प्रिय विद्यार्थियों, आज की कथा वार्ता आपके ही जैसे किसी विद्यार्थी की है, लेकिन है थोड़ी भिन्न। आज परिस्थितियाँ बदली हुई हैं, आजकल अधिकतम विद्यार्थी ऐसे विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जहाँ उन्हें मोटी फीस चुकानी पड़ती है और सारी जरूरत-आवश्यकताओं की पूर्ति उनके अभिभावकों द्वारा की जाती है।
किन्तु जिस विद्यार्थी की मैं बात कर रहा हूँ, वह गुरुकुल का विद्यार्थी है। गुरुकुल में वह शिक्षा प्राप्त कर रहा है, विद्या अध्ययन कर रहा है। गुरुकुल की अलग परम्परा है, रही है। वहाँ न तो किसी तरह की फीस देनी होती और न ही किसी तरह का बोझ अभिभावकों के सिर होता। आचार्य शिक्षा देते और विद्यार्थी भिक्षाटन द्वारा गुरुकुल मेंे रहने वाले सभी लोगों के भोजन की व्यवस्था करते। वैसे ही आज इस विद्यार्थी के जिम्मे भोजन व्यवस्था में लकड़ियों की व्यवस्था करनी है। लकड़ियाँ लाने के लिए उसे जंगल जाना है।
जैसे ही विद्या अध्ययन का कालखण्ड समाप्त होता है, विद्यार्थी जंगल जाता है। जब वह लकड़ियाँ लाएगा तभी भोजन बनना है, तब तक सभी को यूँ ही भोजन का इंतजार करना है। वह जंगल में लकड़ियाँ चुन रहा है, जहाँ वह लकड़ियाँ चुन रहा है, वहीं उसे एक लोमड़ी दिखाई देती है, लेकिन वह लोमड़ी सामान्य लोमड़ी की तरह नहीं है। वह अपाहिज है, वह चल-फिर नहीं पा रही है, बस एक ही जगह बैठी हुई है।
उस लोमड़ी को देखकर विद्यार्थी विस्मृत है, आश्चर्यचकित है ? उसका कारण क्या है ? लोमड़ी पूर्ण स्वस्थ है, हट्ठी-कट्ठी है, कहीं से भी ऐसा
नहीं लग रहा है कि यह अपाहिज हैं। उसके भोजन की व्यवस्था कैसे होती होगी ? कैसे उसका गुजारा चलता होगा ? वह देखने में पूर्ण स्वस्थ है, कहीं से भी उसके अपाहिज होने का प्रभाव उसके शरीर पर दिखाई नहीं दे रहा।
अभी वह ऐसे ही कुछ सोचते हुए लकड़ियाँ चुन रहा है। किन्तु विद्यार्थी के दिमाग में बार-बार यही बात आती है कि ऐसी क्या बात है कि अपाहिज है, न चल सकती है, न फिर सकती है, फिर यह कैसे इतनी स्वस्थ है ? इतनी हृष्ट-पुष्ट है। वह लकड़ियाँ चुने जा रहा है और ऐसा ही सोचता जा रहा है। तभी वह देखता क्या है कि वहीं सामने से एक शेर अपने मुँह में शिकार दबाए हुए इसी तरफ बढ़ा आ रहा है।
अब जैसे ही यह शेर को देखता है, उसकी हालत खराब हो जाती है। हालत तो किसी की भी खराब हो जाती, आप होते तो आपकी भी हो जाती, जी सर ! हम होते तो हमारी भी हो जाती, बात शेर की है। अब वह करेगा क्या ? जंगल में शेर आया और आप इन्तजार करेंगे ? विद्यार्थी क्या करेगा ? नहीं मालूम !
