेशन जाना ही होगा। यह घटना देवरिया रेलवे स्टेशन की ही है। जब ट्रेन पकड़ने के लिए मैं रेलवे स्टेशन पहुँचा, तो ट्रेन थोड़ी लेट थी और जब ट्रेन लेट होती है, तो बहुत विचित्र घटनायें घटित होती हैं। क्योंकि समय से पहुँचनेवालों की तो कोई बात ही नहीं है और लेट पहुँचनेवालों की बात ही अलग है। 

सुबह-सुबह का वाकया है, जिस ट्रेन से मुझे जाना था वह ट्रेन थी दादर एक्सपे्रस, जो देवरिया से सुबह साढ़े छः बजे छूटती है। उस दिन ट्रेन लेट आयी। जैसे ही ट्रेन देवरिया रेलवे स्टेशन पर रुकी, प्लेटफार्म पर खड़े यात्रियों की भीड़ डिब्बों में चढ़ने लगती है। मैं भी डिब्बे में चढ़कर अपने बर्थ पर आकर बैठता हूँ और खिड़की से बाहर देखने लगता हूँ। 

जैसे ही ट्रेन खुलने को होती है, एक आदमी दिखाई पड़ता है। वैसे तो प्लेटफार्म पर ढ़ेर सारे आदमी होते हैं। लेकिन जो आदमी दिखाई पड़ा है, उसके साथ कुछ अलग बात है। वह सिर पर भी सामान रखा हुआ है, पीठ पर भी सामान लाद रखा है, कंधे पर भी सामान है, कुछ इधर लटका रखा है, कुछ उधर लटका रखा है, मैंने बताया ही कि उसके पास ढ़ेर सारा सामान है। ट्रेन खुल चुकी है और वह ट्रेन के साथ-साथ दौड़ रहा है। इससे क्या पता चलता है ? यही न कि वह चढ़ने ही आया है और ट्रेन में चढ़ना चाहता है।

वह सामान लादे हुए ट्रेन के साथ-साथ दौड़ रहा था। अब डिब्बे के अन्दर के लोग भी यही समझ रहे थे जो मैं समझ रहा था कि उसे ट्रेन में चढ़ना ही चढ़ना है। जब कोई अपना साथी बनने जा रहा हो तो उसके साथ प्रेम झलकता ही झलकता है। डिब्बे के अन्दर बैठे लोगों ने कहा, बढ़ते चलो, और तेज चलो, थोड़ा और तेज चलो, शाबास बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, बस चढ़ गये, चढ़ गये और यह आवाज सुनकर क्या हुआ ? उसे जो्य आ गया और वह पूरी शक्ति से दौड़कर ट्रेन में चढ़ गया। 

ऐसा होता है, बहुत सामान्य सी बात है। जिस दिन की घटना का जिक्र मैं कर रहा हूँ, एकदम ऐसा ही हुआ। वह ट्रेन के साथ-साथ दौड़ रहा था, लोगों को लगा कि वह भी चढ़ने वाला है, वे बोले थोड़ा और दौड़ो, थोड़ा और दौड़ो, शाबास, बहुत अच्छा, चढ़ गये, चढ़ गये और वह चढ़ गया। अब जब वह ट्रेन में चढ़ गया, तो उसके बाद आप जानते हैं क्या हुआ ? वह आदमी उदास हो गया। अब जब ट्रेन में चढ़ गये तब उदास होने जैसी क्या बात है ? 

लोगों ने कहा कि तुम तो बड़े बहादुर हो, चलती ट्रेन में चढ़ गये, इतना सामान लेकर चढ़ गये, लेकिन चढ़ने के बाद उदास क्यों हो गये ? अरे, अब तो तुम्हें अपना लक्ष्य मिल गया। अब तुम्हें जहाँ जाना है, वहाँ पहुँच ही जाओगे, फिर उदास क्यों हो गये ? तब वह कहता है कि यही तो मेरी समस्या है। लोगों ने कहा, अरे, अब कौन सी समस्या है ? तुम ट्रेन पकड़ने आये थे, तुम लेट थे, तुम्हारे लिए ट्रेन लेट हुई और ट्रेन तुम्हें मिल गई, अब क्या समस्या है ? 