इतने दिन से कहानी सुन रहे हो फिर भी कहानी को आगे बढ़ाने नहीं आ रहा है। क्या करेगा शेर ? बोलो। खा जाएगा। हाँ, इधर हैं कुछ विद्वान्, जो सही बता रहे हैं। क्या करेगा विद्यार्थी, जैसे ही विद्यार्थी शेर को आते हुए देखता है, वहीं एक विशाल वृक्ष है और वह खट-खट, खट-खट उस वृक्ष पर, काफी ऊँचाई तक चढ़ जाता है।
क्यों ? क्योंकि शेर को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता। छलांग लगा सकता है, लेकिन वह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। विद्यार्थी खट-खट, खट-खट उस पेड़ पर चढ़ जाता है और वहीं से देखता है शेर को। शेर अपना शिकार लिए हुए आता है, उसी वृक्ष के नीचे आसन लगाता है। फिर जैसे आप सभी इण्टरवल में पालथी मारते हैं और टिफिन खोलते हैं। नहीं करते ऐसा ? वैस ही आसन लगाता है और शुरू हो जाता है उसके बाद वह अपने शिकार का कुछ हिस्सा छोड़ देता है, फिर वहाँ से चला जाता है। किसलिए छोड़ता है, दूसरे दिन आकर फिर खाएगा। क्यों बासी नहीं खाता है क्या शेर ? बासी खाने का जिम्मा आपका ही है, चार दिन का बासी रहेगार्, फ्रिज में रखे रहेंगे और फिर उसे चटनी जैसे चाटते रहेंगे, फिर रख देंगे; फिर चाटते रहेंगे, फिर चाटेंगे, फिर चाटेंगे, फिर रख देंगे और आजकल तो प्लास्टिक पैक आ रहा है, उसे तो महीनों चाटते रहिए। खोलिए, चाटिए, बन्द करिए, फिर रख दीजिए; फिर खोलिए-चाटिए, फिर फ्रिज में रख दीजिए।
शेर चाटने वाला काम नहीं करता क्योंकि वह शेर है, आपके जैसे थोड़े ही है। शेर क्या करता है ? किसी भी शिकार को एक बार जितना ग्रहण करना है, किया, फिर उसे छोड़ देता है, शेर बासी नहीं खाता। इसलिए यह बात तय हुई कि शेर लौटेगा नहीं और छोड़ा है तो किसके लिए छोड़ा है ? लोमड़ी के लिए छोड़ा है। अब लोमड़ी के लिए छोड़ता है और शेर बढ़ जाता है, फिर लोमड़ी क्या करती है ? अब थोड़ा तो घसीटना पड़ेगा ही पड़ेगा। लोमड़ी वहाँ तक पहुँचती है फिर आप जानते ही हैं आगे की बात, उसने भी अपना काम किया।
अब वह विद्यार्थी उतरता है पेड़ पर से। शेर जा चुका है, जरूरत भर की लकड़ियाँ चुनता है और गुरुकुल आता है। निश्चित रूप से भोजन बना होगा और वह भी भोजन ग्रहण किया होगा, लेकिन आज पूरी रात उसे चैन नहीं है, बहुत बेचैन है।
बार-बार उसके दिमाग में एक ही बात गूँज रही है कि लोमड़ी भी शेर का शिकार है। है कि नहीं ? लोमड़ी भी शेर का शिकार है और क्या अजीब बात है कि शेर इस लोमड़ी का शिकार नहीं कर रहा है। जबकि लोमड़ी अपाहिज भी है। अरे ! एक पंजा मारे और पकड़ ले, भाग नहीं सकती। न ही दौड़ना पड़ेगा, न ही छलांग लगाना पड़ेगा, और शेर तो यहाँ उल्टा ही कर रहा है, लोमड़ी उसकी शिकार है और वह उसके लिए भोजन की व्यवस्था कर रहा है।
है न आश्चर्य की बात ! यह बात उसके दिमाग से उतरती नहीं है, हर पल यही बात उसके दिमाग में आ रही है कि आखिर ऐसा क्यों है ? शेर जो लोमड़ी का शिकार कर सकता है, कही और से शिकार पकड़कर लाया है। फिर लोमड़ी के भोजन की व्यवस्था कर रहा है।
ऐसे ही विचार करते-करते रात काट रहा है वह, उसके मन से बात उतर ही नहीं रही है। इसी तरह एक-दो दिन बीत जाते हैं आज फिर उसकी ड्यूटी वहीं लगी है। आज फिर उसके जिम्मे लकड़ियाँ लाने का काम। जंगल जाना ही है। आप जैसा विद्यार्थी थोड़े हैं कि मना कर देगा कि मैं नहीं जाऊँगा। आपसे कुछ कहा जाता है तो आप कह देते हैं नहीं, मैं नहीं करूँगा, मैं नहीं कर सकता।
विद्यार्थी आज फिर जाता है जंगल में और इस बार सोचता है कि चलूँ देखूं कहीं ऐसा नहीं न है कि शेर मुझे देख लिया तो मेरे दिखाने के लिए यह व्यवस्था किया और जब मैं कल नहीं गया, वह लोमड़ी का शिकार कर लिया हो, लोमड़ी अब बची न हो। लेकिन जैसे ही वह उस स्थान पर पहुँचता है, देखता है कि लोमड़ी एकदम फिट-फाट वैसे ही मस्त है, वैसे ही प्रसन्न है।
अभी अपने काम में जुटता है, लकड़ियाँ चुनना शुरू करता है, लकड़ियाँ बीनना शुरू करता है। तब तक क्या हुआ, फिर पुनरावृत्ति होगी न ? हाँ, फिर क्या होगा ? तब तक वह देख रहा है कि फिर वही शेर सामने से कोई शिकार मुँह में लिए हुए इसी ओर बढ़ रहा है। अब तो बेचारा अनुभवी हो गया है। क्या करेगा फिर खट-खट, खट-खट पेड़ पर चढ़ जाता है और पेड़ पर चढ़कर ही सब नजारा देख रहा है।
क्या देख रहा है कि आज फिर शेर उसी तरह, उसी स्थान पर जिस स्थान पर पिछली बार बैठा था, बैठता है। अपना शिकार ग्रहण करता है और फिर कुछ हिस्सा छोड़कर चला जाता है। जैसे ही शेर जाता है, वैसे ही लोमड़ी उस पर टूट पड़ती है और तब तक टूटी पड़ी रहती है जब तक उसके शरीर के हिस्से अलग-अलग नहीं हो जाते हैं। टूट पड़ने का क्या मतलब ? हिन्दी की मैडम से पूछना टूट पड़ने का मतलब क्या होता है। टूट पड़ी है अर्थात् वह तब तक लगी रहती है जब तक कि उसे सफाचट नहीं कर जाती है।
यह सही बात है कि जैसे आप चाटते हैं, उसी तरह वह चटकर जाती है और जब एक जोरदार डकार लेती है। तब विद्यार्थी ऊपर पेड़ पर सोचता है, चलो अब उतरा जाए। एक जोरदार डकार के साथ लोमड़ी का कार्य पूर्ण होता है और विद्यार्थी ऊपर से नीचे उतरता है। काम उसका समझ ही रहे हैं, क्या करना है उसे ? लकड़ियाँ चुनना है और जल्दी-जल्दी भागना है, क्योंकि उसे प्रतिदिन विलम्ब हो जा रहा है। उस बार भी शेर ने विलम्ब कर दिया और इस बार भी शेर पहुँच गया, इस बार भी विलम्ब हो गया है।
लकड़ियाँ चुनता है किन्तु इस बार तो उसकी मनः स्थिति बदली हुई है। अब इस बार उसे पक्का वि’वास हो जाता है। इस दूसरी घटना से कि यह सब ईश्वर का किया-धरा है। क्या है ? यह सब ईश्वर का कार्य है, यह ईश्वर के होने का प्रमाण है। नहीं तो ऐसा कैसे सम्भव था, एक शेर लोमड़ी के भोजन की व्यवस्था करे। यह हो ही नहीं सकता है। जरूर यह शेर, शेर नहीं है, यह या तो ईश्वर है या ईश्वर का कोई प्रतिनिधि है। ईश्वर को लोमड़ी का कष्ट सहा नहीं गया होगा और उन्होंने इस लोमड़ी के भोजन की व्यवस्था अपने इस प्रतिनिधि के जिम्मे सौंप दी होगी।
वह व्यवस्था करे भी क्यों नहीं ? ईश्वर जो है, व्यवस्था करे भी क्यों नहीं, क्योंकि इस चराचर जगत में जो कुछ भी है सब उसी का तो अंश है, हम सभी में वही तो विद्यमान है, हम सभी में उसी का तो वास है। हम सभी की जिम्मेदारी उसी की ही है। जब वह इस अपाहिज लोमड़ी के लिए इतना कुछ कर सकता है तो फिर मुझ जैसे विद्यार्थी के लिए क्यों नहीं कर सकता।