उस आदमी की परेशानी का कारण क्या है, क्या आप बता सकते हैं ? अरे, बडे़ विद्वान हैं आप लोग। 

वह कहता है- समस्या बहुत बड़ी है, मैं उदास ही नहीं हूँ, अन्दर ही अन्दर परेशानी भी हूँ, क्योंकि कारण कुछ और ही है। अरे, मैं तो किसी को चढ़ाने आया था। जिसे चढ़ाने आया था, वह तो नीचे ही रहा गया और मैं चढ़ गया। अब आप स्वयं सोच लीजिए, सोचने की बात है ही। इससे ज्यादा क्या कहूँ, कहना भी कठिन है उस बेचारे की स्थिति, लेकिन मैंने आपसे कह दिया। वह कहता है, मैं जिसे चढ़ाने आया था, वह तो नीचे ही रह गया और मैं चढ़ गया।  

लोगों ने कहा कि तब तुम चढ़े क्यों ? अब चढ़ गये तो तुम भोगो। वह कहता है– आप ही लोगों ने तो कहा कि चढ़ो और मैं चढ़ गया, आप ही लोगों ने कहा कि थोड़ा और तेज दौड़ो और चढ़ जाओ, तो मैं चढ़ गया। 

प्रिय विद्यार्थियों, यदि जो्य बढ़ाने से चढ़ गये तो फिर क्या होगा ? देखा आपने, पछताना पड़ेगा न, लोगों ने जो्य बढ़ाया और वह चढ़ गया। अब चढ़ गया तो पछताना पड़ेगा ही, पछताना क्यों पड़ेगा ? इसलिए कि पता नहीं कहाँ चढ़ जायें। अब चढ़ने के बाद की स्थिति क्या होगी ? बहुत कठिन है, क्योंकि चढ़ गये तो जरूरी नहीं कि पहुँच ही जाओगे, अगर चढ़ गये तो जरूरी नहीं कि वहाँ ठहर ही पाओगे। चढ़ना आसान है, लेकिन पहुँचना कठिन है। चढ़ना आसान है, लेकिन वहाँ रुकना कठिन है। जो कठिन है, वह कर पाओगे। जो आसान था, वह कठिन लग रहा था, तभी तो लेट हुआ। 

लोगों ने कहा कि चढ़ जाओ, चढ़ जाओ और वह चढ़ गया। चढ़ने के बाद की स्थिति बहुत मुश्किल है, चढ़ने के बाद वह क्या करेगा, आखिर कहाँ पहुँचेगा और पहुँचेगा तो वहाँ करेगा क्या ? 

जरा गौर करें अपने जीवन पर, जीवन एक अवसर है, जिसने इसे ठीक से समझा और इस पर सवार हो गया, वह मंजिल तक पहुँच गया। जो दूसरों के कहने पर या दूसरों के चढ़ाने पर चढ़ता है, उसका यही हाल होता है। आया था चढ़ाने और स्वयं चढ़ गया। आगे उसका क्या हाल हुआ होगा यह तो भगवान ही जाने। 

वह कहाँ पहुँचेगा ? मुम्बई पहुँच जाएगा न, फिर लौट कर आएगा देवरिया। वह बम्बई जाने वाली ट्रेन थी जो इलाहाबाद होकर जाती है। दादर एक्सप्रेस इलाहाबाद होकर बम्बई जाती हैं। यह सब जीवन में घटनेवाली घटनायें हैं। इन घटनाओं में बहुत कुछ है, बस आपको व्यापक दृष्टि से देखने की जरूरत है। 

जीवन को जरा ध्यान से देखें, क्या यहाँ सब कुछ यंत्रवत नहीं है ? क्या इसकी गति यांत्रिक नहीं प्रतीत होती है ? क्या हम बाह्य कारकों पर निर्भर नहीं है ? क्या हम परिस्थितियों से संचालित नहीं होते हैं ? क्या अपनी जीवनचर्या हम स्वयं निर्धारित करते हैं या यह पहले से नियत होती है ? इन सभी का जवाब आप जानते ही हैं। 

जब तक आप अपने ही अन्तःकरण से संचालित नहीं होंगे, केवल लकीर पीटते रहेंगे और दूसरे के बताए रास्ते पर चलते रहेंगे, तो आप कहाँ पहुँचेंगे यह पहले से तय है, यह सभी को पता है, सभी जानते हैं। लेकिन पहुँचना कहाँ है ? यह आप जानते हैं, जान ही रहे हैं, जान ही जाएंगे। जानना जरूरी है, महत्वपूर्ण है, आवश्यक है, बिना जाने कोई मतलब नहीं इस यात्रा का । 

लेकिन कैसे ? जब आपकी तन्द्रा टूटेगी, क्योंकि अभी आप हो्य में नहीं हैं। जैसे वह आया था चढ़ाने और स्वयं चढ़ गया। अगर वह हो्य में होता तो स्वयं चढ़ता क्या ? कत्तई नहीं। जब आपकी तन्द्रा टूटेगी, जब आप जागेंगे, जब आप अपने अन्दर झाकेंगे, तो पाएंगे कि आपमें वह सब शक्तियाँ भरी पड़ी हैं और इसी इन्तजार में हैं कि कब आप द्वार खोल रहे हैं। 