मैं तो उस लोमड़ी से श्रेष्ठ हूँ, मैंने विद्या अध्ययन किया हुआ है, और भी तमाम चीजें मेरे साथ प्लस हैं। मेरे लिए क्यों नहीं करेगा ? जरूर करेगा। जब यह सच है कि सभी का मालिक वही है तो सभी की व्यवस्था भी वही करेगा, निश्चित करेगा।
अब जब विद्यार्थी ऐसा सोच रहा है। उसके दिमाग में यह भी बात आती है और कहा भी गया है- जब ईश्वर ने मुँह दिया है तो निवाले की व्यवस्था भी वही करेगा, फिर मेरे जैसा आदमी जिसने इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया है, इतनी विद्वता प्राप्त कर ली है मुझे तो कम से कम ईश्वर की यह बात समझनी चाहिए और मुझे इसका अनुसरण करना चाहिए। मैं नहीं करूँगा तो कौन करेगा ? मुझे ही तो सबका मार्ग प्रशस्त करना है। यही सोचकर वह आश्रम छोड़ देता है, गुरुकुल छोड़ देता है।
प्रिय विद्यार्थियों, वह आ जाता है जंगल में। रास्ते के किनारे एक वृक्ष है और उसी के नीचे बैठकर ईश्वर की प्रतीक्षा में लीन है। ईश्वर की प्रतीक्षा कर रहा है कि वही परमपिता परमेश्वर अब मेरी व्यवस्था करेगा, चाहे स्वयं आकर करे या फिर अपने किसी प्रतिनिधि को भेजकर करे, अब इसे इन्तजार है। एक दिन बीता, कैसे बीता बिना खाए-पिए न ? बैठ गया है एक दिन बीता, दो दिन बीता, तीन दिन बीता, इस तरह कितने दिन बीतेगा ?
यहाँ उसकी हालत खराब हो रही है, बिना कुछ खाए-पिए क्या हो रहा है, समझ सकते हैं। कहते हैं- सूख के लकड़ी हो गया। क्यों ? वह बेचारा सूख कर लकड़ी होने लगा है। न तो ईश्वर स्वयं आए और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को भेजा उन्होंने। अभी बात हुई है आपसे, इधर भूख-प्यास से उसकी हालत बिगड़ने लगी है।
वह परेशान हो गया है, उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। अपने इस निर्णय के खिलाफ वह कभी ईश्वर को दोष दे रहा है तो कभी स्वयं को क्योंकि परिणाम शून्य है।
प्रिय विद्यार्थियों, संयोगवश उधर से कोई महात्मा गुजरते हैं। उस विद्यार्थी को वहाँ बैठे हुए देखते हैं। उन्हें कुछ खटकता है, उन्हें ऐसा लगता है कि जरूर कुछ गड़बड़ है, वे उसके पास पहुँचते हैं और उसकी इस दशा का कारण पूछते हैं। जैसे ही महात्मा उससे कारण पूछते हैं वह विद्यार्थी फफककर रो पड़ता है।
आप भी होते तो रो देते, हालत खराब है। एक टाइम कुछ न मिले तो ऊधम मचा देते हैं और वह बेचारा कई दिनों से उपवास पर ही है। फफककर रो पड़ता है और सारी की सारी कहानी महात्मा को सुना देता है कि जंगल गया था लकड़ियाँ लाने और ऐसा-ऐसा हुआ इसीलिए मैंने ऐसा निर्णय लिया।
अब आप ही बताइए, क्या मैं गलत हूँ, मैं गलत कैसे हो सकता हूँ ? जब ईश्वर की ही सारी व्यवस्था है और वही सबकी व्यवस्था करता है। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ वह ईश्वर जो उस अपाहिज लोमड़ी के लिए इतना दयालु है, कितनी चिन्ता करता है, वह मेरे लिए, मुझ विद्यार्थी के लिए जिसे इतना ज्ञान प्राप्त है, जो सत्य के मार्ग का अनुयायी है उसके लिए क्यों कुछ नहीं करता ? आखिर ईश्वर ऐसा विभेद क्यों कर रहा है ? यह तो अच्छी बात नहीं है, ईश्वर को ऐसा नहीं करना चाहिए, यह ठीक बात नहीं है।