वे सारी शक्तियाँ आपका वेट कर रही हैं कि कब आप द्वार खोल रहे हैं, कब आप मार्ग बना रहे हैं, कब आप रास्ता निकाल रहे हैं, कब आप उन्हें बाहर निकलने का मौका दे रहे हैं। इसके लिए कुछ और नहीं करना है, ऐसा नहीं कि इसके लिए कुछ अलग से तैयारी करनी है, बस जागरूक होने की जरूरत है, चैतन्य होने की आवश्यकता है। 

केवल उन्हें देखने, गौर करने और महसूस करने की बात है। जैसे ही आपको एहसास होने लगेगा, अनुभव और अनुभूति होने लगेगी, समझो वे शक्तियाँ कार्य प्रारम्भ कर चुकी हैं। आपका जीवन बदल जाएगा, आप यांत्रिक नहीं रह जाएंगे, क्योंकि आप यंत्र हैं ही नहीं, आप तो यंत्र बने हुए हैं, आप बनावटी यंत्र हैं। 

अब आप जग गये हैं, जो जगा वही जीव है, नहीं तो यंत्र है। जैसे की आप, किसी ने कहा और बस शुरू हो गये। यदि किसी के कहने से शुरू होंगे, तो बड़ी कठिनाई में पड़ेंगे। देखा आपने उस व्यक्ति को, वह कठिनाई में पड़ गया, मुसीबत में पड़ गया, परे्यानी में पड़ गया। आखिर अब करे तो क्या करे, चढ़ तो गया है। ऐसे चढ़ने से कोई फायदा नहीं है, ऐसे चढ़ने का कोई मतलब नहीं है, पूरे होशो-हवाश में चढ़ना ही अर्थ रखता है, उसमें ही मतलब है, उसमें ही लक्ष्य है। ऐसा न करो कि किसी के चढ़ाने से चढ़ जाओ और बाद में पछताना पड़े, पछताते रहो।

जीवन का मतलब बासी नहीं होता, बासी का अर्थ समझ ही रहे हैं आप, खूब खाते हैं बासी। जीवन का मतलब बासी नहीं होता या यू कहूँ सेकेण्ड हैंण्ड नहीं होता। तमाम चीजें सेकेण्ड हैंण्ड भी यूज में आती हैं। किताब खरीदने जाते हैं और कहते हैं कि सेकेण्ड हैण्ड किताब दे दीजिए। सेकेण्ड हैण्ड किताब से पढ़ने का क्या मतलब ? जीवन सेकेण्ड हैण्ड नहीं है, बासी नहीं है, वह एकदम ताजा है। 

जीवन सदैव ताजा है, सदैव फर्स्ट हैण्ड है, खिलते फूलों की तरह, बहते हवा के झोंको की तरह, सुबह-सुबह उगते सूर्य की लालिमा की तरह, बहते हुए पानी की तरह, वर्षा की फुहार की तरह या यूँ कहूँ की प्रकाश की तरह, अग्नि की तरह, इन्द्रधनुष की तरह, चाँदनी की तरह। आप इसे जैसा समझें। 

जीवन एकदम ताजा है, तरोताजा है, लेकिन आप जीवन सो कर जी रहे हैं, जागकर नहीं। इसीलिए वह बासी प्रतीत होता है, इसीलिए वह बासी लगता है, इसीलिए आप उसे सेकेण्ड हैंण्ड समझ बैठते हैं। मुझे लगता है आप सदैव आँखें बन्द कर जैसे नींद में हों, ऐसा ही जीवन जीने के आदी हो गये हैं। क्योंकि हजारों-हजार सच्चाईयाँ आपके आँखों के सामने से गुजर जाती हैं, आप जान नहीं पाते हैं, समझ नहीं पाते हैं, महसूस नहीं कर पाते हैं। 

आँखे बन्द कर लेने से सच्चाई नहीं बदलती है। सच्चाईयों का समाधान जानना होगा, जागरूक होना होगा, भागने से कुछ नहीं होना है। भागते रहेंगे, भागते रहेंगे, कहाँ पहुँचेंगे पता नही ? पहुँच भी पायेंगे या नहीं, सन्देह की स्थिति है और जागेंगे तो लक्ष्य पायेंगे। आप जागें, जागरूक हों, चैतन्य हों, समझें, करें, बस यही एक रास्ता है जो जीवन को लक्ष्य तक पहुँचाता है। नहीं तो बासी जीवन जीने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जीवन सदैव ताजा है, सदैव फस्र्ट हैण्ड है। 

मैं यह नहीं कहता कि जीवन बहुत सपाट है, जिन्दगी बहुत सपाट है, बहुत सामान्य है, बहुत साधारण है और बहुत सरल है। नो रिस्क नो गेन, सदैव ही यहाँ  सत्य है। किन्तु आँखें बन्द करके नहीं, आँखें खोलकर, पूरे होशो-हवाश में जीने की जरूरत है। नहीं तो जैसे वह आया था चढ़ाने और स्वयं चढ़ गया वैसी ही स्थिति आपके साथ हो जाएगी। आप इससे बचे और तभी बच सकते हैं जब आप पूरे होश-हवाश में हों। 