प्रिय विद्यार्थियों, महात्मा ने क्या कहा ? महात्मा ने उस विद्यार्थी को समझाया- तुम्हारा कहना कुछ हद तक सत्य हो सकता है, किन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। हो-न-हो ईश्वर तुम्हें लोमड़ी नहीं, शेर की भूमिका में देखना चाहता हो। महात्मा ने क्या कहा- ईश्वर तुम्हें लोमड़ी नहीं, शेर की भूमिका में देखना चाहता है और तुम नाहक स्वयं को लोमड़ी की भूमिका में प्रस्तुत कर रहे हो।
यही तुम्हारी भूल है और मेरी समझ में यही तुम्हारे कष्ट का कारण भी है। इसका समाधान मात्र इतना ही है कि तुम भी शेर की भूमिका ग्रहण कर लो। ईश्वर तो तुम्हारे साथ हाथ-से-हाथ मिलाकर चलने के लिए तैयार तुम्हारा इंतजार कर रहा है। बस, तुम्हें पहला कदम तो निकालना है, वह तुम्हारे साथ-साथ तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुँचाने के लिए व्यग्र है।
प्रिय विद्यार्थियों, मुझे भी लगता है आपके साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही है, आप शेर की भूमिका में नहीं आना चाहते। शिकार करना पड़ेगा न और शिकार करने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी, उछल-कूद करनी पड़ेगी, छलांग लगानी पड़ेगी, भाग-दौड़ करनी पड़ेगी और लोमड़ी की भूमिका बड़ी आसान है, हाथ-पैर बाँध लो, नहीं अपाहिज हो, अपाहिज हो जाओगे; पट्टी बाँध लो, पट्टी बाँधने के बाद तो फिर कुछ कहना ही नहीं; बैठ जाओ, ‘जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला’।
क्या यही चाहते हो ? अपने को अपाहिज क्यों महसूस कर रहे हो ? अपाहिज क्यों बनना चाहते हो ? शेर क्यों नहीं बनना चाहते ? क्या जरूरत है शेर बनने की, जब सब कुछ करने के लिए यहाँ आपके इतने सारे आचार्य हैं, हम हैं ही, आपके माता-पिता भी हैं, कुछ भी होता है तुरन्त तैयार बैठे मिलते हैं। आपको कोई कष्ट नहीं होना चाहिए, मेरे बच्चे को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए, आपने मेरे बच्चे को डाँट दिया। अरे ! क्यों डाँट दिया आपने ? मेरा बच्चा मेहनत नहीं करेगा बहुत सुकुआर है, शायद ‘सुकुमार’ शब्द से बना होगा ‘सुकुआर’।
सुकुआर देशज शब्द है न भोजपुरी भाषा का, तो बहुत सुकुआर है, प्रेयर में खड़ा होता है तो धूप लग जाती है, आप कथा सुनाते हैं तो उसे चक्कर आ जाता है। अरे वाह ! तो क्यों नहीं उसे डिब्बे में बन्द करके रख लेते हैं। जब जरूरत होगी, डिब्बा खोलिएगा, बाहर निकालिएगा और खोलने की जरूरत भी क्या है ? अन्दर ही जो भी जरूरत होगी, डाल दीजिएगा। जैसे आप लोग तोता पाले रहते हैं, उसे रटाते रहते हैं और पिंजरे के अन्दर रखते हैं और सारी व्यवस्था कर देते हैं। वहाँ तो कोई कष्ट नहीं है, वहाँ कोई दिक्कत नहीं है।
अब स्कूल आएगा, पढ़ना पड़ेगा, नहीं पढ़ेगा तो डाँट भी पड़ सकती है, परेशानी तो होगी-ही-होगी। नहीं होगी ? बहुत परेशानी है। आसान तरीका क्या है ? बस वही लोमड़ी वाला। किसी तरह अपने को अपाहिज सिद्ध कर लीजिए। ईश्वर सारी व्यवस्था करेगा ? अरे ! यहीं ईश्वर के इतने प्रतिनिधि हैं, सारी व्यवस्था कर देंगे। कहा गया है न, ‘जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला। घर में भी कह सकते हैं, बाहर कहाँ जाते हैं ! भाई-बहन हैं ही आपके, कोई भी सुनेगा तो तरस आएगा ही और कुछ-न-कुछ आपकी व्यवस्था कर देगा। मेरे लिए तुम ही पढ़ लो दीदी, भैया, क्या जरूरत है मुझे ? झूठ में ही दिमाग खपाना पड़ता है।
प्रिय विद्यार्थियों, जब भी आप सहायता के लिए हाथ फैलाएंगे या ये उम्मीद करेंगे कि कोई आपकी सहायता करे, उस क्षण आपके अन्दर से ईश्वर गायब हो जाएगा, आपके अन्दर ईश्वरत्व नहीं रह पाएगा। ईश्वरत्व तो उसी के अन्दर होता है जो सहायक होता है, जो सहायता के लिए तत्पर होता है।
ईश्वर उस शेर के अन्दर उतरा हुआ है। वह शेर ईश्वर का रूप है या ईश्वर का प्रतिनिधि है। क्योंकि वह किसी की सहायता कर रहा है, वह लोमड़ी की सहायता कर रहा है। तुलसीदास जी ने कहा है- ‘सोई विजयी’ यानि विजय कौन प्राप्त करता है, ‘विनयी गुन सागर’यानि जो विनयी हो और गुणों का सागर हो।
कैसा गुण ? मारामारी वाला न ! यह गुण नहीं है, आप लोग सीखते हैं, जाकर ताइक्वान्डो सीखते हैं तो कोई कुछ सीखता है, तो कोई कुछ सीखता है, सब गुण ही तो है। मारामारी करने का गुण, अवगुण कहेंगे आप ? एक शॉट लगाएगा तो इधर से उधर हो जाएगे। गुण क्या हैं ? कैसे गुण आपके अन्दर होने चाहिए।
आपके अन्दर सहयोग की भावना होनी चाहिए, आपके अन्दर परोपकार की भावना होनी चाहिए, आपके अन्दर दया होनी चाहिए, करुणा होनी चाहिए, मैत्री होनी चाहिए यानि जब भी आपके अन्दर अच्छे गुण रहेंगे, निश्चित रूप से आप अच्छा करेंगे। जब आप अच्छा करेंगे तो निश्चित रूप से उस क्षण आपके अन्दर ईश्वर का वास होगा।
हम ही ईश्वर हैं और हम ही ’ शैतान हैं। कब ? जब हमारे भाव, जब हमारे क्रिया-कलाप, जब हमारी एक्टिविटी उस तरह की होती है, उस पर निर्भर करता है। हम अच्छे कार्य करते हैं, हम अच्छी बात सोचते हैं तो ईश्वर का कार्य करते हैं। जब हम कोई गलत कार्य करते हैं, जब हम कोई गलत बात करते हैं तो हम ’ शैतान का कार्य कर रहे होते हैं।
प्रिय विद्यार्थियों, अब यह आपको तय करना है कि आप ’ शैतान का कार्य करने के लिए यहाँ आए हैं या भगवान का कार्य करने के लिए आए हैं। निश्चित रूप से आप भगवान का कार्य करने के लिए आए हैं, ईश्वर का कार्य करने के लिए आए हैं। जिस क्षण आप इस तरह के कार्य करेंगे, समझें कि करुणा-मैत्री, यह सब सद्गुण जब आपके अन्दर होंगे, उस समय निश्चित रूप से आपके अन्दर ईश्वरत्व का आगाज होगा। आप यहाँ इसीलिए आए हैं। आपका यही उद्देश्य है, आपका यही कार्य है, आपका यही लक्ष्य है और वही प्रेरणा है कि यह परिस्थितियाँ आपको मिली हैं, स्थितियाँ आपको मिली हैं, अवसर आपको मिला हुआ है।
अगर आप इसका सही उपयोग करते हैं, समुचित उपयोग करते हैं तो निश्चित रूप से आप अपने उद्देश्य पर पहुँचते हैं, जिसके लिए आपको यह शरीर मिला हुआ है, यह अवसर मिला हुआ है। आप कहीं से भटकते हैं, विचलित होते हैं तो आपकी भी वही दशा होती है। आपको सदैव अपने अन्दर यह विचार लाना है कि आप ईश्वर के सहायक हैं, आप ईश्वर के प्रतिनिधि हैं, न कि आप किसी से सहायता के लिए हाथ फैलाएँ, उम्मीद करें, उसके पीछे रहें। आपको आगे जाना है, बहुत आगे जाना है, निश्चित ही आगे जाएंगे।
आप इस दिशा में लगे हैं, लगे रहंेगे, आप सफल हो रहे हैं, आप सफल होते रहेंगे, आप सफल हों।
शिवोऽहम्
मैं कल्याणकारी हूँ।
धन्यवाद।