आपकी तन्द्रा टूट चुकी है, आप जाग चुके है। आपको कहाँ जाना है, कैसे जाना है और कहाँ पहुँचना है यह भी आप जान जायें। जब तक जानेंगे नहीं तब तक पहुँचेंगे नहीं। यह स्थिति तभी आती है जब आप सोये-सोये जीते हैं। वह व्यक्ति सोये-सोये जी रहा होगा, तभी तो चढ़ाने आया था और स्वयं ही चढ़ गया। आपमें भी कुछ लोग ऐसे ही हैं, ऐसा नहीं है की स्टेशन की ही बात है और वहीं खत्म हो जाती है। आपमें भी तमाम लोग ऐसे ही हैं जो चलते हैं स्कूल और पहुँचते हैं कहाँ ? यह उन्हें और आपको भली-भाँति पता है।

जब मैं आपकी उम्र का था, उस समय ऐसा बहुत कम होता था। जो स्कूल के लिए चलते थे, वे निश्चित ही स्कूल पहुँचते थे। लेकिन आज समय और परिस्थितियाँ बदल गयी हैं। आप चलते हैं स्कूल और पहुँचते हैं कहाँ, यह भली प्रकार आप जानते हैं। आपसे ज्यादा मुझे कहाँ ज्ञान ? इस पर मैं कमेंट भी नहीं कर रहा हूँ। इस पर कमेंट आपको ही करना है। आज नहीं तो कल, जब आप जागेंगे निश्चित उस पर कमेंट देंगे। क्योंकि आप इससे गुजर रहे हैं, आप इसे जान रहे हैं, आप इसे समझ रहे हैं, मैं तो केवल आपको जगा रहा हूँ। 

मेरा केवल इतना ही काम है कि मैं आपको जगा दूँ, लेकिन आप इस इंतजार में बैठे रहें कि मैं आपके घर आऊँगा और दरवाजा खटखटाऊँगा तो यह सम्भव नहीं है। यह मेरे बूते की बात नहीं है, यह मेरे वश में नहीं है। मैं ऐसा कर भी नहीं सकता क्योंकि यह मेरे लिए सम्भव नहीं है। जिसे जागना है, जिसे बनना है, जिसे पाना है, जिसे होना है, बस इसी प्रॉसेस में होना है। 

अलग से कोई प्रोसेसिंग नहीं होनी है, अलग से कोई रास्ता नहीं है, अलग से कोई विधि नहीं है, अलग से कोई मेथड नहीं है, अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। जिसे होना है बस इसी में होना है, जिसे पाना है बस इसी में पाना है, जिसे जानना है बस इसी में जानना है, जिसे जागना है बस इसी में जागना है। जो जागा वही जाना।

इसे आप भली-भाँति समझ लें, मैं सदैव यही कहता हूँ, आपसे यही कहता आया हूँ और मुझे लगता है कि मुझे यही कहते रहना है कि आप जागें, जो भी कर रहे हैं उसमें जागें, जागते हुए करें। अगर आप अपने करने से जाग गये तो फिर जगाने की जरूरत भी नहीं है। जो अपने करने से जाग गया, वह क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है, कितना कर रहा है, कब कर रहा है, कहाँ कर रहा है, क्या कर रहा है, बस इतना ही जानना जागना है। जो इसे जान गया उसे फिर जगाने की जरूरत नहीं है, वह तो जागृत है। इसका एहसास अब मुझे होने लगा है। 

प्रिय विद्यार्थियों, मुझे यह बात महसूस होने लगी है, मैं कभी-कभी देखता हूँ, मुझे लगता है कि आप जागने के करीब हैं, आप जाग रहे हैं, आप जाग गये हैं। इसका मुझे भी एहसास होता है। मुझे लगता है कि आप अपने लक्ष्य के करीब हैं। ऐसा नहीं है कि लक्ष्य के करीब पहुँचनेवाला लक्ष्य तक नहीं पहुँचता है। 

जो लक्ष्य के करीब होता है वही लक्ष्य तक पहुँचता है। आज मैं साफ-साफ देख रहा हूँ कि वह दिन अब दूर नहीं है, वह समय बहुत करीब है, जब आप जाग जायेंगे, जब आप जागृत हो जायेंगे लेकिन किसी अलग विधा से नहीं, किसी अलग प्रॉसेस से नहीं। बस, इसी प्रॉसेस में, जो आप करने जा रहे हैं, जो आप कर रहे हैं, जो आप करते आ रहे हैं।

आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहेंगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।

 धन्यवाद।


खंड छः - Mar, 09 2026